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डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : काली कमाई के धनकुबेरों पर शिकंजा

देश में काले धन के कुबेरों पर छापा मारना और विदेशी बैंकों में जमा कालेधन के खाताधारकों की सूची मिलने की खबर मात्र को बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सफलता तभी मानी जाएगी जब देश में सृजित हो रहे कालेधन पर कठोर नियंत्रण दिखाई देगा और विदेशों में शैल कंपनियों में जमा अधिकांश कालाधन सरकारी खातों में वापस आ जाएगा। ऐसे में अब सरकार द्वारा देश में कालेधन कुबेरों के ठिकानों और उनके द्वारा टैक्स हैवन्स देशों में शैल कंपनियों में निवेशित की जा रही काली संपत्तियों के कर चोरी के मामलों पर कड़ा शिकंजा कसा जाना जरूरी है।

डॉ. जयंतीलाल भंडारी का लेख : काली कमाई के धनकुबेरों पर शिकंजा
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डॉ. जयंतीलाल भंडारी 

डॉ. जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में एक ओर कानपुर के इत्र कारोबारियों से अरबों रुपयों का कालाधन मिलने तथा दूसरी ओर ऐश्वर्या राय बच्चन से 20 दिसंबर को ईडी के द्वारा पनामा पेपर्स के मामले में की गई पूछताछ के बाद देशभर में यह गंभीर चर्चा का विषय है कि सरकार के द्वारा कालेधन पर कठोर अंकुश के बाद भी काला धन कैसे फल-फूल रहा है और विदेशों में काली कमाई जमा करने वाले निवेशकों पर जांच का सामान्य रूटिन ही क्यों बना हुआ है ?

सरल भाषा में कालाधन वह धन होता है, जिसका लेखा-जोखा नहीं होता है और जिस पर आयकर की देनदारी छिपाई जाती है। जहां कई उद्यमी और कारोबारी अपने खातों में हेराफेरी करके कालाधन इकट्ठा करते हैं, वहीं कई सरकारी अधिकारी-कर्मचारी रिश्वत व भ्रष्टाचार से इसे सृजित करते हैं। आपराधिक गतिविधियां जैसे अपहरण, निजी क्षेत्र में कार्यरत लोगों द्वारा की गई जालसाजी इत्यादि के माध्यम से अर्जित धन भी कालाधन कहलाता है। कालाधन महंगाई बढ़ाने और अनैतिक गतिविधियों को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। इसका विकास पर असर होता है।

उल्लेखनीय है कि भ्रष्ट राजनेताओं से लेकर, नौकरशाह, उद्यमी-कारोबारी, तस्कर और अपराधी तक अपने कालेधन को हवाला ट्रान्सफर के जरिये टैक्स हैवन्स देशों की शैल कंपनियों में सरलता से जमा करके टैक्स देयता से बच जाते हैं। टैक्स हैवन देश वे होते हैं, जहां नकली(शैल) कंपनियां बनाना आसान होता है और बहुत कम टैक्स या शून्य टैक्स लगता है। इन देशों में ऐसे क़ानून होते हैं, जिससे कंपनी के मालिक की पहचान का पता लगा पाना मुश्किल हो। टैक्स हैवन देशों की शैल कंपनियों में विश्व की कई ऊंची हस्तियां अपना कालाधन जमा करती हैं। बड़ी संख्या में भारत की हस्तियां भी अपने कालेधन को विदेशों की शैल कंपनियों में जमा करने के बाद उसे फिर भारत में ही सफेद धन में परिवर्तित करते हुए दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि पिछले दिसंबर माह में शीतकालीन सत्र में संसद में बताया गया है कि पनामा तथा पैराडाइज पेपर लीक मामले में भारत से संबद्ध 930 इकाइयों के संबंध में 20,353 करोड़ रुपये की राशि के कुल अघोषित जमा का पता चला है। 'इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स' (आईसीआईजे) के खुलासा किए मामलों में की गई निरंतर जांच से अब तक अघोषित विदेशी खातों में 11,010 करोड़ रुपये से अधिक जमा का पता चला है। जहां पनामा पेपर्स और पैराडाइज पेपर्स के खुलासे होने पर केंद्र सरकार के द्वारा देश की मशूहर हस्तियों की विदेश में गुप्त वित्तीय संपत्तियों की विस्तृत जानकारी हेतु बहु-एजेंसी जांच कराई जा रही है, वहीं अक्टूबर 2021 से पैंडोरा पेपर्स के संबंध में मल्टी एजेंसी ग्रुप (एमएजी) के द्वारा लगातार बैठकें करके जांच शुरू कर दी गई है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) के प्रमुख जेबी महापात्रा की अध्यक्षता में आयोजित इन बैठकों में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), रिजर्व बैंक और वित्तीय इंटेलीजेंस यूनिट के अधिकारी शामिल हो रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में 'इंटरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट्स' के द्वारा अक्टूबर 2021 की शुरुआत में प्रकाशित पैंडोरा पेपर्स रिपोर्ट लगभग 1.2 करोड़ दस्तावेज़ों का एक ऐसी पड़ताल है, जिसे 117 देशों के 600 खोजी पत्रकारों की मदद से तैयार किया गया है। इस पड़ताल में पाया गया है कि भारत सहित दुनियाभर के 200 से ज्यादा देशों के बड़े नेताओं, अरबपतियों और मशहूर हास्तियों ने विदेशों में धन बचाने और अपने कालेधन के गोपनीय निवेश के लिए किस तरह टैक्स पनाहगाह देशों ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, सेशेल्स, हांगकांग और बेलीज आदि में छुपाकर सुरक्षित किया हुआ है। इस रिपोर्ट में 300 से अधिक भारतीयों के नाम भी शामिल हैं। इनमें अनिल अंबानी, विनोद अडाणी, सचिन तेंडुलकर, जैकी श्राफ, करण मजूमदार, नीरा राडिया, सतीश शर्मा आदि शामिल हैं।

