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संपादकीय : तेल के खेल में भारत को नजरअंदाज न करे सऊदी

अब भारत ने अपनी रिफाइनरी कंपनियों को सऊदी अरब से तेल के आयात की समीक्षा करने के लिए कहा है। इसका सीधा मतलब है कि भारत सऊदी से तेल आयात कम कर सकता है।

संपादकीय : तेल के खेल में भारत को नजरअंदाज न करे सऊदी
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समय के साथ भारत से सऊदी अरब के रिश्ते प्रगाढ़ होते गए हैं। दोनों के बीच रिश्ते ट्रेड से आगे बढ़कर रणनीतिक हो गए हैं। खाड़ी क्षेत्र व पश्चिम एशिया में सऊदी अरब भारत का विश्वसनीय सहयोगी बन चुका है। आपसी रिश्तों में दोनों देश काफी आगे बढ़ चुके हैं और दोनों एक-दूसरे के महत्व को भी समझ रहे हैं। शायद इसलिए जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 से 19 के बीच दो बार सऊदी अरब गए, वहीं सऊदी किंग सलमान भी भारत आए। ऐसे में सऊदी अरब को भारत की जरूरतों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए। फरवरी में जब कच्चे तेल के दाम बढ़ रहे थे, तो भारत ने सऊदी अरब से तेल का उत्पादन बढ़ाने का आग्रह किया था, जिसे सऊदी सरकार ने अनसुना कर दिया था और भारत को अपने रिजर्व इस्तेमाल करने की सलाह दे डाली थी।

अब भारत ने अपनी रिफाइनरी कंपनियों को सऊदी अरब से तेल के आयात की समीक्षा करने के लिए कहा है। इसका सीधा मतलब है कि भारत सऊदी से तेल आयात कम कर सकता है। भारत के इस कूटनीतिक दबाव का सऊदी अरब पर असर पड़ना लाजिमी है। चूंकि ईरान पर प्रतिबंध के बाद तेल के लिए भारत की सऊदी अरब पर निर्भरता बढ़ी, इसको वहां के प्रशासन को गंभीरता से लेना चाहिए, न कि भारत की मांग को नजरअंदाज करना चाहिए था। कायदे से दोनों देशों के बीच विपरीत स्वर मतभेद में नहीं बदलने चाहिए। यह दोनों के हित में है। सऊदी अरब के साथ भारत के राजनयिक संबंधों की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू एवं उसके बाद इंदिरा गांधी ने सऊदी अरब की यात्रा की, लेकिन सऊदी शासन का झुकाव पाकिस्तान की ओर होने तथा कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के पक्ष का समर्थन करने के कारण भारत-सऊदी संबंध सदैव एक क्रेता-विक्रेता से आगे नहीं बढ़ सके। तत्कालीन बाजपेयी सरकार तथा सऊदी अरब के किंग अब्दुल्ला ने दोनों देशों के मध्य उपजे मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया।

मोहम्मद बिन सलमान के सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस बनने के बाद सऊदी अरब की नीतियों में आर्थिक हित महत्वपूर्ण हो गए हैं। साथ ही ओसामा बिन लादेन की अमेरिकी सैनिकों द्वारा हत्या के बाद से सऊदी अरब का पाकिस्तान पर विश्वास उठ गया। जब सऊदी अरब को यमन में युद्ध के लिए सैनिकों की ज़रूरत पड़ी, तब पाकिस्तान ने इनकार कर दिया। उसके बाद से सऊदी अरब भारत के करीब आता गया। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की दक्षिण-पश्चिमी एशिया व खाड़ी में शांति कायम रखने की नीति से सऊदी अरब भारत के संबंध अगले स्तर पर पहुंचा है। भारत कच्चे तेल की 85 प्रतिशत जरूरत आयात से पूरा करता है, जिसमें 20 प्रतिशत कच्चा तेल केवल सऊदी अरब से खरीदता है। सऊदी तेल कंपनी अरामको भारत में निजी व सरकारी दोनों रिफाइनरी कंपनियों के साथ काम कर रही है। सऊदी अरब 100 अरब डालर निवेश भी कर रहा है। भारत-सऊदी अरब ने एक रणनीतिक साझेदारी परिषद के गठन किया है।

यह इन्फ्रास्ट्रक्चर, कृषि, स्टार्ट-अप, कौशल विकास, सूचना तकनीकी आदि में दोनों देशों में निवेश की संभावना तलाशेगी। सऊदी अरब भी भारत के सुरक्षा क्षेत्र में निवेश करना चाहता है। ऐसे में तेल के खेल में भारत व सऊदी अरब के संबंध खराब नहीं होने चाहिए। सऊदी अरब और पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) के उत्पादक भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं, लेकिन अधिकांश समय इनकी शर्तें खरीदारों के खिलाफ होती हैं। सऊदी अरब को ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, जिससे भारत को मजबूरन कोई अलग फैसला करना पड़े।

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