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व्यंग्य: पुरस्कार दे दे बाबा, ‘तुम्हें इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए-हर घूरे के दिन फिरते हैं

‘मन्ने के बेरा? पर नूं जाने सूं-अक साहित्य के बगैर आदमी कुछ दिन जिंदा रह लेगा, पर गेहूं के बगैर कूण जिंदा रह सकै।’

व्यंग्य: पुरस्कार दे दे बाबा, ‘तुम्हें इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए-हर घूरे के दिन फिरते हैं
पुरस्कार के लिए ऐसे व्याकुल था-गोया उसके बगैर धरती का जीवन चक्र रुक रहा हो। मैंने पड़ोसी वर्मा जी से, अपने साथ हो रहे साहित्यिक भेदभाव के बारे में चर्चा की। मेरी व्यथा सुनकर वह ऐसे संजीदा हो गए-गोया मैंने उनसे चंदा मांग लिया हो। थोड़ी देर बाद बोले, ‘तुम्हें इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए-हर घूरे के दिन फिरते हैं।’
बहुत कठिन है डगर पनघट की। कहीं से कोई साहित्यिक पुरस्कार टपकता नजर नहीं आता। आंखें तरस गई, पुरस्कृत होने के लिए-कहीं से नमी भरी बयार का आभास नहीं मिलता। जुगाड़ू साहित्यकारों को रोज अखबारों में ‘वरिष्ठ’ और ‘विख्यात’ होते देख रहा हूं। हर रोज कोई ना कोई ‘विख्यात’ या ‘वरिष्ठ’ हो रहा है । इधर अभी भी अंखियां पुरस्कार दर्शन को प्यासी। लोगों को पुरस्कार पाते देख-देख कर शुगर बढ़ा रहा हूं।
कभी-कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि जैसे पचास साल के बाद भी मेरा ‘वरिष्ठ’ होना संभव नहीं है। आजकल मैं स्वाइन फ्लू और डेंगु से ज्यादा साहित्य को लेकर चिंतित हूं। एक से एक ‘बनवारीलाल’ देखते ही देखते ‘ज्ञानमूर्ति’ बनकर वरिष्ठ होते चले गए और हम कारवां निकल गया-गुबार देखते रहे। न ‘वरिष्ठ’ हो पाए न विख्यात! न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम ।
कई ऐसे लोग रातों-रात ‘वरिष्ठ’ हो गए कि मैं सुनकर सकते में हूं । बगैर रीढ़ का ‘व्यंग्य’ लिखकर लोग ‘व्यंग्य सम्राट’ और ‘ब्यंग्य श्री’ हो गए। सुबह जागने पर पता चलता है कि पिछले हफ्ते तक साहित्य सम्मेलनों में धकियाये जाते रहे ‘कचालू’ राम, जी रातों-रात ‘वरिष्ठ और विख्यात’ होकर पुरस्कार तक जा पहुंचे हैं। उनको इतनी जल्दी ‘वरिष्ठ’ होते देखकर मैं सदमे में हूं । मुझे अपने पिछड़ेपन पर शर्म आ रही है। अपने ‘वरिष्ठ’ साहित्यकार होने की कोई सूरत नजर नहीं आती। या खुदा! कैसे कैसों को दिया है-मुझको भी तो लिफ्ट करा दे।
बुद्धिलाल जी ने आज फिर एक साहित्यिक पुरस्कार समारोह की सूचना दी है। मैंने शीशे में अपने आपको देखा-मुझे तो अपने ‘वरिष्ठ’ होने के सारे लक्षण नजर आ रहे थे-सामने से उड़े हुए बाल, छपी रचनाओं के परिश्रमिक चेक के इंतजार में पथराई आंखें और ‘अच्छे दिन’ की चपेट में आई काया से फूटता असमय बुढ़ापा देखकर मुझे पूरा विष्वास था कि इस बार मुझे ‘वरिष्ठ’ और ‘विख्यात’ होने से कोई नहीं रोक सकता।
अगले दिन पता चला कि मुझे छोड़कर कई और लोग ‘विख्यात’ हो गए। जब आपकी कुंडली ही खराब हो तो तोता कोई भी कार्ड खींचे आप शनि के प्रकोप से नहीं बच सकते। पुरस्कार पाकर हाल ही में ‘वरिष्ठ’ हुए एक साहित्यकार को मैं भी जानता हूं, जो पहलीबार तब ‘विख्यात’ हुए जब चलती बस में छेड़खानी करते पकड़े गए थे। वह साहित्य में भी छेड़खानी करते हैं। (अकसर वरिष्ठ साहित्यकारों के रचनाओं की ‘कलम’ काटकर अपनी रचना में रोप देते हैं) साहित्य में नए प्रयोग का जोखिम कौन उठाए। साहित्य में क्वालिटी के आधार पर ‘वरिष्ठ’ और ‘विख्यात’ होने के चक्कर में साहित्यिक वनवास या ‘वीरगति’ पाना कौन चाहता है?
