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प्रमोद जोशी का लेख : सियासी हथियार ना बने राजद्रोह

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा दूसरा मामला राजद्रोह कानून का है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजद्रोह कानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए किया था, तो क्या आजादी के 75 साल बाद भी इसे जारी रखने की जरूरत है? जांच और फैसले जल्दी होने चाहिए। साथ ही राजद्रोह-कानून को राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए। यह कानून उत्पीड़न का औजार बनता है। इन अभियुक्तों की जमानत पर रिहाई नहीं होती। आरोप लगना और गिरफ्तारी होना ही सजा है। लंबी कैद के बाद व्यक्ति रिहा होता है, तो काफी कुछ खो चुका होता है। न्याय तो तब है जब साफ आरोप लगे और फैसला फौरन हो। राजद्रोह गंभीर आरोप है। बात-बात पर राजद्रोह के मुकदमे कायम होंगे, तो उसका महत्व कम होगा।

प्रमोद जोशी का लेख : सियासी हथियार ना बने राजद्रोह
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प्रमोद जोशी

प्रमोद जोशी

लोकतंत्र के कुछ बुनियादी आधारों को लेकर देश में कुछ समय से जो बहस चल रही है, उससे जुड़े दो मामले पिछले हफ्ते अदालत में उठे। सोमवार को उच्चतम न्यायालय ने हैरत जताई कि अब भी आईटी कानून की धारा 66ए के तहत लोगों पर मुकदमे चलाए जा रहे हैं, जबकि इसे सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च, 2015 को असंवैधानिक घोषित किया था। पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ अदालत में यह मामला लेकर गई थी। दो साल पहले इस संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस कानून के रद होने के बाद कम से कम 22 लोगों पर इसके तहत मुकदमे चलाए गए हैं। अदालत की हैरानी के बाद अब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे थानों को 66-ए के तहत मामले दर्ज न करने के निर्देश दें। अनुमान लगाया जा सकता है कि देश में कानूनों के अनुपालन के नाम पर कैसी अराजकता है।

राजद्रोह कानून

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा दूसरा मामला राजद्रोह कानून का है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजद्रोह कानून का इस्तेमाल अंग्रेजों ने स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए किया था, तो क्या आजादी के 75 साल बाद भी इसे जारी रखने की जरूरत है? अदालत में एक रिटायर मेजर जनरल ने धारा-124ए (राजद्रोह) कानून के वैधानिकता को चुनौती दी है। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अगुवाई वाले पीठ ने इस याचिका के परीक्षण का फैसला किया है। अदालत ने कहा कि सरकार कई कानूनों को खत्म कर चुकी है। इसे क्यों नहीं देखा गया? अदालत ने यह भी कहा कि यह फैसला नहीं है, हमने जो सोचा है उसका संकेत है। पिछले दो महीनों में राजद्रोह कानून को लेकर जो बहस शुरू हुई है उसे तार्किक परिणति तक पहुंचना चाहिए। मसला कानून को खत्म करने से ज्यादा इसके दुरुपयोग से जुड़ा है। धारा 66ए निरस्त है, फिर भी अधिकारी उसका इस्तेमाल करते हैं। लोगों को गिरफ्तार किया जाता है। कोई जवाबदेही नहीं। कोई पुलिस ऑफिसर गांवों के दूर दराज इलाकों में किसी शख्स के खिलाफ राजद्रोह कानून का आसानी से इस्तेमाल कर सकता है। जुआरियों पर राजद्रोह का आरोप।

इसी दौरान अदालत में एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की ओर से अलग से अर्जी दाखिल की गई है, जिसमें राजद्रोह कानून के प्रावधान को चुनौती दी गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अर्जी पर भी सुनवाई के लिए सहमति दे दी। अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच में राजद्रोह कानून को चुनौती वाली याचिका विचाराधीन है। दो पत्रकारों की याचिका पर 27 जुलाई को सुनवाई होनी है।

