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शहीद क्रांति कुमार को भूली सरकार

आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। यह आजाद हवा जिन क्रांतिकारियों की बदौलत हमें मिली, अब धीरे-धीरे हम उन्हें हाशिए पर सरकाते जा रहे हैं। बहरहाल, दो दिन पूर्व पानीपत व उसके आसपास कुछ पुराने लोगों ने इस अमर शहीद को भरपूर याद किया, जिसे शहीदे आज़म भगत सिंह का गहरा दोस्त होने के बावजूद वर्ष 1966 में इसी पानीपत में उन्मादी लोगों की एक भीड़ ने जला दिया था। शहीदे आज़म क्रांतिकुमार शर्मा वर्ष 1902 में बाबा फरीद की नगरी पाकपट्टन के समीपवर्ती कस्बे शदघरा में पैदा हुए थे। जन्म का नाम हंसराज शर्मा था। मगर एक अन्य क्रांतिकारी साथी हंसराज के सरकारी मुखबिर बन जाने के बाद स्वयं भगत सिंह ने इस दोस्त का नाम हंसराज से बदलकर क्रांति कुमार रख दिया था।

शहीद क्रांति कुमार को भूली सरकार
आज हम आजाद हवा में सांस ले रहे हैं। यह आजाद हवा जिन क्रांतिकारियों की बदौलत हमें मिली, अब धीरे-धीरे हम उन्हें हाशिए पर सरकाते जा रहे हैं। बहरहाल, दो दिन पूर्व पानीपत व उसके आसपास कुछ पुराने लोगों ने इस अमर शहीद को भरपूर याद किया, जिसे शहीदे आज़म भगत सिंह का गहरा दोस्त होने के बावजूद वर्ष 1966 में इसी पानीपत में उन्मादी लोगों की एक भीड़ ने जला दिया था। शहीदे आज़म क्रांतिकुमार शर्मा वर्ष 1902 में बाबा फरीद की नगरी पाकपट्टन के समीपवर्ती कस्बे शदघरा में पैदा हुए थे। जन्म का नाम हंसराज शर्मा था। मगर एक अन्य क्रांतिकारी साथी हंसराज के सरकारी मुखबिर बन जाने के बाद स्वयं भगत सिंह ने इस दोस्त का नाम हंसराज से बदलकर क्रांति कुमार रख दिया था।
क्रांति कुमार की जिंदगी का एक महत्वपूर्ण अध्याय यह भी था कि वह लगभग 14 वर्ष तक अंग्रेजों की जेलों में रहे। उसी नेशनल कॉलेज लाहौर से उन्होंने बीए की थी जहां शहीदे आजम व अन्य कई क्रांतिकारी भी पढ़ रहे थे। महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। बाद में शहीदे आज़म की आज़ाद नौजवान सभा में शामिल हो गए। भगवती चरण शर्मा, दुर्गा भाभी व बीके दत्त के खास चहेते थे। सुभाष चंद्र बोस की लाहौर से काबुल-फ़रारी की व्यवस्था उन्होंने की थी।
नेता जी के एक सहयोगी उत्तम चंद मल्होत्रा बताते थे, नेताजी क्रांति कुमार की मुस्तैदी व जान पर खेलकर स्वतंत्रता सेनानियों के लिए समुचित संसाधन जुटाने की कला, दिलेरी एवं बौद्धिकता से प्रभावित हुए थे। मगर 53 वर्ष पहले पानीपत के मुख्य बाज़ार की एक घटना आज भी ढेरों सवालों के जवाबों की मोहताज है। उस दिन 15 मार्च 1966 को इस बाज़ार में उपद्रवी भीड़ ने एक ऐसे शख्स को उसके दो मित्रों सहित जीवित जला डाला, जो शहीदे आज़म का लाडला मित्र था।
शहीदे आज़म ने फ़ांसी से एक सप्ताह पूर्व अपनी कलाई की घड़ी इस दोस्त को भेंट की थी। वह घड़ी उस समय भी कलाई पर मौजूद थी, जब उन्हें जीवित जलाया जा रहा था। वह शख्स लगभग 14 वर्ष, ब्रिटिश साम्राज्य की जेलों में रहा। 1920 में लाला लाजपत राय के संपर्क में आए। उन्हीं के निर्देश पर तिलक स्वराज्य कोष के लिए धन संग्रह में लग गए। वर्ष 1922 में पहली बार धारा 124 के तहत गिरफ्तार हुआ तो निरंतर ढाई वर्ष सश्रम कारावास की सज़ा मिली। शहीदे आज़म के साथ करीबी संबंध 1926 में बना।
भगतसिंह के सभी गोपनीय पत्र या संदेश, निर्देश, क्रांति कुमार के माध्यम से ही अन्य क्रांतिकारियों तक पहुंचते थे। उसी वर्ष शहीदे आज़म का एक पत्र चोरी छिपे ले जाते हुए, क्रांति कुमार फिर पकड़े गए। तब 6 माह जेल में डाल लिए गए। वहां से छूटे तो भगत सिंह की ‘डिफ़ेंस-कमेटी’ में शामिल कर दिए गए। उन्हीं दिनों उन पर दबाव डालने के लिए एक झूठे बहुचर्चित मुकद्दमे में फंसाकर उन्हें लाहौर के शाही किले में ठूंस दिया गया। भगत सिंह ने जेल-प्रवास के दौरान क्रांति कुमार को अपनी संस्था ‘आज़ाद नौजवान सभा’ का संयोजक नियुक्त किया था।
