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विनोद पाठक का लेख : पुराने हो रहे बांधों की सुरक्षा जरूरी

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो बांधों के मामले में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं। पहले नंबर पर चीन और दूसरे पर अमेरिका है। बांधों के राष्ट्रीय रजिस्टर के अनुसार देश में 5334 बांधों का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि 411 बांध निर्माणाधीन हैं। देश की विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के बांध सालाना लगभग 300 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण करते हैं, लेकिन ये बांध लगातार पुराने हो रहे हैं। लगभग 80% बांधों की उम्र 25 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इनमें से 227 बांधों की आयु 100 साल से ज्यादा हो चुकी है। बांधों की सुरक्षा एक अंतरराज्यीय विषय है। ऐसे में बांधों की सुरक्षा को लेकर पूरे देशभर का एक कानूनन वैध कॉमन प्रोटोकॉल बनाया जाए।

विनोद पाठक का लेख : पुराने हो रहे बांधों की सुरक्षा जरूरी
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विनोद पाठक

विनोद पाठक

जल से मानव का संबंध चिरंतन है। जल के बगैर हम सृष्टि के अस्तित्व की कल्पना तक नहीं कर सकते। यही वजह है कि विश्व की तमाम मानव सभ्ययताएं किसी न किसी नदी के किनारे विकसित हुईं। मानव सभ्यताओं की विकास यात्रा के क्रम में जैसे-जैसे पानी की मांग में वृद्धि होती गई, वैसे-वैसे बांध बनाकर नदियों के बहते हुए जल का संचय करने का चलन भी दुनिया भर में आरंभ हो गया। बाढ़ की समस्या से निपटने और पानी सहेजने के मकसद से विश्व के तमाम देश प्राचीनकाल से ही बांधों का निर्माण करते आए हैं। आधुनिक युग में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति से संबंधित आवश्यकताओं को पूरा करने तथा पन-बिजली के उत्पादन के मद्देनजर दुनियाभर में हजारों की संख्यात में बांधों का निर्माण हुआ। यदि बड़े बांधों की बात करें तो दुनिया भर में अब तक 50 हजार से ज्यादा बांध बनाए जा चुके हैं।

इतिहास साक्षी है कि विश्व का सबसे प्राचीन मानव निर्मित बांध 3000 ईसा पूर्व में तत्कालीन मेसोपोटामिया में बनाया गया। वहां पर बाकायदा बांधों की एक श्रृंखला बनाई गई थी। मेसोपोटामिया के अतिरिक्त इजिप्ट, रोम, श्रीलंका जैसे देशों में भी ईसा पूर्व में भी अनेक बांध बनाए जाने के उल्लेख मिलते हैं। भारत में चोल राजवंश द्वारा ग्रांड एनीकट (grand anicut) नाम से जो बांध कावेरी नदी पर बनाया गया, उसे देश के प्राचीनतम बांध के रूप में स्वी कार किया जाता है।

आंकड़ों की दृष्टि से देखें तो बांधों के मामले में हम दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं। पहले नंबर पर चीन और दूसरे पर अमेरिका है। बांधों के राष्ट्रीय रजिस्टर के अनुसार देश में 5334 बांधों का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि 411 बांध निर्माणाधीन हैं। देश की विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के बांध सालाना लगभग 300 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण करते हैं, लेकिन ये बांध लगातार पुराने हो रहे हैं। लगभग 80% बांधों की उम्र 25 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इनमें से 227 बांधों की आयु 100 साल से ज्यादा हो चुकी है। राज्यों की बात करें तो सबसे अधिक 2394 बांध अकेले महाराष्ट्र में हैं, जबकि दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश और तीसरे पर गुजरात है। देश में राष्ट्रीय महत्व वाले बांध की संख्या 65 है। इनमें से 11 निर्माणाधीन हैं। राष्ट्रीय महत्व के बांधों की श्रेणी में ऐसे बांधों को शामिल किया जाता है, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक हो या बांध की स्टोरेज क्षमता 1 बिलियन क्यूबिक मीटर से अधिक हो।

देश की विभिन्न जरूरतों को पूरा करने के लिए भारत के बांध सालाना लगभग 300 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण करते हैं, लेकिन ये बांध लगातार पुराने हो रहे हैं। लगभग 80% बांधों की उम्र 25 वर्ष से अधिक हो चुकी है। इनमें से 227 बांधों की आयु 100 साल से ज्यादा हो चुकी है। राज्यों की बात करें सबसे अधिक 2394 बांध अकेले महाराष्ट्र में हैं, जबकि दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश और तीसरे पर गुजरात है।

