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शशांक द्विवेदी का लेख : सिंधु नेत्र से सीमा पर पैनी निगाह

इसरो ने अपने पहले अभियान में इसरो ने पीएसएलवी-सी51 के माध्यम से एक साथ 19 उपग्रहों जिनमें अमेरिका के 13, ब्राजील के अमेजोनिया-1 और 5 भारतीय उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर दिया। सिंधु नेत्र उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय युद्धपोत व व्यावसायिक जहाजों की पहचान करने में सक्षम है। सिंधु नेत्र अपनी तरह का पहला सैटेलाइट है, जो चीन के साथ लद्दाख और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में जमीन पर भी देश की निगरानी क्षमता को बढ़ाएगा। एक साथ 19 उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण से एक बार फिर दुनिया में इसरो की धाक जम गई तथा भारत का सीमा निगरानी तंत्र भी अभेद्य हो गया।

शशांक द्विवेदी का लेख : सिंधु नेत्र से सीमा पर पैनी निगाह
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शशांक द्विवेदी

एक बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए इसरो ने देश की निगरानी क्षमताओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के द्वारा विकसित 'सिंधु नेत्र' उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा से 20121 के अपने पहले अभियान में इसरो ने पीएसएलवी-सी51 के माध्यम से एक साथ 19 उपग्रहों जिनमें अमेरिका के 13, ब्राजील के अमेजोनिया-1 और 5 भारतीय उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर दिया। सिंधु नेत्र उपग्रह हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय युद्धपोत व व्यावसायिक जहाजों की पहचान करने में सक्षम है। सैटेलाइट ने ग्राउंड सिस्टम के साथ संचार शुरू भी कर दिया है। सिंधु नेत्र अपनी तरह का पहला सैटेलाइट है, जो चीन के साथ लद्दाख और पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में जमीन पर भी देश की निगरानी क्षमता को बढ़ाएगा। यह भारतीय सीमा के आसपास लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी एलएसी पर चीनी सेना की गतिविधियों पर भी नजर रख सकता है। अगर जरूरत पड़ती है तो सैटेलाइट से दक्षिण चीन सागर से लेकर अदन की खाड़ी में समुद्री लुटेरे वाले क्षेत्र व अफ्रीकी तट पर भी निगरानी की जा सकती है।

सिंधु नेत्र को मिलाकर पांच भारतीय उपग्रह भारतीय छात्रों द्वारा निर्मित हैं। इन छोटे उपग्रहों में चेन्नई स्थित स्पेस किड्ज इंडिया द्वारा निर्मित सतीश धवन सैटेलाइट (एसडीसैट) भी शामिल है, जो तीन उपग्रहों यूनिटीसैट और प्रौद्योगिकी प्रदर्शन उपग्रह सिंधु नेत्र का संयोजन है। तीन उपग्रहों (यूनिटीसैट) को जेप्पियार इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी, श्रीपेरम्बदूर(जेआईटीसैट), जी एच रायसोनी कालेज आफ इंजीनियरिंग, नागपुर (जीएचआरसीईसैट) और श्री शक्ति इंस्टीट्यूट आॅफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, कोयम्बटूर (श्री शक्ति सैट) के बीच संयुक्त विकास के तहत डिजाइन और निर्मित किया गया है।

इसरो के अनुसार यूनिटीसैट का उद्देश्य रेडियो रिले सेवाएं प्रदान करना है। एसडीसैट एक नैनो उपग्रह है, जिसका उद्देश्य विकिरण स्तर, अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन करना और लंबी दूरी की संचार प्रौद्योगिकियों को प्रदर्शित करना है। सिंधु नेत्र के सफल प्रक्षेपण से देश की सीमाओं पर घुसपैठ की कोशिश लगभग नामुमकिन हो जाएगी। इसमें लगे खास सेंसर के चलते सीमापार आतंकियों के जमावड़े की भी सूचना पहले ही मिल जाएगी। साथ ही सीमापार की गतिविधियों का विश्लेषण भी आसान हो जाएगा। यह उपग्रह किसी भी मौसम में बेहद साफ तस्वीरें ले सकेगा। बादलों की मौजूदगी में भी यह दुश्मन की गतिविधियों पर पैनी नजर रखेगा। यही नहीं इससे आपदा राहत कार्यों में भी भरपूर मदद मिलेगी। इससे रात में भी तस्वीरें ली जा सकती हैं। इसकी मदद से भारतीय सीमाओं की निगरानी और उनकी सुरक्षा को अभेद्य बनाने की प्लानिंग आसान हो जाएगी।

