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व्यंग्य : जो डर गया वो जी गया

किसी ज़माने में कहा जाता था, जो डर गया वो मर गया, लेकिन बदलते समय में यह गलत साबित हो चुका है। अब तो डरने वाला, शांत रहने वाला समाज सभी सुविधाएं प्राप्त करता है। यह सही कहा गया था कि डर के आगे ही जीत नहीं है बलिक डर के ऊपर, नीचे, दाएं बाएं, अड़ोस पड़ोस में जीत के झंडे लहरा रहे हैं।

व्यंग्य : जो डर गया वो जी गयाप्रतीकात्मक फोटो

दुनिया के कुछ देशों को धर्म, राजनीति व जाति जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं बारे सोचने का समय नहीं होता। वे दूसरे फ़ालतू काम करते रहते हैं। छोटे मगर सबसे खुश देश माने जाने वाले, फिनलैंड की ह्युमन इमोशन सिस्टम लेबोरेटरी में किए शोध के मुताबिक, डरने से दिमाग का वह हिस्सा सक्रिय हो जाता है जो हमें सतर्क व सजग रहने को प्रेरित करता है। भारतीय माहौल में यह काम क्राइम सीरियल देखकर हो जाता है।

कुछ लोग क्राइम करने वालों से सतर्क और सुरक्षित हो जाते हैं तो क्राइम कैसे करें यह भी सीख जाते हैं। यह तो सच है कि हम डर के कारण ही आसपास के खतरों बारे जागरूक रहते हैं और अपनी देखभाल भी करते हैं । बिना भय के खतरा ही रहता है। अगर डर नहीं होगा तो हमारे पास लड़ने या भागने के लिए ऊर्जा, गति, शक्ति और ध्यान नहीं रहेगा । वैसे भी जीने के दो तरीके हैं डर कर या डराकर। बंदा डर कर ही भागता है डराकर नहीं। डराकर जीने वाले को अपनी सुरक्षा का प्रबंध भी करना होता है जैसे कि सरकार के शक्तिशाली लोग, गलत तरीके से धन कमाने और ज़मीन हथियाने वाले। डरने वाले को असुरक्षा भी ज्यादा परेशान नहीं करती जैसे करोड़ों आम लोग।

किसी ज़माने में कहा जाता था, जो डर गया वो मर गया, लेकिन बदलते समय में यह गलत साबित हो चुका है। अब तो डरने वाला, शांत रहने वाला समाज सभी सुविधाएं प्राप्त करता है। यह सही कहा गया था कि डर के आगे ही जीत नहीं है बलिक डर के ऊपर, नीचे, दाएं बाएं, अड़ोस पड़ोस में जीत के झंडे लहरा रहे हैं।शासक और प्रशासक मुस्कुराते हुए डराता है और प्रजा उसकी जय-जयकार करती है, इस तरह दोनों की सकारात्मकता में इजाफा हो जाता है। डराने और डरने को सामाजिक स्वीकृति मिल जाती है। अब तो डराने के लिए नए रास्ते खोजे जा रहे हैं, ताकि ताज़गी बरकरार रहे और डरने वाला इंतज़ार में रोमांचित रहे।

अब यह पता नहीं चलता कि डराने वाला कौन सा नया इरादा इस्तेमाल कर ले, जैसे मनोरंजन के स्वतन्त्र पैरोकारों ने उन्मुक्त वेब सीरीज़ बनाकर दर्शकों की नैतिकता को नए रोमांचक तरीकों से डराना शुरू कर दिया है। हंसाने का कारोबार शबाब पर है, लेकिन हंसने-हंसाने वालों को शायद पता न हो कि मानव शरीर और मन को सहज स्थिति में लाने में हंसने से ज्यादा रोना कारगर माना गया है। रोना अवश्य ही डरने से आगे की स्थिति है। डराना अब सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, राजनैतिक व आर्थिक व्यवसाय है और जो व्यक्ति इन माध्यमों से नहीं डरता उसे ताक़त, गाली, नफरत, गोली या शब्दों से ही अच्छा खासा डराने का प्रयास किया जाता है और डरा भी दिया जाता है। सामान्य जीवन के लिए डरना जरूरी है।

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