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व्यंग्य: शेयर बाजार की चाल

शेयर बाजार की दुनिया हमारी दुनिया से कतई अलग होती है।

व्यंग्य: शेयर बाजार की चाल
शेयर बाजार की दुनिया हमारी दुनिया से कतई अलग होती है। वहां के नियम-कायदे-कानून भी अलग होते हैं। कहने को हमने तरह-तरह के रूल बनाए जरूर हैं, शेयर बाजार को चलाने के लिए मगर वो चलता अपनी चाल के हिसाब से ही है। किसी (दूसरे) की चाल पर चलते शेयर बाजार को- कम से कम- मैंने तो नहीं देखा। अपनी मस्ती में होगा तो ऐसा मस्त चलेगा कि लगेगा ही नहीं यह वही सेंसेक्स है, जिसने तगड़ी-तगड़ी गिरवटों में निवेशकों को निपटा डाला है। चाल में नहीं होगा तो कित्ता ही जोर लगा व लगवा लीजिए नहीं चलेगा। सेंसेक्स की चाल की थाह आज तलक कोई नहीं पा पाया है।
जो लोग ऐसा दवा करते हैं कि वो शेयर बाजार या सेंसेक्स की चाल को पकड़ पाने में सफल हुए हैं, कोरी फेंकते हैं। इत्ता समझ लीजिए कि सेंसेक्स की चाल और बीवी के मूड का कोई पता नहीं रहता- कब में बिगड़ जाए, कब में संवर। इसीलिए मैं सेंसेक्स और बीवी दोनों से ही उचित दूरी बनाकर रहता हूं। अभी हाल दुनिया भर के शेयर बाजारों ने जो धूम-धड़ाके के साथ पटखनी लगाई है, अच्छे से अच्छे और सियाने से सियाने चारों खाने चित्त पड़े हैं।
बियर ने बूल को गोद में उठाकर ऐसा पटका कि बिचारा बूल न कुछ समझ पाया न संभल पाया। एक ही पटकनी में निवेशकों के साढ़े सात लाख करोड़ स्वाह कर डाले। अब बैठाने को बैठाते रहिए किस्म-किस्म की जुगाड़ें पर शेयर बाजार के दरिया में डूबी हुई रकम का मिलना मुश्किल ही नहीं नामुंकिन है पियारे। यहां जो एक दफा डूब गया, समझो डूब ही गया।
शेयर बाजार में कुछ भी स्थाई नहीं होता। हर पल यहां कुछ न कुछ चढ़ता-उतरता रहता ही है। इस दरिया में टिके केवल वही लोग रह पाते हैं, जिनमें हर बड़ी डूबी को सहने की क्षमता होती है। जिनमें क्षमता नहीं होती, उन्हें निपट लेने में एक से दूसरा सेकेंड नहीं लगता। इसीलिए तो ज्ञानी लोग कहते हैं कि शेयर बाजार की दुनिया में केवल वही कदम रखे, जिसमें इसे झेल पाने की कुव्वत हो, वरना यहां से कट लेना ही बेहतर। यह बात दीगर है कि दुनिया भर के शेयर बाजार आपस में मिले हुए हैं।
एक गिरता तो सब गिर पड़ते हैं। यह होड़ भी साथ लगी रहती है कि कौन कित्ता ज्यादा गिरके दिखा पाता है। जो जित्ता ज्यादा गिरता है, वो अगले दिन अखबारों में सुर्खियां बटोर ले जाता है। शेयर बाजार बढ़ने से ज्यादा गिरने को अपनी शान समझने लगे हैं। गिरते वो हैं और दिल निवेशकों के बैठ जाते हैं। सरकार के पास जवाब नहीं होता देने को सिवाय इसके कि घबराए नहीं, सब ठीक होगा।
सात लाख करोड़ निपट लेने के बाद अब बचा ही क्या है ठीक होने को। जैसे-तैसे संभल-संभाल के हमारा सेंसेक्स अपने पैरों को कुछ मजबूती दे पाया था कि एक तगड़ा झटका लगा और धड़ाम। पानी देने वाला भी कोई पास नहीं। केवल दिलासे हैं। किंतु दिलासों से डूबी रकम वापस तो नहीं लौट आएगी न। इसीलिए तो कहते हैं कि शेयर बाजार से कभी दिल नहीं लगाना चाहिए। यह बेवफा माशूका जित्ता ही दिल-फरेब होता है।
यहां से जित्ता प्यार मिल रहा है साथ-साथ लेते जाइए। अगर दिल देने या लगाने के चक्कर में पड़े रहेंगे, तो जो हाथ में है, उससे भी हाथ धो बैठेंगे। अर्थव्यवस्था में बनी सुस्ती और शेयर बाजार की चाल कब में कैसा गुल खिला दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। यों भी, बुरा वक्त कहके थोड़े न आता है। फिर भी, हमने उम्मीद नहीं छोड़ी है कि एक दिन हमारा शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था अपने अच्छे दिनों में वापस लौटेंगे।
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