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एससीओ से यूरेशिया में भारत की पैठ बढ़ेगी

1996 में एससीओ का गठन हुआ था।

एससीओ से यूरेशिया में भारत की पैठ बढ़ेगी
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भारत का शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का पूर्णकालिक सदस्य बनना यूरेशियन बेल्ट में कूटनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में अहम कदम है। पर्यवेक्षक के तौर पर भारत करीब एक दशक से इस संगठन से जुड़ा हुआ था।

1996 में एससीओ का गठन हुआ था। उस समय छह देश इसके सदस्य थे। चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान। अब भारत और पाकिस्तान भी इस संगठन के पूर्ण सदस्य बन गए हैं।

ईरान, अफगानिस्तान, बेलारूस और मंगोलिया अभी पर्यवेक्षक देश के रूप में एससीओ से जुड़े हुए हैं। निकट भविष्य में ये देश भी एससीओ के सदस्य बन सकते हैं। एससीओ गठन का मुख्य लक्ष्य सदस्य यूरेशियन देशों के बीच राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य सहयोग बढ़ाना है।

एससीओ का बड़ा मकसद सदस्य देशों के बीच सीमा पर विश्वास बहाली और सैन्य बल में कटौती करना है। विश्व में चीन एक ऐसा देश है जिसकी सीमा सबसे अधिक देशों से लगती है और चीन का लगभग सभी सीमावर्ती देशों से सीमा विवाद है।

भारत का भी चीन और पाक के साथ सीमा पर तनाव है, उसको देखते हुए भारत का एससीओ का पूर्ण सदस्य बनने के बाद चीन और पाक पर सीमा पर तनाव कम करने के लिए नैतिक दबाव जरूर बनेगा। हालांकि चीन और पाक दोनों भरोसे के लायक नहीं हैं।

एससीओ का लक्ष्य यूरेशिया में आर्थिक सहयोग बढ़ाना है। खास कर ऊर्जा के क्षेत्र में और जल स्रोत के साझा उपयोग करने में। भारत एससीओ सदस्यों के साथ तेल और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में लाभ ले सकता है।

जल क्षेत्र के साझा उपयोग से भारत को दक्षिण चीन सागर और पर्सियन खाड़ी में आवागमन में सहायता मिल सकती है।

इसके अलावा एससीओ के अस्ताना सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद को मानवता का दुश्मन बताते हुए इसको पालने-पोसने और प्रायोजित करने वालों के खिलाफ सभी सदस्य देशों को एकजुट होकर लड़ने की अपील की है।

एससीओ के सभी सदस्य देश जानते हैं कि भारत पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से पीड़ित है। आतंकवाद को रोकने के लिए पाकिस्तान पर दबाव बनाने में एससीओ कितना सफल होता है,

यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा करने के लिए भारत को एससीओ के रूप में एक और मंच जरूर मिल गया है। भारत को यह भी मानकर चलना चाहिए कि एससीओ चीन का आइडिया है और नाटो व अमेरिका को ध्यान में रखकर इसको एक शक्ति मंच के रूप में खड़ा करने के लिए बनाया है।

चीन पूर्व में अमेरिका को एससीओ की सदस्यता देने से इनकार कर चुका है। पाकिस्तान को सदस्यता सीपेक के स्वार्थ के चलते दी गई लगती है, जबकि भारत को आर्थिक मजबूरी व चीनी कंपनियों के दबाव के चलते सदस्यता दी गई लगती है।

इसलिए भारत के लिए यही अच्छा होगा कि वह एससीओ के सदस्य देशों के साथ अधिक से अधिक आर्थिक लाभ लेने की कोशिश करे। एससीओ के जितने भी सदस्य देश हैं, उनमें से केवल पाकिस्तान को छोड़कर बाकी सभी देशों के साथ भारत के आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत हैं।

हां भारत के चीन के साथ एनएसजी सदस्यता, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अजहर, अक्साई चिन, तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा, अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र व सीमा विवाद जैसे कई मुद्दों पर मतभेद हैं, इसके बावजूद भारत-चीन आर्थिक क्षेत्र में सहयोगी हैं।

भारत को इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि विश्व में अमेरिका के सामानांतर चीन एक शक्ति केंद्र बनना चाहता है, इसके लिए वह अधिक से अधिक देशों को अपने पाले में ला रहा है।

चीन का वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट अमेरिकी प्रभुत्व को टक्कर देने व आर्थिक शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पूर्ति के लिए ही है। आसियान, एससीओ को भी चीन मजबूत करना चाहता है।

एससीओ से भारत व पाक को जोड़कर चीन दोनों पड़ोसी में जारी तनाव को कम करना चाहता है, तािक चीनी सीपेक पर कोई आंच नहीं आए। चीन भारत की एनएसजी की सदस्यता पर नरम रुख अपना सकता है।

चीन ने अमेरिका के दुश्मन माने जाने वाले रूस को अपना साथी बना लिया है। जबकि भारत का यूएस व रूस के दोनों के साथ अच्छे रिश्ते हैं। ऐसे में भारत को यूएस व चीन की महत्वाकांक्षा के साथ संतुलन बना कर रखना होगा।

बहरहाल भारत को एससीओ से यूरेशिया में अपनी कूटनीतिक व आर्थिक पैठ बढ़ाने में मदद मिलेगी।

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