ज्ञातव्य है कि वर्ष 2017 में पैराडाइज़ पेपर्स के तहत 1.34 करोड़ से अधिक गोपनीय इलेक्ट्रानिक दस्तावेजों के माध्यम से ने 70 लाख लोन समझौते, वित्तीय विवरण, ई-मेल और ट्रस्ट डीड लीक किए थे । इनमें 714 भारतीयों के नाम उजागर हुए थे। इसके पहले वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स के तहत 1 करोड़ 15 लाख संवेदनशील वित्तीय दस्तावेज लीक किए थे। इसमें वैश्विक कॉरपोरेटों के 'मनी लॉन्िड्रंग' के रिकॉर्ड थे। 500 भारतीयों के नाम भी सामने आए थे। ये विभिन्न लीक फ़ाइलें बताती हैं कि कैसे दुनिया के कुछ सबसे शक्तिशाली लोग अपनी संपत्ति छिपाने के लिए टैक्स हैवन्स देशों में स्थित शैल कंपनियों का इस्तेमाल करते हैं। निश्चित रूप से पैंडोरा, पनामा और पैराडाइज पेपर्स लीक जैसे मामलों में में कई मशहूर भारतीयों के नाम उजागर होने से कालेधन को देश के बाहर भेजे जाने की कहानियां सामने आ जाती हैं। इनसे मालूम होता है कि देश में कालाधन इकट्ठा होना और उसे गोपनीय रूप से विदेशों में भेजे जाने की रफ्तार बढ़ रही है। निश्चित रूप से भारत में कालेधन पर बहस दशकों पुरानी है।

भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में चोरी से संबंधित अधिकृत आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन अर्थविशेषज्ञ आर वैद्यनाथन ने अनुमान लगाया है कि इसकी मात्रा करीब 72.8 लाख करोड़ रु. है। स्विस नेशनल बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 तक स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों और कंपनियों का जमा धन 20,700 करोड़ रुपये से अधिक है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि देश में भी कालेधन से निपटने के लिए अब से पहले इनकम डिक्लेरेशन स्कीम, वॉलंट्री डिस्क्लोज़र स्कीम, टैक्स रेट को कम करना, 1991 के बाद व्यापार पर कंट्रोल हटाना, क़ानूनों में बदलाव जैसे कई कदम उठाए गए हैं। खासतौर से पिछले 6-7 वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कालाधन बढ़ने से रोकने हेतु कानून भी बनाए गए हैं। लेकिन विभिन्न कानूनों के बावजूद कालेधन की वृद्धि और कालेधन को विदेश भेजे जाने की मात्रा में कोई प्रभावी कमी नहीं आई है। निश्चित रूप से अब देश में कानपुर के इत्र कारोबारियों जैसे अनेक कालेधन की जब्ती के मामले और पनामा, पैराडाइज और पैंडोरा पेपर्स लीक मामले में जांच संबंधी किए गए खुलासे कर चोरी की पनाहगाहों के अंधेरे में जमा धन के अपार भंडार के चौकाने वाले खुलासे हैं। ऐसे में देश में काले धन के कुबेरों पर छापा मारना और विदेशी बैंकों में जमा कालेधन के खाताधारकों की सूची मिलने की खबर मात्र को बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता है। सफलता तभी मानी जाएगी जब देश में सृजित हो रहे कालेधन पर कठोर नियंत्रण दिखाई देगा और विदेशों में शैल कंपनियों में जमा अधिकांश कालाधन सरकारी खातों में वापस आ जाएगा।

ऐसे में अब सरकार के द्वारा देश में कालेधन कुबेरों के ठिकानों और उनके द्वारा टैक्स हैवन्स देशों में शैल कंपनियों में निवेशित की जा रही काली संपत्तियों के कर चोरी के मामलों पर कड़ा शिकंजा कसा जाना जरूरी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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