पहले संयोजक वह स्वयं थे। इसी किले मे कारावास के मध्य उन्हें घोर अमानवीय यातनाएं दी गई। उन्हें चारपाई के पैताने मुंह बल बांध दिया गया और नीचे उपलों की आग जलाकर उसमें लाल मिर्चें डाल दी गईं। इससे उनकी सांसें उखड़ने लगतीं। फेफड़ों पर गहरा असर पड़ा। यह प्रभाव सारी उम्र रहा और बात करते समय उनकी सांस अक्सर उखड़ जाती थी। 1930 में उन्हें लंबी सुनवाई के बाद ससम्मान बरी कर दिया गया, क्योंकि आरोपों के पक्ष में कोई प्रमाण नहीं मिला था। लेकिन थोड़े दिन बाद ही फिर वही जेल यात्रा।
दरअसल अंग्रेज, उनकी निरंतर सक्रियता से परेशान थे। इस बार जिला गुरदासपुर की जेल में एक वर्ष चार माह काटे। फरवरी 1939 में पंजाब हाई कोर्ट के आदेश पर उन्हें रिहा किया गया, लेकिन रिहा होते ही उन्हें फिर तीसरे लाहौर षड्यंत्र कांड में गिरफ्तार कर लिया गया और उम्रकैद की सजा सुना दी गई। बाद में पंजाब हाई कोर्ट ने उन्हें बेगुनाह मानते हुए रिहा कर दिया। वर्ष 1935 में पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रचार मंत्री चुने गए। उन दिनों वह बिहार में बाबू राजेन्द्र प्रसाद के साथ रहे,
लौटते ही फिर गिरफ्तार हुए और शाही किला लाहौर जेल में एक साल की सजा के बाद 1937 में रिहा हुए। जिला मिंट गुमरी कांग्रेस कमेटी के 1940 तक महासचिव पद पर कार्यरत रहे। सितंबर 1939 में दूसरे विश्वयुद्ध के समय गिरफ्तार किये गये। वहां से रिहा हुए लेकिन रिहा होते ही दोबारा गिरफ्तार कर लिए गए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के तहत फिर गिरफ्तार किए गए। फिर 11 अगस्त 1947 को रिहा हो पाए। भारत-पाक विभाजन के समय वह सपरिवार दिल्ली चले गए। कुछ दिन शरणार्थी शिविरों में रहे।
यूपीएससी की परीक्षा पास करने के बाद प्रेस सूचना ब्यूरो में नियुक्त हुए। 1957 में सेवानिवृत्त हो गए। पीआईबी सेवा में रहते हुए उनका नाम राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चुना गया। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने पानीपत आकर स्वतंत्र पत्रकारिता शुरू कर दी। उर्दू, अंग्रेजी व हिन्दी के वन्दे मातरम, वीर भारत, वीर प्रताप, हिन्दी मिलाप, प्रभात और दी ट्रिब्यून के लिए संवाददाता एवं फीचर लेखक के रूप में कार्य करते रहे। पानीपत में उनकी शहादत पर बड़ी बड़ी घोषणाएं हुईं।
तत्कालीन मुख्यमंत्री कामरेड रामकिशन ने मुख्य बाज़ार में उनकी प्रतिमा लगाने की घोषणा की। श्रीमती गांधी स्वयं परिवार से मिलने आईं। उनकी दो बेटियों उर्वशी शर्मा व प्रभा शर्मा का कन्यादान, शहीद जतीनदास के भाई किरणचंद्र दास ने कलकत्ता से पानीपत आकर स्वयं किया। पानीपत-प्रवास के मध्य आर्थिक संकटों से घिरे क्रांति कुमार के दोनों बेटे समय पर उपचार न मिलने से दारूण परिस्थितियों में दम तोड़ गए। अब भी उस अग्निकांड के शिकार तीनों परिवारों के सदस्य उस चौक में जाकर यज्ञ करते हैं, दीये जलाते हैं, जहां क्रांति कुमार व उनके साथी शहीद हुए थे।
पारिवारिक पेंशन, बच्चों को रोज़गार आदि की घोषणाएं हुई मगर सारी सरकारी फाइलों में दफ़न हो गई। उनका जन्म एक साधनहीन गरीब परिवार में हुआ था, मगर उनकी तीक्ष्ण बुद्धि के कारण उन्हें वज़ीफे मिलते गए और वह पढ़ते गए। बताते थे एक बार किताबें नहीं थीं तो लाला लाजपतराय ने किताबें मंगाकर दीं। जब स्वाभिमान पर थोड़ी खरोंच आई तो लालाजी ने कह दिया, कोई बात नहीं, पढ़कर, फिर किसी ज़रूरतमंद को आगे दे देना।
हरियाणा सरकार ने गत दिवस जाटल रोड का नाम बदलकर शहीद क्रांति कुमार मार्ग रखने का निर्णय लिया, मगर अभी औपचारिक कार्यवाही पूरी नहीं हुई। उनकी बेटी उर्वशी शर्मा आज भी क्रांति कुमार की स्मृतियों को संजोए रखने में लगी हैं। पति कंवल नैन शर्मा व दोनों बेटे इसी कार्य में जुटे रहते हैं। इस महान शख्स की स्मृतियोंं को नमन्ा। वैसे अभी भी उम्मीद नहीं है कि वर्तमान सरकार इस परिवार को उसका उचित सम्मान देगी।
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