भारत में जो कुल बांध हैं, उनमें से 92% ऐसे हैं, जो इंटर स्टेट रिवर बेसिन पर स्थित नदियों पर बने हुए हैं। महत्वटपूर्ण यह भी है कि बांधों की सुरक्षा एक अंतरराज्यीय विषय है। ऐसे में यह बड़ा जरूरी था कि बांधों की सुरक्षा को लेकर पूरे देशभर का एक कानूनन वैध कॉमन प्रोटोकॉल बनाया जाए। इस दृष्टि से बांध सुरक्षा विधेयक को संसद के दोनों सदनों की स्वीकृति मिलना बेहद महत्वपूर्ण है। सही मायनों में बांध सुरक्षा की दिशा में केंद्र सरकार का यह कदम बेहद सार्थक है। यह एक मील का पत्थर साबित होगा। देश में बांधों की विफलता या क्षतिग्रस्तस होने की घटनाओं में 15 हजार से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी है, लेकिन इन घटनाओं से सबक नहीं लिया गया। विभिन्न राज्य एक-दूसरे पर जिम्मेसदारी थोपने में मशगूल रहे। हालांकि, वर्ष 2010 में पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश की सरकार ने अपनी-अपनी विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार और संसद से आग्रह किया था कि आप एक ऐसा बिल प्रस्तुत करें, एक ऐसा कानून बनाएं, जिसे हम भी अपने यहां लागू करें और देश के अन्य प्रांतों में भी उसको एडॉप्ट किया जा सके। उसके बाद एक विधेयक सदन में प्रस्तुत हुआ, जिसे बाद में स्टैंडिंग कमेटी को भेज दिया गया। स्टैंडिंग कमेटी ने इस विधेयक पर विचार किया और अपनी तरफ से संशोधन कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। स्टैंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट (2011) में देश के बांधों की सुरक्षा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, बांध सुरक्षा पर विधेयक के निर्माण में अनुचित देरी पर चिंता व्यक्त की। इस समिति ने संविधान की संघ सूची की प्रविष्टि 56 का उल्लेख करते हुए यह भी कहा था कि यदि बांध सुरक्षा के लिए कानून बनाना जनहित में आवश्यक है तो संसद इस प्रकार का कानून बना सकती है। इसके बाद देश के सॉलिसिटर जनरल ने कहा था कि संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-1 की प्रविष्टि 56 और प्रविष्टि 97 के साथ पठित अनुच्छेद 246 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करके बांध सुरक्षा विधेयक पारित किया जा सकता है। बांध सुरक्षा विधेयक, 2019 पर लोकसभा ने 2 अगस्त 2019 को मुहर लगाई थी, जिसके ठीक दो साल बाद 2 अगस्तर, 2021 को इसे राज्यसभा ने भी पारित कर दिया। अब अधिनियम और नियम बनने के साथ ही देश में बांध सुरक्षा का पूरा स्ट्रक्चर खड़ा होगा। दोनों सदनों में कानून पर मुहर लगने के दौरान बांध क्षतिग्रस्ति होने की घटना की संख्या देश में 41 से बढ़कर 42 हो गई। जिम्मेदारी और जवाबदेही अभी तक के संगठन स्ट्राक्चर में नहीं है, जिसकी वजह से आंध्र प्रदेश के अन्नामाय्या बांध जैसे हादसे की आशंका पर अंकुश लगाने में दिक्केतें आती रही हैं। अन्नामाय्या बांध पर एकाएक पानी आने पर जब गेट खोलकर पानी निकालने का फैसला किया गया तो वह पांचवां गेट नहीं खुल सका, क्योंतकि वह फंक्शनल नहीं था।

यूं तो बांध क्षतिग्रस्त होने की घटनाएं ना सिर्फ मानवीय जीवन, बल्कि मवेशियों और पेड़, फसल को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन देश में सबसे विनाशकारी और सबसे बड़ा हादसा 1979 में गुजरात के मोरबी में मच्छु बांध टूटने का है। उस दुर्घटना में 15 हजार से ज्यादा लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने संसद में कहा है कि बांधों की उम्र से उनकी सेहत का कोई संबंध ठहराना अनुचित होगा, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उम्रदराज होते बांधों के रख-रखाव और प्रबंधन पर विशेष रूप से ध्याान देने की जरूर होती है। पूरा विश्व इस हकीकत को स्वीकार करता है। अभी तक बांध सुरक्षा को लेकर देश में राष्ट्रीय स्तर पर दो संस्थाएं काम करती हैं, नेशनल कमेटी ऑन डैम सेफ्टी और केंद्रीय जल आयोग का डैम सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन। ठीक इसी तरह राज्यों में भी दो-दो स्तरीय व्यवस्था अपनाई गई है, लेकिन यह चारों संस्थाएं महज सलाहकारी भूमिका में काम करती है। इन्हें किसी भी तरह की संवैधानिक शक्ति प्राप्त नहीं है। विधेयक में भी दो स्तरीय व्यवस्थाओं का प्रावधान किया गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं।)

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