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हैप्पी मदर्स डे: मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं 72 फीसदी महिलाएं

हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक देश में 72 फीसदी महिलाएं मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं।

हैप्पी मदर्स डे: मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं 72 फीसदी महिलाएं

हाल ही में हुए एक सर्वे के मुताबिक देश में 72 फीसदी महिलाएं मां बनने के बाद नौकरी छोड़ देती हैं। जिस देश में प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर स्कूली परिणामों तक, लड़कियां बाजी मार रही हैं वहां यह सर्वे बताता है कि मात्र 15 फीसदी महिलाएं ही नौकरी में सेवानिवृत्ति की उम्र तक पहुंच पाती हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक मां बनने के बाद केवल 27 फीसदी महिलाएं ही अपनी नौकरी को कायम रख पाती हैं। 50 प्रतिशत महिलाएं मातृत्व की जिम्मेदारियां निभाने के लिए कामकाजी जीवन पर विराम लगा देती हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा में बेटियों के बढ़ते आंकड़े और सेना से लेकर अन्तरिक्ष तक उनकी तेजी से बढ़ती भागीदारी के दौर में इस अध्ययन के नतीजे चिंतनीय हैं। इस सर्वे में कामकाजी महिलाओं और पुरुषों के बीच भेदभाव बरते जाने की बात भी सामने आई है। इतना ही नहीं सुरक्षा, सामाजिक समर्थन की कमी और कार्यस्थल पर समानता से जुड़े कई अलहदा कारणों से भी माएं मातृत्व की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए देश की श्रमशक्ति का हिस्सा नहीं रह पातीं।
देश में वुमन वर्कफोर्स की भागीदारी और भेदभाव को लेकर सामने आये ये आंकड़े सोचने को विवश करते हैं कि प्रकृति की सबसे खूबसूरत जिम्मेदारी को जीते हुए महिलाएं अपने कामकाजी अस्तित्व को खो देती हैं। कितनी ही मुश्किलों को झेलकर हासिल की गई शैक्षणिक उपलब्धियों को भुलाकर देश की आधी आबादी का अहम्ा हिस्सा अपना पूरा जीवन केवल घर-परिवार संभालने में लगा देने वाली महिलाओं का है।
आंकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2005 के बाद से श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी घटती जा रही है। जबकि महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित किये बगैर देश में विकास प्रक्रिया को गति देना मुश्किल है। बीते साल आई वर्ल्ड बैंक की इण्डिया डेवलेपमेंट रिपोर्ट में भी कहा गया था कि वर्कफोर्स में महिलाओं की भागीदारी के मोर्चे पर भारत आज भी बहुत पीछे है। 131 देशों की इस फेहरिस्त में हमारा देश 120वें स्थान पर है।
विश्व बैंक की इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत के कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने पर आर्थिक वृद्धि दर दहाई के अंक तक जा सकती है। जानी-मानी पत्रिका द इकोनोमिस्ट के मुताबिक भी भारत अगर महिलाओं की प्रोडक्टीविटी में इजाफा करता है तो 2025 तक जीडीपी में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर लेगा।
दरअसल, महिलाएं हमारे समाज का वो बड़ा वर्ग हैं जो क्षमता और योग्यता तो रखती हैं पर नौकरी में लैंगिक भेदभाव, सामाजिक जिम्मेदारियां, कार्यस्थल पर असुरक्षा और वरीयता पाने में भी मिलने वाला दोयम दर्ज़ा और पारिवारिक असहयोग जैसे कारणों के चलते करिअर की दौड़ में पीछे छूट जाती हैं। ऊंची डिग्री लेने के बावजूद ऐसे कई सामाजिक, पारिवारिक और परिवेशगत कारक हैं को तय करते हैं कि मां बनने के बाद कोई काबिल और क्षमतावान महिला भी वर्कफोर्स का हिस्सा बनी रह पाएगी या नहीं। बच्चे की परवरिश और कामकाजी भागमभाग में संतुलन बनाने के लिए उन्हें परिवार की मदद की दरकार होती है। जो आमतौर पर नहीं मिल पाती।
