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भाजपा की रैली में धमाके कानून व्यवस्था पर सवाल

बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी की ‘हुंकार रैली’ के दिन जिस तरहके सीरियल बम ब्लास्ट हुए हैं उससे राज्य सरकार की तैयारी और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

भाजपा की रैली में धमाके कानून व्यवस्था पर सवाल
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बिहार की राजधानी पटना के गांधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी की ‘हुंकार रैली’ के दिन जिस तरहके सीरियल बम ब्लास्ट हुए हैं उससे राज्य सरकार की तैयारी और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। पटना का गांधी मैदान ऐतिहासिक रैलियों के लिए मशहूर रहा है, ऐसी रैलियों में इससे पूर्व वहां धमाकों की संस्कृति कभी नहीं देखी गई थी, ऐसे में इतने बड़े आयोजन के दौरान विस्फोट होना चिंता की बात है। इसे पूरी तरह नीतीश सरकार की विफलता मानी जानी चाहिए। गांधी मैदान ऐसा क्षेत्र है, जिसके चारों तरफ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तर और निवास मौजूद हैं। इसके बाद भी वहां रैली के पूर्व एक के बाद एक पांच धमाके होना और रैली के बाद भी एक धमाका होना गंभीर बात है। पटना में कुल आठ कम क्षमता के बम धमाकों की पुष्टि हुई है। एकधमाका रेलवे स्टेशन पर, छह गांधी मैदान में और एक विस्फोट तब हुआ, जब बम को निष्क्रिय किया जा रहा था। इसमें पांच लोगों की मौत हुई है और सत्तर से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इस हमले के स्वरूप को देखकर लगता हैकि रैली को प्रभावित करने की मंशा से धमाके किए गए। अभी कुछ ही माह पहले बिहार के बोध गया में भी सीरियल ब्लास्ट हुए थे। यह रैली कोई एक दो-दिन पहले प्रस्तावित नहीं थी, बल्कि महीनों पहले यह कार्यक्रम तय किया गया था। रैली स्थान पर पुख्ता सुरक्षा देना राज्य सरकार की जिम्मेवारी होती है। वहां की पुलिस-प्रशासन इसमें पूरी तरह नाकाम रही है। आमतौर पर ऐसे आयोजनों के दौरान सुरक्षा के कड़े इतजाम होते हैं। रैली स्थल पर सुरक्षा का जायजा लेने के लिए बम निरोधक दस्ते भेजे जाते हैं। क्या गांधी मैदान में रैली से पूर्व ये आये थे? यदि आए थे तो फिर धमाके कैसे हो गए? क्या प्रशासन की तैयार इतनी लचर थी कि कोई भी संदिग्ध वस्तु लेकर वहां पहुंच सकता है। इस घटना की गहराईसे तफ्तीश की जानी चाहिए। इसके पीछे जो भी जमाते हैं उनका पर्दाफाश होना चाहिए। और उनकी मंशा क्या थी यह भी देश के सामने आनी चाहिए। चुनावी रैली को खूनी रैली में तब्दील करने के पीछे अंतत: किसका दिमाग था, देश को जानने का हक है। रैली में हिंसा की प्रवृत्ति कहीं से भी जायज नहीं है। रैली और आयोजन करना लोकतांत्रिक अधिकार है। डर दिखाकर कोई इसे छीन नहीं सकता। यह लोकतांत्रिक अधिकार के साथ लोकतंत्र पर हमला है। घटना दिखाती है कि धमाका पूरी तरह सुनियोजित था। यह शर्मनाक स्थित है कि इतनी बड़ी घटना का पुलिस प्रशासन और इंटेलिजेंस को भनक तक नहीं लगी। प्रशासन के मौजूदगी के बीच अपराधी बम रखने में सफल रहे। इतने बड़े आयोजनों के लिए ऐसी उदासीनता के क्या कारण हैं। क्या यह उदासीनता सोची समझी थी? मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इसे गंभीरता से लेनी चाहिए। हालांकि दहशत के बाद भी गांधी मैदान में लोगों का हुजूम बना रहा और रैली शांति से संपन्न हो गई। यहां एक अच्छी बात यह हुई कि नरेंद्र मोदी ने लोगों से शांति की अपील कर संयम बरतने को कहा। यदि भड़काऊ बातें होतीं तो स्थिति और भी खतरनाक हो सकती थी।

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