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आलोक पुराणिक का लेख: आपदा में से अवसर तलाश लें

देश में सालाना 6.5 से 7 फीसदी की दर से वृद्धि करने की संभावनाएं हैं। भारत का आंतरिक बाजार बहुत बड़ा है। इसमें विदेशी निवेशकों का आगमन तेज गति से हो जाए तो स्थितियां बहुत अनुकूल बन सकती हैं। कोरोना ने एक साथ चुनौतिंयां पेश की हैं और संभावनाएं भी। आपदाओं में से जो अवसर तलाश ले, वही कामयाब कारोबारी होता है।

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आलोक पुराणिक

भारतीय अर्थव्यवस्था की साख रेटिंग या क्रेडिट रेटिंग मोटे तौर पर जैसी है, उसे मानकर भारत में निवेश किया जा सकता है। यह बात अलग है कि मार्च 2020 के बाद कोरोना के चलते हालात वैसे नहीं रहे हैं, जैसे पहले थे। दरअसल फरवरी 2020 में पेश बजट में जो आंकडे पेश किए गए थे, उनका आधार ही बदल गया है। हालात बिलकुल बदल गए हैं। देश की साख का आकलन गतिशील आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में ही होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था का आकलन भी गतिशील आर्थिक परिस्थितियों के संदर्भ में होगा।

ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पुअर यानी एसएंडपी ने चालू वित्त वर्ष यानी 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 5 फीसदी संकुचन का अनुमान लगाया है, जबकि उसे उम्मीद है कि अगले वित्त वर्ष में देश की आर्थिक वृद्धि दर सुधरकर 8.5 फीसदी रहेगी। चालू वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था सिकुड़ेगी, ऐसा अनुमान अर्थशास्त्री कर रहे हैं। हालांकि स्थितियों को पूरे तौर पर साफ होने में वक्त लगेगा। कोरोना ने तमाम उद्योग धंधों को बहुत अलग अलग तरीके से प्रभावित किया है। कुछ धंधों में तेजी भी कोरोना की वजह से आई है। तमाम आनलाइन कोचिंग कारोबार कोरोना काल में चमक रहे हैं। अभी ऐसी खबरें हैं कि आॅटोमोबाइल उद्योग के दिन बेहतर हो सकते हैं। संक्रमण की आशंकाओं से डरे हुए नागरिक सार्वजनिक परिवहन के बजाए अपनी कार या अपने दोपहिया वाहन को वरीयता देंगे, ऐसे आकलन सामने आना शुरू हुए हैं। इस वजह से उस आॅटोमोबाइल उद्योग में तेजी देखने को मिल सकती है, जो लंबे अरसे से मंदी का रोना रो रहा है।

किसी भी रेटिंग का विश्लेषण कई तरीके से किया जाना चाहिए। कोई भी रेटिंग तमाम तरह के कारकों से प्रभावित होती है। भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को कई तरह से विश्लेषित करने पर साफ होता है कि कई मायनों में तो इसमें अभूतपूर्व तेजी आई है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार इतिहास में पहली बार 500 अरब डॉलर के पार हो गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बताया कि 5 जून 2020 को समाप्त हुए सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 8.22 अरब डॉलर बढ़ गया और कुल भंडार 501.70 अरब डॉलर का हो गया। मजबूत विदेशी भंडार से किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती का पता चलता है। इसलिए वर्तमान संकट की तुलना 1991 से नहीं की जा सकती। उस वक्त तो विदेशी मुद्रा के संकट ने भारत को दुनिया भर के कर्जदाताओं के सामने हाथ फैलाने पर मजबूर कर दिया था। अब स्थिति खराब होने के बावजूद विदेशी मुद्रा कोष के मामले में खराब नहीं है। बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार का ऊंचा स्तर भारतीय नीति निर्धारकों और विदेशी निवेशकों के विश्वास में बढ़ोत्तरी कर रहा है।

