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सुरजीत सिंह का व्यंग : शादी का पहाड़ा

शादी ऐसा लड्डू है, जिसे देशी घी के भ्रम में बड़े चाव से खाते हैं और वेजिटेबल घी से ठग लिए जाते हैं।

सुरजीत सिंह का व्यंग  : शादी का पहाड़ा

शादी ऐसा लड्डू है, जिसे देशी घी के भ्रम में बड़े चाव से खाते हैं और वेजिटेबल घी से ठग लिए जाते हैं। किसी ने सही कहा है कि शादी चार दिन की चांदनी है, फिर अंधियारी रात है। चमकता जुगनू है, जो क्षणिक चमक का आभास कराता है। वे काफी देर तक गहरे सन्निपात की मुद्रा में बैठे रहे। जैसे रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए हों। उन्हें झिंझोड़ा, तब बड़े अफसोस के साथ हौले से सिर हिलाया। गहरे कूप से आती हुई आवाज में बोले, ‘अच्छे दिनों के हल्ले में कैसे दुर्दिन आ गए हैं कि अभी एक कन्या ने विवाह मंडप में शादी से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि दूल्हा पंद्रह का पहाड़ा नहीं बोल पाया। लाख मिन्नतों के बावजूद दूल्हे को बैरंग लौटना पड़ा!’

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‘दुर्दिन क्या, यह कहो न कि शेर को सवा शेर मिलने लगे हैं! यह अभी तो अच्छी बात है कि आज की लड़कियां अपने होने वाले पति की गणितीय क्षमता चैक कर रही हैं, इससे प्रॉब्लम क्या है?’उन्होंने मुझे यूं घूरा, जैसे वह ठुकराया हुआ दूल्हा मैं ही होऊं। घूरते हुए बोले, ‘चलो एकबारगी बोल भी देता तो क्या, सारे पहाड़े तो वैसे भी शादी के बाद भूल जाने थे।’‘लगता है एक दुल्हन द्वारा ठुकराए जाने से तुम जैसे मर्दों की मर्दानगी बड़ी आहत हुई है।’ देखिए, तुम मुझे गलत समझ रहे हो। बात दरअसल यह नहीं है कि...’

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बात को बीच में ही काटते हुए मैंने टोका, ‘तो तुम क्या समझाना चाहते हो, हम कोई सामान खरीदते हैं, तो पहले अच्छी तरह ठोंक-बजाकर देखते हैं कि नहीं। वैसे अभी यह तो होना ही था। फेहरिस्त बढ़ती जा रही है। अभी पिछले दिनों एक दूल्हे ने वरमाला डालते समय गर्दन नहीं झुकाई, तो उसे चलता कर दिया। एक दूल्हे के मुंह से पाणिग्रहण संस्कार के दौरान शराब की बू आई तो फेरे उलटे पड़ गए। और इससे भी आगे बढ़ते हुए एक दूल्हे ने दुल्हन की सहेलियों पर थोड़ा अभद्र कमेंट कर दिया, बस फिर क्या था, दूल्हे की सारी हेकड़ी हवा हो गई। इसलिए यह वक्त रुदन मचाने का नहीं, चिंतन करने का है।’
वे रुआंसे हो गए। अफसोस की मुद्रा में सिर हिलाते हुए बोले, ‘काश, किसी ने उनसे भी शादी के वक्त पहाड़ा बुलवाया होता।’
‘आप तो फर्राटे से पहाड़ों के पहाड़ पर चढ़ जाते, शादी का लड्डू जो खाने को बेताब थे।’ मैंने मजाकिया लहजे में कहा।
मित्र खिसियानी सी हंसी में कहने लगे, ‘बात तो यह तुम्हारी सच है, लेकिन क्या है कि हम गणित में बचपन से ही पूअर थे। किसी तरह बोर्ड का वाघा बॉर्डर पार कर पाए थे। हमारी किस्मत ही खराब थी, जो हमसे किसी ने मंडप में पहाड़ा नहीं बुलवाया, वरना हम तो वहीं फेल हो जाते और फिर ताउम्र जिम्मेदारियों के पहाड़े नहीं रटने पड़ते अर्थात् इस तरह जिंदगी पहाड़ा नहीं होती।’
दर्द का समंदर जैसे बह निकला। वे कहते गए, ‘सारी उम्र रिश्तों के फॉर्मूले सुलझाने में गुजार दी, मगर जोड़ हमेशा गलत ही बैठा। किसी ने सही कहा है कि शादी चार दिन की चांदनी है, फिर अंधियारी रात है। चमकता जुगनू है, जो क्षणिक चमक का आभास कराता है।’‘मित्र, नर हो न निराश करो मन को...धीरज धरो। वैसे तुम क्या समझकर शादी के झाड़ पर चढ़े थे?’‘काहे के नर, बस वानर समझो, उछलकूद करते रहना है। किसी शायर ने सही ही कहा है कि शादी आग का दरिया है और डूब के जाना है। यहां तक कहा गया है कि जो डूबा सो पार गया, लेकिन यहां जो डूबा, फिर कभी उबरा नहीं। शादी-शुदा जिंदगी नदी के दो किनारों की तरह है, जो जिंदगी भर मिलने की कोशिश करते हैं, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी ल नहीं पाते हैं। शादी वह क्षितिज है, जिसमें सिर्फ मिलने कार्यक्रम है, पास जाओ तो सब दूर-दूर है।’
‘दुखी आत्मा, जिसे तुम आग का दरिया कह रहे हो, वह शादी नहीं, इश्क है। और दो किनारों की खूबसूरती इसी में निहित है कि वे तमाम उम्र चाहत, जुनून और जोश के साथ मिलने के प्रयास में लगे रहें।’‘यह शादी का दार्शनिक पक्ष है जनाब, हकीकत इसके उलट है। यह ऐसा लड्डू है, जिसे देशी घी के भ्रम बड़े चाव से खाते हैं और वेजीटेबल घी से ठग लिए जाते हैं। वैसे इश्क में तो आग का दरिया क्या, तलवार की धार पर भी ड़ जाएं। मेरा तो इतना कहना है कि शादी सुख का विलोम है।’
‘अगर यह विलोम है, तो अनुलोम का अ•यास कर इसे एक लय प्रदान कर सकते हो। अनुलोम-विलोम से एक लयकारी, संतुलनकारी रिदम बनती है। शादी एक अनुशासन पर्व है, सुव्यवस्थित जीवन शैली का नाम है। लेकिन मर्दों के लंपट मन को अनुशासन में बद्ध करना, शेरों को ब्रश करवाना है।’वे सुनते रहे, अफसोस में सिर हिलाते रहे, लेकिन मानने को कदापि तैयार नहीं दिखे। आखिर मर्दवादी अहं को ठेस जो पहुंची थी।
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