इतना ही नहीं असुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं का अभाव एक बड़ा कारण है जिसके चलते महिलाएं नौकरी नहीं कर पातीं। आज भी बड़ी-बड़ी कम्पनियों में भी बच्चों के लिए क्रेच की सुविधा उपलब्ध नहीं है। ऐसे में बच्चों को नौकरों के भरोसे ना छोड़ने की सोच भी मां को अपने करिअर से दूर कर देती है। इतना ही नहीं कामकाजी महिलाओं की परेशानियों से जुड़े इस ताज़ा अध्ययन में यह भी सामने आया है कि समान योग्यता के लिए असमान वेतन और कार्यस्थल पर भेदभाव का माहौल भी उन्हें नौकरी से दूर कर देता है।
आज भी बच्चे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी मां के हिस्से ही है। तभी तो बेटियां पढ़ाई में तो अव्वल रहती हैं पर करिअर की रेस में उनकी तादाद कम हो जाती है? आज भी हर माता-पिता की प्राथमिकता यही होती है कि बेटी शादी कर अपना घर बसा ले और अपना परिवार आगे बढाए। ऐसे में कई बार शादी और मातृत्व से जुड़ी ऐसी कई बातें सामने आती हैं जो करिअर में समझौते का कारण बनती हैं। मां बनने के बाद तो अधिकतर महिलाएं रोज़गार की दुनिया से नाता तोड़ लेती हैं। अक्सर कामकाज़ी लड़कियां मां बनने पर अपने काम से थोड़े समय के लिए ब्रेक ले लेती हैं। फिर प्रोफेश्नल फ्रंट पर वापसी करने में उन्हें ख़ासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता।
बावजूद इसके हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं। तकनीकी और उच्च शिक्षा में महिलाओं के काम का दायरा तो हालिया बरसों में बहुत तेज़ी से बढ़ा है। 2011 की जनगणना विश्लेषण के आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 के दौरान देश में महिलाओं की शिक्षा का स्तर 116 फीसदी बढ़ा है। अफ़सोसनाक ही है कि योग्यता और सफलता की नई इबारत लिख रही बेटियों को करिअर के मामले में परिवार से जो सहयोग उन्हें मिलना चाहिए, वह आज भी नहीं मिल रहा है।
असल में देखा जाए तो महिलाओं के सशक्त और आत्मनिर्भर बनने और उम्रभर बने रहने की प्रक्रिया में भी समाज का दोहरा रवैया है। समाज में मौजूद विभेदकारी सोच और व्यवस्थागत खामियों के जूझने का माद्दा रखने वाली महिलाओं को अपने ही परिवार से ही अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता। कामकाज को लेकर रूढ़िवादी और असहयोग का माहौल कमोबेश आज भी मौजूद है| आरती सहयोग और विकास संगठन की 2012 में आई एक रिपॉर्ट के अनुसार, भारत में पुरुष घरेलू कामों में ज्यादा हाथ नहीं बंटाते हैं। जिम्मेदारियों के निर्वहन का ऐसा परिवेश भी मांओं को चाहरदीवारी तक सिमटने को विवश कर देता है। ऐसा व्यवहार हमारे परिवारों में मौजूद लैंगिक असमानता की हकीकत को भी सामने लाने वाला है।
भारत की आधी आबादी यानि कि लगभग 60 करोड़ जनसंख्या महिलाओं की है। जो शिक्षित भी है और सजग भी। बावजूद इसके भारत की महिला श्रमिक सहभागिता दर में पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिरावट ही आ रही है। मां होने की जिम्मेदारी का निर्वहन और एकल परिवारों का बढ़ता चलन इस गिरावट के अहम कारण हैं। निःसंदेह परिवार और व्यवस्थागत ढांचा सहयोगी बने तो कामकाजी मोर्चे पर भी माएं खुद को साबित करने का माद्दा रखती हैं।
जरूरत है तो इस बात की कि भावनात्मक पहलू पर समझी जाने वाली मां की भूमिका को व्यावहारिक रूप से भी अपनी काबिलियत से आगे बढ़ने का अवसर मिले। कुदरत की सबसे सुंदर सौगात के रूप में मिले मातृत्व को जीने के लिए अपने अस्तित्व और व्यक्तित्व की पहचान बनाने के मोर्चे पर समझौते न करने पड़ें।
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