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नौकरशाहों के लिए आत्मचिंतन का वक्त

पीएम ने अफसरों को आईना दिखाया कि सरकार के दो विभाग आपस में क्यों झगड़ रहे हैं, ये मुझे समझ नहीं आता।

नौकरशाहों के लिए आत्मचिंतन का वक्त
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अगर जनमानस से सवाल पूछा जाय कि विश्व में भारतीय नौकरशाही की पहचान कैसी है? तो जवाब निराशाजनक मिलता है।

अधिकांश लोग मानते हैं कि भारत की नौकरशाही भ्रष्ट है, सुस्त है, संभ्रांत भाव से अहंकारित है, नकारात्मक सोच से ग्रसित है।

उनका समाधान के बजाय समस्या बनाए रखने का एप्रोच है, उनमें विशिष्ट होने का दंभ है। भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार के जितने भी अभियान चलते हैं, उनमें सबसे अधिक हमारे अफसर ही पकड़े जाते हैं।

कदाचार पर ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में भी भारत का स्थान निचले पायदानों में शुमार है। अहम सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों? देश के बेस्ट ब्रेन को अफसर बनने का मौका मिलता है।

वेतन और सुविधाएं भी किसी भी विकसित व अमीर देश से कम नहीं है। उनके पास अधिकार भी बेशुमार हैं, फिर उनका प्रदर्शन इतना लचर क्यों है? उनमें कर्त्तव्यबोध का अभाव क्यों है? इतनी सरकारी योजनाओं के बाद देश में आज भी गरीबों की संख्या क्यों नहीं कम हो पा रही है?

पीडीएस का अनाज, स्कूलों में बच्चों का खाना, छात्रों की छात्रवृत्ति, गभर्वती महिलाओं को सरकारी मदद आदि में भी भ्रष्टाचार क्यों है? समय से सरकारी काम क्यों नहीं पूरा होता है? सरकारी धन का दुरुपयोग क्यों होता है?

समय से ट्रेनें क्यों नहीं चलती हैं? सरकारी शिक्षा व सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत क्यों खस्ता है? सड़कें, बिजली, पेयजल आपूर्ति आदि की हालत खराब क्यों है। इन सवालों के उत्तर सहज नहीं हैं।

हमारी नौकरशाही में जंग लग चुकी है, उसमें नई सोच का अभाव है, उनमें जनसेवा का भाव नहीं है। उसके इस हाल में पहुंचने के लिए हमारी राजनीति भी जिम्मेवार है और खुद नौकशाह भी।

आजादी के बाद नौकशाही के मन में यह भाव पैदा ही नहीं हुआ कि हमें भारत को एक खुशहाल देश बनाना है, एक सुविधा संपन्न देश बनाना है।

कुछ नौकरशाहों ने जरूर ईमानदारी से काम किया है, लेकिन उनकी मात्रा इतनी कम है कि उनका प्रभाव ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है। सिविल सेवा दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नौकरशाही की जड़ सोच को झकझोरा है।

उन्होंने बहुत ही विनम्रता से नौकरशाहों के देश के प्रति सोये स्वाभिमान को जगाया है। मोदी ने कहा कि सबसे मेधावी लोग आईएएस बनते हैं काम भी उसी हिसाब से होना चाहिए। बात सही है।

आप कितने भी कानून बना लीजिए, नियम बना लीजिए, योजनाएं बना लीजिए और प्रशासनिक सुधार के मानदंड तय कर लीजिए, लेकिन इन्हें जमीन पर उतारने वाला अफसर तंत्र अगर कर्मठ नहीं होगा, ईमानदार नहीं होगा, अपनी जिम्मेदारी के प्रति जवाबदेह नहीं होगा, तब तक परिणाम नहीं दिखेगा।

पीएम ने अफसरों को आईना दिखाया कि सरकार के दो विभाग आपस में क्यों झगड़ रहे हैं, ये मुझे समझ नहीं आता। 15 साल से काम रुका क्यों पड़ा है? सिविल सेवा दिवस पर ये आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए। अफसर हर फैसले को राष्ट्रहित के तराजू पर तौलें।

आज एक अवसर आया है स्थितियों को बदलने का। गड्ढा खोदने-भरने से काम नहीं चलेगा, पेड़ भी लगना चाहिए। हम जो काम करें, उसका नतीजा भी निकलना चाहिए। अफसर चाहें तो गंगा साफ हो सकती है।

20 साल में हालात बदले हैं, अगर काम करने के तरीके को बदलेंगे तो चुनौती भी अवसर में बदल जाएगी। सुधार के लिए नौकरशाहों के पास जो सुझाव हैं वे किसी समिति से भी नहीं मिल सकते। लोगों के मन में भाव पैदा कीजिए, अभाव नहीं।

पीएम ने अफसरों को दायित्व बोध कराया है, शायद इस बात को वे समझेंगे। उन्होंने बहुत उचित कहा है कि उन्हें अपना माइंडसेट बदलने की जरूरत है, नया आइडिया व एप्रोच अपनाने की जरूरत है, काम के तरीके में परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

वक्त बदल चुका है। आज प्रतियोगिता का दौर है, हर तरफ चुनौतियां बढ़ी हैं, इसलिए नौकरशाही को बदलने की जरूरत है, लेकिन अगर यह बदलाव नौकरशाही के अंदर से आए तो यह ज्यादा अच्छा होगा।

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