कई साहित्यकार ऐसे हैं, जिन्होंने साहित्य कम लिखे पुरस्कार ज्यादा कब्जाए। मुझे तो ‘श्रद्धा पुरस्कार’ भी नहीं मिला, जिसे सेठ साहूकार अपने माता पिता के स्वर्गवासी होने पर किसी पत्र-पत्रिका के माध्यम से देते हैं। ऐसे पुरस्कार से साहित्यकार और पुण्यात्मा दोनों का चित शांत होता है, पर क्या करें? अबहूं न आए ‘बालमा’ सावन बीता जाए। पुरस्कार के बिना लाइफ ऐसी लग रही है-गोया वसंत के मौसम में बर्डफ्लू आ गया हो। क्या करूं-कुंडली में पतझड़ पसर गया है। पुरस्कार मिलता नहीं और ‘वरिष्ठ’ हुए बिना दिल है कि मानता नहीं।
मैं कहीं से भी वरिष्ठ होता नजर नहीं आ रहा था। ‘मिडास टच’ का भरम पाले हर दिन पुरस्कार से दूर हो रहा था। मैं पुरस्कार के लिए ऐसे व्याकुल था-गोया उसके बगैर धरती का जीवन चक्र रुक रहा हो। मैंने पड़ोसी वर्मा जी से, अपने साथ हो रहे साहित्यिक भेदभाव के बारे में चर्चा की। मेरी व्यथा सुनकर वह ऐसे संजीदा हो गए-गोया मैंने उनसे चंदा मांग लिया हो। थोड़ी देर बाद बोले, ‘तुम्हें इतनी जल्दी मायूस नहीं होना चाहिए-हर घूरे के दिन फिरते हैं।’
इसके पहले कि मेरे अंदर का साहित्यकार-दुर्वाषा ऋषि के गेटअप में आता-मैं वहां से हट गया। रिटायर्ड आदमी साहित्य और सब्जी में ज्यादा फर्क नहीं समझता, जिसका बाजार भाव बजट को सूट करता हो वही समर्थन पाता है। कबीर के निर्गुण का मर्म समझने से बेहतर है करेले की सब्जी से शुगर साधना। मेरी लाइफ में सब्जी बैकफुट पर रही और साहित्य कुंडली में, क्योंकि सब्जी घर वाले लाते थे और साहित्य को घर दिखाने का दोषी मैं था-खैर ‘अगले जनम मोहे लेखक न कीजो।’
मैंने अस्थमा अटैक से उबर कर स्वास्थ्य लाभ कर रहे दिल्ली के जाने माने साहित्यकार मित्र से अपनी चिंता शेयर की, ‘लोग अंतरिक्ष और समंदर में शहर बसाने जा रहे हैं-यहां तो महज एक पुरस्कार का प्रश्न है। क्या आप मुझे साहित्यिक पुरस्कार के योग्य समझते हैं? मुझे एक भी नहीं मिला!’
उन्होंने शून्य में जवाब खोजना शुरू कर दिया, फिर अचानक इतना सीरियस हो गए जैसे कांग्रेस के डैमेज कंट्रोल की जिम्मेदारी सीधे उन पर आ गई हो। थोड़ी देर बाद दार्शनिक की तरह बोले, ‘जो हुआ-अच्छा हुआ। जो होगा-अच्छा होगा। तेरा था क्या, जिसे खोने का शोक करता है। जो है प्रभु का है।’ उपदेश देकर वह करवट बदल चुके थे। नर्स ने आकर मुझे डांटा, ‘मरीज को सांस की प्राब्लम है-उसे साहित्य से दूर रखो। इन्हें इंफेक्शन से बचना चाहिए।’
कोई चारा नजर नहीं आता। आखिरकार चौधरी ही बचा था मैंने उससे भी डिस्कशन कर लेना जरूरी समझा। उस वक्त वह हुक्का पी रहा था। मैंने मन की बात कही। चौधरी ने मुझे ऐसे देखा-गोया उसके सामने आदमी की जगह ‘बर्डफ्लू’ से लैस कोई मुर्गा खड़ा हो, ‘घर में गेहूं न है के?’
‘साहित्य का गेहूं से क्या रिश्ता?’
‘मन्ने के बेरा? पर नूं जाने सूं-अक साहित्य के बगैर आदमी कुछ दिन जिंदा रह लेगा, पर गेहूं के बगैर कूण जिंदा रह सकै।’
‘गेहूं तो है-पुरस्कार नहीं है।’ चौधरी ने हाथ खड़े कर लिए, ‘मैं भैंस कू ले कै परेशान हूं-अर-तू साहित्य कू। इब भैंस के आगे साहित्य मत बजा।’
मैं निराश हो चुका हूं, अब एक ही पुरस्कार बचा है-प्रतिभाश्री। यह कोई साहित्य सभा का पुरस्कार नहीं है, बल्कि वह विलक्षण पुरस्कार है, जो पुरस्कार का सूखा झेल रहे विद्रोही साहित्यकारों को दिया जाएगा। पहला पुरस्कार चौधरी के हाथ से मैं लेने जा रहा हूं, कैसा रहेगा?’
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