कोरोना ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं का हाल चौपट कर दिया है। कुछ का हाल बहुत खराब किया है, कुछ कम खराब किया है। ऐसी सूरत में दुनिया भर के निवेशकों को ऐसी अर्थव्यवस्थाओं की तलाश है, जहां देर सवेर हालात बेहतर होंगे। भारत में विदेशी मुद्रा कोष के मजबूत होने के पीछे एक वजह यह है कि निवेशकों को संभावनाएं दिख रही हैं, दुनिया भर की बाकी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले।

हाल में मुख्य आर्थिक सलाहकार ने करीब एक शताब्दी पहले के स्पैनिश फ्लू का हवाला देते हुए कहा कि उस दौरान दुनिया की एक तिहाई आबादी संक्रमित थी जबकि अभी सिर्फ एक फीसदी आबादी संक्रमित है। स्पैनिश फ्लू के दौरान संक्रमण की मृत्यु दर 10 फीसदी थी जबकि अभी 3.4 फीसदी है। यानी कुल मिलाकर हालात खराब होने के बावजूद उतने खराब नहीं हैं, जितने खराब हाल यह दुनिया देख चुकी है। मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार भारत की कर्ज चुकाने की क्षमता काफी बेहतर है और वह बेहतर रेटिंग का हकदार है। यह बहुत बड़ी बात है।

यानी भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुत नकारात्मक तरीके से भी नहीं देखा जाना चाहिए, खासकर मध्यम और दीर्घकाल के संदर्भ में। बहुत संभव है कि कुछ महीने परेशानियों के रहें, संकट के रहें, पर सब कुछ कभी नहीं डूबता और इस बार भी नहीं डूबेगा। वापसी होगी खरीदार की, ग्राहकों की। कोरोना का इंतजाम भी देर सबेर होगा ही। यह बात अपनी जगह बिलकुल सही है कि कोरोना ने कई कारोबारों को बुरी तरह तोड़कर रख दिया है। पर तमाम तरह के पैकेजों और नीतियों के कारण और कारोबारियों की अपनी जिजीविषा के कारण हालत सुधरेंगे, ऐसी उम्मीद लगायी जा सकती है। साल के शुरू में भारत में पीपीई पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट नहीं बनते थे, इसके लिए भी चीन पर निर्भरता थी। अब भारत पीपीई को निर्यात करने की स्थिति में है। यानी भारतीय कारोबारियों की संघर्ष क्षमता और जिजीविषा को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

हां, अर्थव्यवस्था के एक हिस्से के लिए अस्तित्व का संघर्ष बना हुआ है। मनरेगा का बजट बढ़ाया गया है। जरुरत हो तो और भी बढ़ाया जाना चाहिए। कुल मिलाकर स्थितियों से मुकाबले के लिए भारतीय अर्थव्यवस्था जून 2020 में मई 2020 के मुकाबले ज्यादा मजबूती से तैयार है। अनुभवों ने बहुत कुछ सिखाया है। अब जरुरत यह है कि केंद्र और राज्य सरकारों में आर्थिक नीतियों में समन्वय हो। विदेशों से आ रहे निवेशकों को जमीन आवंटन से लेकर तमाम मसलों पर दिक्कतें न झेलनी पड़ें, यह सुनिश्चित करना केंद्र सरकार के अलावा राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी है।

एस एंड पी के अनुसार मध्यम से दीर्घावधि में देश में सालाना 6.5 से 7 फीसदी की दर से वृद्धि करने की संभावनाएं हैं। भारत का आंतरिक बाजार बहुत बड़ा है। इसमें विदेशी निवेशकों का आगमन तेज गति से हो जाए तो स्थितियां बहुत अनुकूल बन सकती हैं। चीन से मुंह मोड़ रहीं तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत का रुख कर सकती हैं। यानी 6.5 प्रतिशत से 7 फीसदी विकास की नींव कोरोना काल में रखी जा सकती है। कोरोना ने एक साथ चुनौतिंयां पेश की हैं और संभावनाएं भी। आपदाओं में से जो अवसर तलाश ले, वही कामयाब कारोबारी होता है। हम बहुतों का उदय होते हुए भी देखेंगे।

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