राजद्रोह और देशद्रोह

इस विषय को व्यावहारिकता की रोशनी में देखना चाहिए। राजद्रोह और देशद्रोह के अंतर को भी समझने की जरूरत है। सरकार या सरकारी नीतियों के प्रति असंतोष व्यक्त करने की सीमा-रेखा भी तय होनी चाहिए। इस साल 26 जनवरी को लालकिले पर जो हुआ, क्या उसे स्वस्थ लोकतांत्रिक-विरोध के दायरे में रखा जाएगा? वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ राजद्रोह के एक मामले को रद करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने 3 जून को कहा था कि पत्रकारों को राजद्रोह के दंडात्मक प्रावधानों से तब तक सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए, जब तक कि उनकी खबर से हिंसा भड़कना या सार्वजनिक शांति भंग होना साबित न हुआ हो। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी नागरिक को सरकार की आलोचना और टिप्पणी करने का हक है, बशर्ते वह लोगों को सरकार के खिलाफ हिंसा करने के लिए प्रेरित न करे। अलबत्ता कोर्ट ने इस मांग को ठुकरा दिया कि अनुभवी पत्रकारों पर राजद्रोह केस दर्ज करने से पहले हाईकोर्ट जज की कमेटी से मंजूरी ली जाए। विनोद दुआ के मामले पर फैसले के एक हफ्ते पहले अदालत ने एक और मामले में आंध्र प्रदेश पुलिस को दो टीवी चैनलों के ख़िलाफ़ राजद्रोह के आरोप में दंडात्मक कार्रवाई से रोकते हुए कहा कि राजद्रोह से जुड़ी आईपीसी की धारा 124-ए की व्याख्या करने की जरूरत है। इस कानून के इस्तेमाल से प्रेस की स्वतंत्रता पर पड़ने वाले असर की व्याख्या भी होनी चाहिए।

आलोचना का अधिकार

संविधान का अनुच्छेद 19(1) ए नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है। इस पर पाबंदियां भी हैं। अनुच्छेद 19(2) ए में कहा गया है कि अनुच्छेद 19(1)ए के होते हुए भी भारत की एकता और अखंडता, देश की सुरक्षा, वैदेशिक रिश्तों, लोक-व्यवस्था, मानहानि, अश्लीलता आदि के मद्देनज़र इस अधिकार को नियंत्रित तथा सीमित किया जा सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा 121-ए तथा 124-ए के अंतर्गत राजद्रोह दंडनीय अपराध है। 124-ए में उन गतिविधियों के तीन स्पष्टीकरण हैं, जिन्हें राजद्रोह माना जा सकता है। इन स्पष्टीकरणों के बाद भी केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि जब तक सशस्त्र विद्रोह या हिंसा के इस्तेमाल की अपील न हो, तब तक कुछ भी राजद्रोह नहीं है। राष्ट्र-राज्य से असहमति देशद्रोह नहीं है। फिर भी केदारनाथ मामले में कोर्ट ने राजद्रोह-कानूनों की वैधानिकता को स्वीकार किया था। उसने उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया था, जिनमें इन कानूनों को लागू किया जा सकता है। अब विचार यह हो रहा है कि इस कानून की जरूरत है या नहीं, तब यह सवाल भी उठेगा कि 26 जनवरी को दिल्ली में जो हुआ, वह क्या था? टूलकिट मामले में दिशा रवि को जमानत पर रिहा करते समय कोर्ट ने कहा था कि केवल सरकार की आलोचना राजद्रोह नहीं है। यह भी पूछा जाएगा कि देश-विरुद्ध 'हाइब्रिड वॉर' किसे मानेंगे? उस आंदोलन के पीछे की मंशा क्या थी?

आलोचना से आगे

असमंजस इसलिए पैदा होता है, क्योंकि राजद्रोह और देशद्रोह एक जैसे शब्द लगते हैं। इनके अर्थ अलग हैं और कानून इन्हें एक जैसा नहीं मानता। आईपीसी की व्यवस्था केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं है। देशद्रोह की सजा मृत्युदंड तक है, वहीं राजद्रोह की सजा तीन साल से लेकर उम्रकैद तक है। सन 2010 में लेखिका अरुंधति रॉय ने एक गोष्ठी में कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग कभी नहीं रहा। चूंकि उन्होंने सार्वजनिक सभा में ऐसा कहा था, इसलिए उस बयान की सरगर्मी काफी समय तक रही। फिर 2012 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को एक कार्टून के लेकर गिरफ्तार किया गया। तमिलनाडु के कुडानकुलम में नाभिकीय बिजलीघर-विरोधी आंदोलनकारियों पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए। फरवरी 2016 में जेएनयू कैम्पस में 'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी' और 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाल्लाह-इंशाल्लाह' के नारों का आरोप लगा। छात्रसंघ-अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी हुई। न्यायिक प्रक्रिया शायद अब भी जारी है, पर इस मामले में निर्णायक कुछ नहीं हो सका। इससे जुड़े कई तरह के सवाल हैं। नारे लगे या नहीं। लगे, तो किसने लगाए?

जांच और फैसले जल्दी होने चाहिए। साथ ही राजद्रोह-कानून को राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए। यह कानून उत्पीड़न का औजार बनता है। इन अभियुक्तों की जमानत पर रिहाई नहीं होती। आरोप लगना और गिरफ्तारी होना ही सजा है। लंबी कैद के बाद व्यक्ति रिहा होता है, तो काफी कुछ खो चुका होता है। न्याय तो तब है जब साफ आरोप लगे और फैसला फौरन हो। राजद्रोह गंभीर आरोप है। बात-बात पर राजद्रोह के मुकदमे कायम होंगे, तो उसका महत्व कम होगा।

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