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अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति एक्ट मामला: दलितों की हिंसा, देश को पीछे धकेलते आंदोलन

अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अंतर्गत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाने वाले सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा दिशा-निर्देशों के विरोध में भारत बंद के नाम पर दलित संगठनों की जो हिंसा, आक्रामकता और अराजकता दिखी है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है।

अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति एक्ट मामला: दलितों की हिंसा, देश को पीछे धकेलते आंदोलन

सोशल मीडिया से लेकर आमजीवन तक इस आन्दोलन को जन समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है| आम जनता का यह रुख सही भी है क्योंकि ऐसे अराजक दुर्व्यवहार को आन्दोलन कहा ही नहीं जा सकता। अफ़सोस कि आन्दोलन के नाम पर देश की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने और आमजन का जीना दूभर कर देने वाली ऐसी उत्पाती, अराजक और हिंसक घटनाएं होती रहती हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जन-धन की इस क्षति में किसका हित है? जबकि देश और समाज में आवेश और आक्रमता भरा माहौल बनाने और सरकारी एवं निजी संपत्ति के विनाश पर देश की शीर्ष अदालत भी सख्त नाराजगी जता चुकी है| ऐसे तमाम आंदोलनों के नाम पर तोड़फोड़ और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी के मुताबिक संपत्ति का नुकसान पहुंचाने वालों से नमुआवजा लेना चाहिए।

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में आरक्षण के लिए पटेलों के आंदोलन के दौरान मामले पर सुनवाई करते हुए की थी| दरअसल, ऐसी हिंसक वारदातों में केवल आम जनता ही पिसती है| किसी का घर जला दिया जाता है तो कोई अपने व्यावसायिक ठिकाने खो देता है। ऐसे आक्रमक आन्दोलनों के चलते कई रेलगाड़ियों का संचालन व सड़क यातायात ठप होता है, शिक्षण संस्थान तक बंद करने पड़ते हैं|

एससी एसटी एक्ट को मूलरूप में बहाल करने की मांग को लेकर आयोजित बंद के नाम पर 10 लोगों की मौत हो गई है। 100 से ज्यादा ट्रेनें प्रभावित हुई, कई वाहन जला दिए गए हैं| उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश और राजस्थान समेत कई राज्यों में जान-माल का काफी नुकसान हुआ| ऐसे में यह विचारणीय है कि बंद के नाम पर हो रहे बवाल में धरना-प्रदर्शन करने वालों की क्या कोई जवाबदेही नहीं है?

जो संपत्ति जनता की मेहनत से बनती है उसे यूं आग के हवाले करने का हक़ किसी भी आन्दोलन, संगठन या दल कको नहीं है | कैसी विडम्बना है कि भीड़ की उग्रता और आक्रमकता हर बार इन आंदोलनों के नाम पर समाज और देश को सालों पीछे लेकर जाती है। आखिर कैसा देश बनाना चाहते हैं हम? क्यों निर्माण की जगह विध्वंस करने में लगे हैं? अपनी बात रखने का यह कैसा तरीका है कि आम जनता का जीवन ही मुश्किल कर दिया जाए।

हालिया समय में हुए लगभग सभी आंदोलनों के दौरान भयंकर आगजनी, हिंसा और लूटपाट तक की घटनाएं सामने आई हैं| जो देश और समाज को बड़ी क्षति पहुंचाने वाली है| कुछ समय पहले हुए जाट आन्दोलन से देश को 34,000 करोड़ की क्षति हुई थी। हरियाणा में कई बसें, पुलिस थाने आग के हवाले कर दिए गए थे। आंदोलन के नाम पर हुई उग्रता में रेलवे की सम्पत्ति को भी भारी नुकसान पहुंचा था।

गुजरात में भी पटेल आरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये की संपत्ति की क्षति हुई थी| जाटों के हिंसक आंदोलन में 30 लोगों ने अपनी जान गंवा दी थी जबकि 200 से अधिक लोग घायल हुए थे| एसोचैम के मुताबिक सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाए जाने से राज्य को लगभग 18,000 - 20,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। बीते कुछ बरसों में राजस्थान में गुर्जर, हरियाणा-जाट, गुजरात-पाटीदार व कश्मीर में पत्थरबाजों ने आंदोलन के नाम पर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया है|

