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महंगाई की चुनौतियों से पार पाती मोदी सरकार

जून-सितंबर के दौरान देश में सामान्य से कम बारिश हुई। यूपीए के शासन काल में महंगाई आम जनता के लिए एक बड़ी समस्या बन गई थी

महंगाई की चुनौतियों से पार पाती मोदी सरकार
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नई दिल्ली. लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने जनता से वादा किया था कि उनकी सरकार आएगी तो वे महंगाई की मार को कम करेंगे और सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की दिशा में काम करेंगे। अब पांच महीने में उनकी सरकार इन दोनों मोचरें पर सफल होती दिख रही है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के अनुसारवित्त वर्ष 2014-15 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश की आर्थिक वृद्धि दर (जीडीपी) 5.7 फीसदी रही। जो कि बीते ढाई साल में सबसे ज्यादा है। गत दिनों आईएमएफ और विश्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ कर दिया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब मंदी के दौर से बाहर आ गई है और यह विकास की ओर अग्रसर है। वहीं अब मुद्रास्फीति के मोच्रे पर भी अच्छी खबर आई है।

थोक महंगाई दर पांच साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। मंगलवार को जारी आंकड़ों के मुताबिक थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति गिरकर सितंबर माह में 2.38 फीसदी पर आ गई। यह पिछले माह अगस्त में 3.74 फीसदी थी। इसके अलावा खुदरा महंगाई दर यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में भी कमी आई है। खुदरा महंगाई दर अगस्त के 7.73 फीसदी के मुकाबले सितंबर में घटकर 6.46 फीसदी रही। खुदरा महंगाई का संबंध, हम अपने आसपास के दुकानों से जिस दर पर सामान खरीदते हैं, उससे होता है।

इसमें गिरावट का अर्थ है कि अब महंगाई को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। वहीं खाद्य वस्तुओं की महंगाई दर भी अगस्त के 9.35 से घटकर सितंबर में 7.67 फीसदी हो गई। अर्थात अब सब्जियों और फलों आदि खानेपीने की वस्तुओं के भाव बढ़ने की रफ्तार सुस्त हुई। अंडे, मछली और मांस के दाम भी सितंबर में अगस्त की तुलना में कम बढ़े। महंगाई के मार्चे पर यह सफलता तब मिली है जब इस बार मानसून काफी देर से आया।

जून-सितंबर के दौरान देश में सामान्य से कम बारिश हुई। यूपीए के शासन काल में महंगाई आम जनता के लिए एक बड़ी समस्या बन गई थी, लेकिन मई में केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में एनडीए की सरकार के आने के बाद कई कड़े कदम उठाए गए। प्याज, आलू व चीनी के निर्यात को नियंत्रित किया गया। साथ ही जमाखोरों पर भी सख्ती बरती गई। सरकारी गोदामों से खाद्य वस्तुओं को बड़े पैमाने पर बाजार में बेचा गया। राजकोषीय नीति में संतुलन बनाते हुए केंद्र सरकार अपने खर्चे पर लगाम लगाए रखी।

इसके अलावा रिर्जव बैंक ने सख्त मौद्रिक नीति की प्रक्रिया जारी रखी। जिसका परिणाम हुआ कि बाजार में संतुलन बना रहा।वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत कम होकर 88 डॉलर प्रति बैरल होना भी काफी फायदेमंद रहा है। यही वजह है कि केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद दो बार पेट्रोल के दाम कम हो चुके हैं। और एक बार फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कटौती की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो आने वाले दिनों में मुद्रास्फीति में और गिरावट देखने को मिलेगी। और फिर रिर्जव बैंक ने जनवरी 2016 तक सीपीआई को छह फीसदी तक लाने का जो लक्ष्य रखा है, उसे पाना काफी आसान हो जाएगा।

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