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मैला ढोने जैसी कुप्रथाओं का समाज से अंत जरूरी

मैला ढोने वाले लोगों व सफाईकर्मियों व उनके समाज को हेय दृष्टि से देखा जाता है।

मैला ढोने जैसी कुप्रथाओं का समाज से अंत जरूरी
अगर कोई प्रथा हमारी मानवीयता को कलंकित करे, हमारे बराबरी के संवैधानिक अधिकार का हनन करे, व्यक्ति के आत्म-स्वाभिमान पर चोट करे और मान-सम्मान को ठेस पहुंचाए तो वह प्रथा निश्चित ही किसी समाज का भला नहीं कर सकती है। भारत में सिर पर मैला ढोने की प्रथा भारतीय समाज की विद्रूपता को ही उजागर करती है। सदियों से कोई समाज कैसे बर्दाश्त करता रहा है कि एक मानव दूसरे मानव का मल सिर पर ढोए। वंशानुगत पेशा के नाम पर एक पूरे समुदाय को सिर पर मानव मल ढोने के लिए अभिशप्त कर देना सड़ी हुई सोच ही हो सकती है।
आज भी हमारे देश में एक अनुमान के मुताबिक सिर पर मानव मल ढोने वाले करीब छह लाख परिवार हैं। ये लोग दलित समुदाय के हैं। एक लाख अस्सी हजार दलित परिवार भारत भर में सात लाख नब्बे हजार सार्वजनिक और व्यक्तिगत शुष्क शौचालयों को साफ करते हैं। सच्चाई यह है कि मैला ढोने वालों में 98 प्रतिशत महिलाओं और लड़कियों को बहुत मामूली मजदूरी दी जाती है। देश में अधिकांश सफाई कर्मचारी भी आज भी दलित समुदाय से ही हैं। मैला ढोने वाले लोगों व सफाईकर्मियों व उनके समाज को हेय दृष्टि से देखा जाता है।
उन्हें हर पल सामाजिक तिरस्कार झेलना व सहना पड़ता है। देश के आजाद होने और संविधान लागू होने सहित सिर पर मानव मल ढोने को अपराध घोषित किए जाने के बावजूद देश से मैला प्रथा का अंत नहीं हुआ। इस लिजलिजी प्रथा के खिलाफ 32 साल से आवाज उठाने वाले कर्नाटक के बेजवाड़ा विल्सन को रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिलना निश्चित ही उनके संघर्ष का सम्मान है। भारत के दो मानाधिकार कार्यकर्ताओं को इस साल का रेमन मैग्सेसे अवार्ड मिला है। दूसरे हैं टीएम कृष्णा। कृष्णा कर्नाटक क्लासिकल म्यूजिशियन और सिंगर हैं। कृष्णा को क्लासिकल म्यूजिक को गैर ब्राह्मण तबके खासकर दलितों तक ले जाने के लिए यह सम्मान मिला है।
फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे के नाम पर दिए जाने वाले इस पुरस्कार के लिए एक ही साल में दो भारतीय का चुना जाना देश के लिए गौरव का क्षण है। विल्सन सिर पर मैला ढोने के दर्द को समझते हैं, क्योंकि उनके माता-पिता भी मैला ढोने का काम करते थे। विल्सन के आंदोलन चलाने के बाद ही 1993 में केंद्र सरकार ने मैला ढोने के रिवाज के खिलाफ कानून बनाया। सफाई कर्मचारी आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन को अंतराष्ट्रीय सम्मान मिलने से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत अभियान को और मान्यता व गति मिलेगी। इसमें कोई दोराय नहीं कि इसके चलते देश भर में सफाई अभियान की मुहिम तेज होगी।
अब तक हम सफाई के काम को तुच्छ मानते रहे हैं। इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब स्वच्छ भारत अभियान लांच किया था और देशवासियों से इसमें जुड़ने की अपील की थी, तो उस समय लोग इसकी गंभीरता को नहीं समझ रहे थे। लेकिन एक सफाई अभियान के योद्धा को मैग्ससे अवार्ड मिलने से लोग इसकी महत्ता को समझेंगे। राष्ट्रपति महात्मा गांधी भी स्वच्छता के प्रति बेहद जागरूक थे। स्वच्छता से लोग रोगमुक्त भी रहते हैं।
हमारे समाज में बहुत सी ऐसी प्रथाएं थीं, जो खत्म भी हुई हैं। जैसे सती प्रथा। बाल विवाह, छुआछूत, दहेज जैसी कुछ ऐसी प्रथाएं भी हैं, जो कानूनन अपराध के बावजूद समाज में नासूर बनी हुई हैं। ऐसे ही डा. भीमराव अंबेडकर के अथक प्रयासों के बावजूद समाज आज भी जाति प्रथा में जकड़ा हुआ है। बहरहाल, मैला ढोने समेत तमाम कुप्रथाओं का अंत होना ही चाहिए, सभी को इनका त्याग करना चाहिए, ताकि बेहतर मानवीय गरिमापूर्ण समाज की स्थापना हो सके।
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