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शंकर वाघेला का जाना कांग्रेस के लिए झटका, जानिए, इसका राजनीतिक समीकरण

एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस दिनोंदिन अपना आकर्षण खोती जा रही है।

शंकर वाघेला का जाना कांग्रेस के लिए झटका, जानिए, इसका राजनीतिक समीकरण

एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस दिनोंदिन अपना आकर्षण खोती जा रही है। करीब सवा सौ साल पुरानी पार्टी इस समय न करिश्माई नेतृत्व पैदा कर पा रही है और न ही जनता से जुड़ पा रही है। देश की राष्ट्रीय पार्टी के तमगे से सुशोभित कांग्रेस पर उनके अपने नेताओं का विश्वास खत्म होता जा रहा है।

गुजरात में विधानसभा से कुछ महीने पहले कद्दावर नेता शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस छोड़ना साबित करता है कि पार्टी के अंदरखाने सब कुछ ठीक नहीं है। हिमाचल प्रदेश में भी विस चुनाव से कुछ माह पहले कांग्रेस की प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी ने अपना पद छोड़ने की इच्छा व्यक्त की है।

अपने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए सोनी ने पार्टी से अपने दायित्वों को कम करने के लिए कहा है। एक ही दिन में कांग्रेस को दो झटके लगे हैं। इधर तीन साल में कई दिग्गज नेताओं ने कांग्रेस को त्यागा है और दूसरे दलों का दामन थामा है।

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करीब एक साल में कई कांग्रेस नेताओं ने पार्टी हाईकमान और पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व की तीखी आलोचना की है। जिसका खामियाजा उन्हें कांग्रेस निकाला के रूप में भुगतना पड़ा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी खुद पार्टी और देश में अपना प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं।

वे जब भी बोलते हैं, नासमझी ही ज्यादा सामने आती है। आज ही लें तो राहुल ने पीएम नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया कि उनकी नीतियों ने कश्मीर को जलाया है, जबकि साठ साल से ज्यादा समय तक देश में सत्ता कांग्रेस के हाथ में रही है और आजादी के बाद से ही कश्मीर समस्या है, तो अगर कांग्रेस की नीति सही थी तो समस्या हल क्यों नहीं हुई?

इस प्रश्न का जवाब राहुल गांधी को ही देना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने जब से देश की कमान संभाली है, कश्मीर मसले को लेकर संवेदनशील और सजग हैं। अपने शपथग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को न्यौता दिया।

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खुद बिना आमंत्रण पाकिस्तान गए और नवाज शरीफ से मिले। उन्होंने अपने स्तर पर वार्ता की राह बनाने की कोशिश की, लेकिन पाकिस्तान ने सिला क्या दिया? पठानकोट, उरी में आतंकी हमले, घुसपैठ, कश्मीर में पत्थरबाजी, अलगाववादियों को पैसा व समर्थन।

राहुल ने कभी यह सोचा है कि क्या पाकिस्तान कश्मीर मसला हल करना चाहता है? जवाब मिलेगा नहीं। ऐसा चाहता तो भारत से कई बार की गई वार्ता की पेशकश को स्वीकार करता। राहुल को पता होना चाहिए कि कांग्रेस सरकार के समय भी कई दफा वार्ता टेबल पर पाक को लाया गया, पर वह किसी फैसले पर पहुंचने से भागता रहा।

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दूसरी अहम बात है कि वार्ता के लिए भारत ही एकतरफा कोशिश क्यों करता रहे। जब पाकिस्तान को फिक्र नहीं है। मोदी सरकार ने कश्मीर पर बिल्कुल सही ट्रैक पर है। पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग किया। सर्जिकल स्ट्राइक की। घुसपैठ नाकाम कर रही है।

अलगाववादियों को बेनकाब किया। सेना आतंकवादियों की सफाई कर रही है। सरकार कश्मीर में शांति बहाल करने की हर भरसक कोशिश कर रही है और उसे सफलता भी मिल रही है। राहुल को चाहिए कि वे पहले कश्मीर मसले को समझें, अब तक की सरकारों की कोशिशों का अध्ययन करें फिर कुछ बोलें।

राहुल के लिए कश्मीर और चीन पर बोलने से ज्यादा कांग्रेस को संभालना ज्यादा जरूरी है। तिनका-तिनका कांग्रेस बिखर रही है। शंकर सिंह वाघेला के कांग्रेस छोड़ने से गुजरात में कांग्रेस के सत्ता में वापसी के सपने चूर हो सकते हैं।

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हालांकि वे कितना असर डालेंगे यह चुनाव बाद पता लगेगा, यह कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है। राष्ट्रपति चुनाव में भी आठ से दस के करीब कांग्रेस विधायकों ने क्राॅस वोटिंग करते हुए कोविंद के पक्ष में मतदान किया है।

यह दिख रहा है कि गुजरात कांग्रेस में एकता नहीं है। हिमाचल में भी कांग्रेस में दरार के संकेत मिल रहे हैं। दोनों ही राज्यों में कुछ महीनों में विस चुनाव हैं। राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस जिस तरह 22 से ज्यादा चुनाव हारी है, उसमें नहीं लगता है कि आने वाले चुनावों में वे अपने दम पर कांग्रेस की नैया पार लगा पाएंगे।

कांग्रेस के आलाकमान को न केवल अपनी पार्टी को एकजुट रखने की कोशिश करनी चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि लोग पार्टी छोड़कर क्यों जा रहे हैं? बिना कारण तलाशे कांग्रेस एकजुट नहीं रह सकेगी।

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