अफ़सोस कि उपद्रवी तत्वों की अराजकता की पीड़ा भी आम लोगों को ही भोगनी पड़ती है और इस नुकसान की भरपाई भी जनता की जेब से ही होती हैं| यही वजह है कि ऐसे हिंसक उत्पात को आमतौर पर जनता का समर्थन नहीं मिलता है| जैसा कि दलित बंद को लेकर भी हो रहा है| जनता इस आक्रमता को लेकर त्रस्त भी है और नाराज़ भी| आम लोग भी यह समझते हैं कि अपनी मांगों को पूरा करवाने के नाम पर जनता का जीवन पंगु बना देने का हक़ किसी को नहीं |

आमतौर पर देखने में आता है भीड़ जुटाकर बंद बुलाने या आन्दोलन करने वाले ऐसे उन्मादी लोग सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुंचाने और आम जनता के जीवन को खतरे में डालने के माध्यम से अपनी लड़ाई लड़ने की राह तलाशते हैं। कई संगठन और राजनीतिक दल बरसों से यह अराजकता फैलाकर अपनी रोटियां सेकते आ रहे हैं।

यह सोचने का अवकाश किसी के पास नहीं कि भारत जैसे विकासशील देश में जहां आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं, यूं चंद घंटों में करोड़ों रुपये की राष्ट्रीय संपत्ति को स्वाहा कर देने से क्या हासिल होगा? यह अपना ही घर फूंक कर तमाशा देखने वाली बात लगती है। राष्ट्रीय संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे उपद्रवकारी जाने कितने ही लोगों की रोज़ी -रोटी छीन लेते हैं।

सवाल यह है कि विरोध जताने का आखिर यह कौनसा तरीका है? ये क्यों नहीं समझते कि अपने देश की व्यवस्था और संपत्ति-सुविधाओं पर आघात करके देश को निर्बल ही किया जा सकता है। अफसोसजनक ही है कि जिस देश में जनता की सहूलियत और आधारभूत ज़रूरतों को पूरा करने के लिये जैसे-तैसे बुनियादी ढांचा खड़ा हो पाया है। उसे यूं चंद घंटों में फूंक डाला जाता है|

ऐसे में आक्रोश और वहशत से भरे आंदोलन करने वाली भीड़ संभवतः यह सोच ही नहीं पाती कि उसके द्वारा किया गया यह उत्पात पूरे देश को प्रभावित करता है। गौरतलब यह भी है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले अब सिर्फ धरनों- प्रदर्शनों या बंद तक सीमित नही है। नक्सलियों द्वारा भी आये दिन सरकारी वाहनों, पुलों या सड़कों की उड़ाने की ख़बरें आती रहती हैं|नक्सलवाद प्रभावित क्षेत्रों में हर साल करोड़ों रूपये की संपत्ति की क्षति होती है|

असल में देखा जाए तो सही-सही अनुमान लगाना भी कठिन है ऐसे उत्पाती आंदोलनों से देश को कितना नुकसान होता है|सरकारी संपत्ति को वैचारिक विरोध की भेंट चढाने वाली इन घटनाओं के बाद देश और समाज को इस नुकसान से उबरने में सालों लग जाते हैं। मानवीय क्षति की भरपाई तो संभव ही नहीं है। बच्चे, बुजुर्ग, मरीज और महिलाएं बिना किसी गलती के इस हिंसा के खामियाजा भोगते हैं|

इसलिए मुद्दा चाहे कोई भी हो, देश की संपत्ति को क्षति पहुंचाने और आम जनता के लिए आफत खड़ी करने का अधिकार किसी को नहीं| हमें भारतीय होने के नाते यह समझना होगा कि ऐसी अराजकता और आक्रोश किसी से लिए हितकर नहीं हो सकता|

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