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व्यंग्य : राजनीति और घोटाला

नेता और राजनीति के समानांतर भी कुछ चीजें साथ-साथ चलती रहती हैं।

व्यंग्य : राजनीति और घोटाला
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अंशुमाली रस्तोगी -
राजनीति और नेता बरसों से एक-दूसरे के पूरक रहे हैं। राजनीति की गाड़ी नेता के बिना, नेता की राजनीति के बिना चल ही नहीं सकती। दोनों एक ही गाड़ी में सवार होकर लंबा सफर तय करते हैं।
बिना संघर्ष के राजनीति हो नहीं सकती और हमारे देश के नेता लोग राजनीति के वास्ते संघर्ष करने में न कभी पीछे रहे हैं, न रहेंगे। नेता का राजनीति से रोटी-बेटी जैसा नाता जो है। नेता और राजनीति के समानांतर भी कुछ चीजें साथ-साथ चलती रहती हैं।
साथ-साथ चलने वाली चीजों में यों तो बहुत-सी हैं मगर कुछ सालों से जो भयंकर रूप से दोनों के साथ चल रही है, वो है-घपले-घोटाले। गौरतलब है कि राजनीति में नेता की संलिप्तता जनता से कहीं अधिक घोटालों के साथ बढ़ रही है।
अपवादों को छोड़ दिया जाए तो किसी न किसी नेता का खाता घोटालों के बैंक में खुला ही है। नेता लोग राजनीति से कहीं ज्यादा ध्यान घपलों-घोटालों पर देने लगे हैं। या यह कहना ज्यादा उचित होगा कि नेताओं ने घोटालों को राजनीति का प्रमुख अंग बना लिया है। जिस नेता का जित्ता बड़ा कद, उसका घोटला भी उत्ता ही बड़ा।
कमाल यह है कि नेता बनते वक्त जो नेता भ्रष्टाचार व घोटालों से दूर रहकर जनता की सेवा करने की शपथ लेता है, अंतत: कूदता उसी खाई में है, जहां से बाहर आने का कोई चांस नहीं होता। जनता की याद नेता को पांच साल में एक बार चुनावों के दौरान वोट मांगने के लिए ही आती है। बाकी साल वो जनता के वोट पर ऐश कर अपनी व अपने चाहने वालों की नैया पार लगाता रहता है।
कभी-कभी तो लगता है कि हमारे देश के नेता लोग वोट जन-हित के वास्ते नहीं केवल राजनीति और घोटाले करने के लिए ही लेते हैं। मैंने नेताओं के चेहरों पर चिंता और माथे पर शिकन वोट मांगने और चुनाव लड़ने के दौरान तो खूब देखी है, लेकिन यह तब गायब होती है, जब किसी नेता का नाम किसी घोटाले से जुड़ता है या घोटाले के कारण वो अंदर जाता है।
घोटाले करना शायद हमारे देश के नेताओं के लिए बहुत सामान्य-सी बात हो गई है। उन्हें यह अच्छे से मालूम है कि हमारे यहां घपलों-घोटालों पर थोड़ दिन तो खूब हो-हल्ला कटता है फिर धीरे-धीरे कर सब सामान्य हो जाता है।
जनता सब भूल-भाल कर अपने-अपने काम-धंधे में लग जाती है और मीडिया अन्य ब्रेंकिग न्यूज में बिजी हो जाता है। इसीलिए नेता लोग अपनी-अपनी दालें घोटालों के बीच गलाते रहते हैं। जिसकी दाल गल जाती है, वो राजा हो जाता है। जिसकी नहीं गल पाती, वो दूसरे की सूखाने में लग जाता है।
आजकल तो हर तरफ बस व्यापमं घोटाले के ही चर्चे हैं। मीडिया से लेकर सोशल नेटवर्किंग तक पर व्यापमं ही व्यापमं व्याप्त है। व्यापमं का विस्तार इत्ता हो लिया है कि इसके सिरे ढूंढ़ना ही मुश्किल हो जाता जा रहा है। व्यापमं में जिस प्रकार एक बाद एक मौतों के मामले सामने आ रहे हैं, लोग बाग अब इसे खूनी-घोटाले की संज्ञा देने लगे हैं।
मांएं अब अपने बच्चों को गब्बर का नहीं व्यापमं का नाम लेकर डराकर चुप कराने लगी हैं। चलो व्यापमं के बहाने लगभग खाली बैठे विपक्ष के हाथ बड़ा और तगड़ा मुद्दा आ गया है, सरकार के खिलाफ जमकर बोलने व नारेबाजी करने का। विपक्ष न जाने कित्तों के इस्तीफों की मांग कर चुका है मगर दिया अब तलक किसी ने भी नहीं है।
व्यापमं घोटाले की व्यापकता को देखकर बस यही ख्याल बार-बार मन में आता है कि राजनीति के साथ-साथ घोटाले भी अब नेताओं के चेले-चपाटे होते जा रहे हैं, जब और जहां चाहो काम में ले लो।
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