इसरो ने पहली बार ब्राजील के किसी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजा है। 637 किलो वजनी अमेजोनिया-1 सैटेलाइट अमेजन क्षेत्र में वनों की कटाई की निगरानी और कृषि विश्लेषण के लिए उपभोक्ताओं को रिमोट सेंसिंग डाटा मुहैया कराएगा। अंतरिक्ष में भेजे गए 18 अन्य सैटेलाइट में से तीन यूनिटी सैट भारतीय अकादमिक संस्थानों के हैं, जबकि 14 इसरो की वाणिज्यिक इकाई न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के हैं। लॉन्चिंग के समय ब्राजीली प्रतिनिधिमंडल और इसरो प्रमुख के सिवन मौजूद रहे।

सतीश धवन सैट के उपग्रह के अग्रिम हिस्से पर पीएम मोदी की तस्वीर उकेरी गई है और इससे डिजिटल भगवत गीता को भी अंतरिक्ष में भेजा गया है। स्पेस किड्ज इंडिया ने कहा, सैटेलाइट में सिक्योर्ड डिजिटल कार्ड फॉर्मेट में भगवत गीता को रखा गया है। पीएम मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान और अंतरिक्ष क्षेत्र के निजीकरण के प्रति एकजुटता और सम्मान दर्शाने के लिए इसके ऊपरी हिस्से पर उनकी तस्वीर बनाई गई है।

इसरो अब तक 342 विदेशी सैटेलाइट लॉन्च कर चुका है जबकि इसरो के सबसे भरोसेमंद पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी ) का यह 53वां मिशन था। साथ ही सतीश धवन स्पेस सेंटर से यह 78वां लॉन्च व्हीकल मिशन था। डीआरडीओ के अनुसार सिंधु नेत्र उपग्रहों की श्रृंखला में पहला है जो चीन के साथ लद्दाख क्षेत्र और पाकिस्तान के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि पर अपनी निगरानी क्षमताओं को बढ़ाने में मदद करेगा। यह उपग्रह 3,488 किलोमीटर लम्बी वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के सभी भारतीय क्षेत्रों के पास चीनी सेना की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखेगा। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को लगता है कि इस तरह के चार और उपग्रह की आवश्यकता है जो दुश्मन की हर चाल पर नजर रखने में मदद कर सकते हैं।

दुनिया में बदलते युद्ध के पारंपरिक तौर-तरीके और मॉडर्न वार को देखते हुए चीन एवं अमेरिका की तर्ज पर तीनों सेनाओं को एक करने का फैसला लिया गया है। कुल पांच कमांड बननी हैं जिनमें तीन कमांड्स की अंतरिक्ष से लेकर साइबर स्पेस और जमीनी युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इसी क्रम में डिफेंस स्पेस एजेंसी (डीएसए) की स्थापना के साथ-साथ सरकार ने अंतरिक्ष सामग्रियों की क्षमता देखने के लिए डिफेंस स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन भी बनाया है। निकट भविष्य में रक्षा बलों की अंतरिक्ष शाखा को मजबूत किया जाना है। डिफेंस स्पेस एजेंसी का गठन भारतीय सशस्त्र बलों की तीनों सेनाओं को मिलाकर किया गया है जिसका मुख्यालय बेंगलुरु (कर्नाटक) में बनाया गया है। इस एजेंसी को भारत के अंतरिक्ष युद्ध और सैटेलाइट इंटेलिजेंस परिसंपत्तियों के संचालन का काम सौंपा गया है। इस एजेंसी को भविष्य में पूर्ण आकार की त्रि-सेवा सैन्य कमान में परिवर्तित किए जाने की उम्मीद है। कमांड का नेतृत्व सैन्य बलों के प्रमुख सीडीएस के हाथों में होगा।

ब्राजील का एक और अमेरिका के 13 उपग्रहों का प्रक्षेपण इसरो की व्यावसायिक शाखा न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) द्वारा किया गया है। एनएसआईएल का ये पहला पूरी तरह से व्यावसायिक प्रक्षेपण था। इसरो के व्यावसायिक प्रक्षेपण के काम को देखने के लिए 2019 में विज्ञान विभाग के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी के तौर पर एनएसआईएल का गठन किया गया। अरबों डॉलर के अंतरिक्ष कारोबार के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाते हुए इसरो ने एक बार फिर अपनी सफलता साबित की। कुल मिलाकर पीएसएलवी-सी 51 द्वारा एक साथ 19 उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण से एक बार फिर दुनिया में इसरो की धाक जम गई तथा इसके साथ ही भारत का सीमा निगरानी तंत्र भी अभेद्य हो गया।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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