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संपादकीय : राष्ट्रीय राजनीति में नए मोर्चे की सुगबुगाहट

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एनसीपी प्रमुख शरद पवार के घर करीब आठ दलों के नेताओं की बैठक को राष्ट्रीय राजनीति में नई सुगबुगाहट के रूप में देखा जाना चाहिए। लंबे समय से देश में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फ्रंट के गठन की चर्चा होती रही है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूप में अलग-अलग नाम से एक तीसरे फ्रंट बनाने के विचार बनते-मिटते रहे हैं। केंद्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद से तीसरा मोर्चा बनाने के सियासी विचार ने अधिक जोर पकड़ा है।

संपादकीय : राष्ट्रीय राजनीति में नए मोर्चे की सुगबुगाहट
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एनसीपी प्रमुख शरद पवार के घर करीब आठ दलों के नेताओं की बैठक को राष्ट्रीय राजनीति में नई सुगबुगाहट के रूप में देखा जाना चाहिए। लंबे समय से देश में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फ्रंट के गठन की चर्चा होती रही है। अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूप में अलग-अलग नाम से एक तीसरे फ्रंट बनाने के विचार बनते-मिटते रहे हैं। केंद्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद से तीसरा मोर्चा बनाने के सियासी विचार ने अधिक जोर पकड़ा है। अभी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की प्रचंड जीत के बाद से भाजपा के खिलाफ क्षेत्रीय राजनीतिक दल अपने लिए राष्ट्रीय भूमिका देखने लगे हैं। एक समय था जब देश में गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति के नाम पर जनता पार्टी व बाद में संयुक्त मोर्चा ने सत्ता हासिल की, लेकिन न ही जनता पार्टी स्थायित्व विकल्प दे पाई और बाद में न ही संयुक्त मोर्चा देश को तीसरा राष्ट्रीय विकल्प दे पाया।

गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति ने देश को भाजपा के रूप में एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प जरूर दिया। आज राजनीति का पहिया घूमा है, कांग्रेस के लगातार कमजोर होते जाने से देश में भाजपा के खिलाफ तीसरे फ्रंट के लिए राज्यों में मजबूत राजनीतिक दल लामबंद हो रहे हैं। भाजपा को शिकस्त देने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन लगातार कमजोर होता गया है। कांग्रेस घोर नेतृत्व संकट से गुजर रहा है, जबकि टीएमसी जैसी क्षेत्रीय पार्टी भाजपा को टक्कर दे रही है, इसलिए गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फ्रंट के विचार को हवा मिल रही है। पहले अगर देखें तो देश में दो से तीन बार तीसरे मोर्चे का प्रयोग हुआ है, लेकिन इसके नेताओं में दूरदर्शिता का अभाव, राजनीतिक महत्वाकांक्षा से ग्रसित व क्षेत्रीय राजनीति से बाहर नहीं निकल पाने के चलते तीसरा मोर्चा संभावना के बावजूद देश को राष्ट्रीय विकल्प नहीं दे सका। जनता पार्टी के बिखराव से भाजपा का जन्म हुआ तो, संयुक्त मोर्चा के बिखराव से सपा, राजद, जदयू, रालोद, लोकजनशक्ति पार्टी, इनेलो, जदएस जैसे दल बने। कांग्रेस से निकल कर टीएमसी, एनसीपी, वाईएसआरसी, केरल कांग्रेस जैसे दल बने। कांशीराम के बहुजन आंदोलन की देन बसपा बनी, तो तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद के खिलाफ डीएमके बनी। आज देश में बहुदलीय व्यवस्था होने के नाते हर राज्य में परिवारवाद से पोषित दो-तीन राजनीतिक दल हैं, यह लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। सभी क्षेत्रीय दल व्यक्तिवादी या परिवारवादी राजनीति के पोषक हैं।

उनके पास न राज्य के लिए कोई विकास का एजेंडा है और न ही राष्ट्रीय एजेंडा है। यह जानते हुए राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को लगता है कि देश में तीसरी शक्ति के रूप में एक राष्ट्रीय फ्रंट को जन्म दिया जा सकता है। वे दरअसल पीएम नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष के नेता के तौर पर ममता बनर्जी को प्रोजेक्ट करना चाहते हैं। इसके लिए वे शरद पवार से 15 दिनों में दो बार मिले और आखिरकार नई दिल्ली में एक दर्जन नेताओं की बैठक हुई। अभी इस बैठक के बारे में बस इतना कहा गया है कि इसमें कोविड प्रबंधन, संस्थानों पर 'हमले' और बेरोजगारी जैसे विषयों पर चर्चा हुई है, लेकिन इसके मूल में तीसरे विकल्प की जमीन तैयार करना है। अब तक के अनुभव से कहा जा सकता है कि देश में तीसरी राजनीतिक ताकत के रूप में एक राष्ट्रीय दल की संभावना है, जो तीसरे फ्रंट के लिए प्रयासरत दलों के विलय से संभव है। लेकिन व्यवहार में ये दल मिलकर राष्ट्र के लिए काम करेंगे, इसके आसार दूर-दूर तक नहीं दिख रहे हैं। पवार के घर बैठक में आने वाले नेताओं में एक-दो को छोड़ कर कोई भी मास के नेता नहीं हैं, उनकी जन स्वीकार्यता ना के बराबर है। इसलिए ऐसी बैठकों से सुर्खियां तो बनती हैं, अटकलें भी तेज होती हैं, लेकिन कोई राष्ट्रीय विकल्प नहीं तैयार नहीं हो पाता है।

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