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सुरेश पचौरी का लेख : मानवता के सेवक राजीव गांधी

राजीव गांधी ने अपने सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में जिस भी भूमिका का निर्वहन किया, उसमें वे खरे उतरे। एक सांसद, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जो भी भूमिका निभाई, सभी में अपने दायित्व का निर्वहन किया। राजीव गांधी भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के प्रथम सूत्रधार थे। आज जिस डिजिटल इंडिया की बात पूरे देश में हो रही है, उसकी आधारशिला राजीव गांधी ने ही रखी थी। संचार क्रांति का शंखनाद कर राजीव देश में कम्प्यूटर क्रांति के जनक बने। विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों तक ने हमारी टेक्नालाॅजी को न केवल स्वीकारा बल्कि उसकी उच्च गुणवत्ता को विश्व स्तर पर सराहा।

सुरेश पचौरी का लेख : मानवता के सेवक राजीव गांधी
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सुरेश पचौरी

सुरेश पचौरी

भारत रत्न राजीव गांधी एक ऐसे कर्मयोगी रहे हैं, जिनकी जीवन यात्रा में मानवता, सहजता, सरलता, निष्छलता के कई मुकाम रहे हैं। राष्ट्रहित उनके चिंतन के केंद्र में था। सर्वधर्म सद्भाव उनके मानस में रचा-बसा था। राजीव गांधी के व्यक्तित्व में परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय था। नियति ने समय के कैनवास पर उन्हें बहुत कम समय बख्शा, लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी।

राजीव गांधी राजनीति में सतत संवाद के पक्षधर थे। जापान यात्रा के दौरान पुष्पा भारती को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था 'राजनीति जनता से संवाद की राजनीति हो।' राजीव मानते थे कि बिना संवाद के विश्वास पैदा नहीं हो सकता और बिना विश्वास के राजनीति नहीं चल सकती। इसी पारस्परिक संवाद की राजनीति को अमलीजामा पहनाते हुए उन्होंने पंजाब, असम और मिजोरम समझौते किए, जिससे इन प्रदेशों में वर्षों से चल रही हिंसक गतिविधियों पर विराम लगा।

राजीव गांधी ने विषम परिस्थितियों में देश के प्रधानमंत्री पद का दायित्व संभाला। उनके साथ करोड़ों भारतीयों के मन में आधुनिक भारत की आशाएं, आकांक्षां और सपने जाग उठे। राजीव ने एक जननेता और प्रधानमंत्री के रूप में देश को पुनर्निर्माण एवं विकास के पथ पर अग्रेषित किया। उन्होंने भारत को आधुनिक, खुशहाल व मजबूत राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाई। सबकी सुनना और सबको साथ लेकर चलना राजीव के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी। वे आमजन की समस्याओं को ध्यान से देखते थे और फिर सही निर्देश देकर उसको सुलझाने का काम करते थे, यही उनकी कार्यशैली थी। संवेदनशील राजनेता होने के कारण पीड़ित मानवता की सेवा उनकी प्राथमिकता थी। भोपाल गैस त्रासदी की घटना के तुरंत बाद चुनाव प्रचार छोड़कर वे भोपाल पहुंचे। उन्होंने चुनाव प्रचार की बजाय मानवता की सेवा को प्राथमिकता दी। गैस पीड़ितों के दर्द पर मरहम लगाया। गैस पीड़ितों को भी अहसास हुआ कि उनका भी कोई हमदर्द है।

उन्होंने अनाथ बच्चों, असहाय बुजुर्गो और रोती हुई महिलाओं को सांत्वना दी। वे तुरंत भोपाल के हमीदिया अस्पताल में गैस पीड़ितों से मिलने पहुंचे और उन्होंने उनके इलाज के बारे में जानकारी ली तथा मध्यप्रदेश सरकार को गैस पीड़ितों को शीघ्र मदद देने के निर्देश दिए। चुनाव के बाद गैस पीड़ितों के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में अलग प्रकोष्ठ बनाया। गैस पीड़ितों का उपचार ठीक से हो, उन्हें उपयुक्त मुआवजा मिले, इसके लिए उन्होंने राहत एवं पुनर्वास के लिए कार्ययोजना बनाई और उस पर योजनाबद्ध तरीके से अमल शुरू करवाया। राजीव गांधी ने देश के ग्रामीण इलाकों का अनवरत दौरा किया। मध्यप्रदेश में एवं अन्य प्रदेशों के वे ऐसे इलाकों में गए, जहां विकास की रोशनी नहीं पहुंची थी। उन्होंने सुदूर अंचलों में रहने वाले गरीब, दलित, शोषित, पीड़ित और कमजोर लोगों के दरवाजों पर जाकर उनकी तकलीफों को समझा और उन्हें दूर करने की कोशिश की। ऐसे कई उदाहरण है जिसमें वे सुरक्षा तथा प्रोटोकाल की परवाह किए बिना पीड़ितों के दुख-दर्द में शामिल हुए। वे गरीब की झोपड़ी में एक ऐसा स्वर्णिम भारत देखना चाहते थे, जिसमें खुशहाली की सुनहरी इबारत लिखी हो और वहां 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः' की भावना का साक्षात्कार हो। देश के जिन इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं से तबाही मची जैसे उड़ीसा में महाचक्रवात, गुजरात में भूकंप, कुछ इलाकों में सूखा व बाढ़ की स्थिति बनी, वहां आपदा की इस घड़ी में राजीव ने प्रधानमंत्री रहते हुए प्रभावितों की संजीदगी से मदद की। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए उन्होंने व्यवस्थित और प्रभावी कदम उठाए।

श्रीलंका में तमिलों और सिंघलियों में जातीय संघर्ष हुआ जिसके परिणामस्वरूप लाखों की तादाद में तमिलजन शरणार्थी बनकर भारत आने लगे। श्रीलंका सरकार न तो सिंघलियों द्वारा तमिलों पर किए जा रहे अत्याचार रोक पा रही थी और न तमिलों को सुरक्षा दे पा रही थी। ऐसे समय में श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जयवर्धने के अनुरोध पर राजीव गांधी ने हिंसा का तांडव रोकने के लिए अपनी शांति सेना श्रीलंका भेज दी। भारतीय शांति सेना के प्रयासों से श्रीलंका में शांति स्थापित हुई एवं तमिलों को सुरक्षा मिली। राजीव गांधी ने हरारे (जिम्बाबे) के गुटनिरपेक्ष देशों के शिखर सम्मेलन के अवसर पर दक्षिण अफ्रीका की रंगभेदी सरकार की दमनकारी नीतियों के शिकार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे देशों का मनोबल बढ़ाने के लिए 'अफ्रीका कोष' की स्थापना का प्रस्ताव रखा, उसे अनुमोदित कराया। दुनिया के 45 देशों ने इसमें योगदान दिया और अफ्रीका कोष में 25 अरब डाॅलर की एक बड़ी धनराशि एकत्रित हुई। राजीव गांधी पर्यावरण, प्रदूषण की समस्या से बहुत चिंतित रहते थे। उन्होंने वन एवं पर्यावरण के संरक्षण के लिए मजबूत कदम उठाए। राजीव का मानना था कि पर्यावरण संरक्षण और विकास की अवधारणा में संतुलन आवश्यक रूप से होना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण एवं ओजोन परत के क्षरण के मामलों को अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के माध्यम से आगे बढ़ाए जाने की वकालत की। राजीव की पहल पर संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में 'पृथ्वी संरक्षण कोष' की स्थापना हुई। राजीव का मानना था कि नई सदी, ज्ञान पर आधारित सदी होगी, इसीलिए उन्होंने विज्ञान और टेक्नोलाॅजी का सहारा लेकर प्राचीन राष्ट्र को नए भारत में बदलने का अभिनव प्रयास किया।

राजीव गांधी एक सच्चे लोकतंत्रवादी थे, एक ऐसे व्यक्ति थे जो सदा नए विचारों और रचनात्मक आलोचनाओं का स्वागत करते थे। उन्होंने अपने निष्कलंक सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में जिस भी भूमिका का निर्वहन किया, उसमें वे खरे उतरे। एक सांसद, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने जो भी भूमिका निभाई, सभी में अपने दायित्व का निर्वहन किया। राजीव गांधी भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्रांति के प्रथम सूत्रधार थे। आज जिस डिजिटल इंडिया की बात पूरे देश में हो रही है, उसकी आधारशिला राजीव गांधी ने ही रखी थी। संचार क्रांति का शंखनाद कर राजीव देश में कम्प्यूटर क्रांति के जनक बने। विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों तक ने हमारी टेक्नालाॅजी को न केवल स्वीकार किया बल्कि उसकी उच्च गुणवत्ता को विश्व स्तर पर सराहा। राजीव ने जैव प्रौद्योगिकी, परमाणु ऊर्जा, पर्यावरण आदि क्षेत्रों में नए कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया तथा पेयजल, खाद्यान्न, दूरसंचार, कृषि व औद्योगिक क्षेत्रों में भी टेक्नोलाॅजी मिशन गठित किए।

राजीव काा एजेंडा भारत का विकास ही था और विकसित आधुनिक भारत उनका सपना था। असमय इस दुनिया से चले जाने के कारण उनका यह संकल्प अधूरा ही रह गया। राजीव गांधी ने अपने सतत प्रयासों से देश के जनमानस में ऐसी उत्कृष्ट छाप छोड़ी कि उनके दुनिया में नहीं रहने के बाद भी सदियों तक याद किए जाते रहेंगे। ऐसे युग पुरुष का जीवन, उनकी शहादत और स्मृतियां हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेंगी।

(लेखक पूर्व रक्षा उत्पादन, कार्मिक एवं संसदीय कार्य राज्य मंत्री हैं, लेख में उनके अपने विचार हैं।)

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