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व्यंग्य : छुट्टियों में भी चैन नहीं

स्कूल की क्लासें क्या खत्म होती हैं, डांस से लेकर अच्छी हैंडराइटिंग तक की क्लासें उग आती हैं।

व्यंग्य : छुट्टियों में भी चैन नहीं
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स्कूली बच्चों की छुट्टियां है, पर उनसे पूछिए क्या वाकई उनकी छुट्टियां हैं। स्कूल की क्लासें क्या खत्म होती हैं, डांस से लेकर अच्छी हैंडराइटिंग तक की क्लासें उग आती हैं। बच्चों को छुट्टियों में भी चैन ना मिलता। कल दो बच्चों को बात करते हुए सुना-इससे अच्छा था कि स्कूल चलते रहते, छुट्टियां ना होतीं। सिर्फ स्कूल जाना पड़ता था। अब तो आफत हो गई है-कक्षा पांचोन्मुख चुन्नूजी बता रहे हैं। हां, बहूत आफत है।

सुबह पापा क्रिकेट एकाडेमी में भेजते हैं। दोपहर को क्रिएटिव राइटिंग की वर्कशॉप। दोपहर में ही ड्रॉइंग की क्लास। शाम को भरतनाट्यम की क्लास। रात को पापा जिम भेजते हैं बॉडी बनाओ। देर रात में फिर होलीडे होमवर्क। फिर मुन्नूजी अपनी बता रहे हैं। बात में दम है। पहले छुट्टी होती थी, तो बालक-बच्चे एकदम फुल-फ्री हो जाते थे। बच्चे नानी-दादी के घर जाते थे। अब बहुत घरों की नानियां-दादियां ही गई हुई हैं, ये अमेरिका में अपने बेटों के साथ परमानेंटली रह रही हैं। बता तेरी मम्मी तुझे भरतनाट्यम क्लास में क्यों भेजती हैं-चुन्नू पूछ रहा है, क्योंकि मेरा एक कजिन भरतनाट्यम का एक कंपटीशन जीत चुका है। उस कजिन के चक्कर में आफत हो गई है-मुन्नूजी बता रहे हैं।
ये कजिन भी विकट कलेश हैं। मरवा देते हैं। मेरा एक कजिन चार्टर्ड एकाउंटेंट हो गया था। फिर तो कुनबे की तमाम मांओं ने कई चुन्नुओं को चार्टर्ड एकाउंटेंट बना डाला। बना क्या डाला जी बचपन और जवानी तबाह कर डाली। मैं खुद भी चार्टर्ड एकाऊंटेंट बनने-बनते बचा। मैं थोड़ा कम बेशरम होता, तो पक्के तौर पर चार्टर्ड एकाऊंटेंट बना दिया जाता, सिर्फ इसलिए कि मेरे कुनबे में एक कजिन बहुत बढ़िया चार्टर्ड एकाऊंटेट बन गया। जो उम्र सौंदर्य बोध जाग्रत करने की थी, उसमें मेरे कई कजिन खाते बनाना सीखते रहे। मैं जानता हूं, जिनके कजिन आवारा थे, उन सबके बचपन बहुत चकाचक गुजरे। कजिन थोड़ा पढ़ाकू टाइप मिल जाए, तो जिंदगी तबाह समझो। सबसे खुश वो बच्चे हैं, जिनके कजिन होते ही नहीं।
खैरजी बात तो चुन्नू-मुन्नू की हो रही थी। अबे ये तेरे पापा तुझे बॉडी बिल्डिंग के लिए क्यों भेजते हैं-चुन्नू मुन्नू से पूछ रहा है, क्योंकि उन्हें सलमान खान बहुत पसंद है-मुन्नू बता रहा है। मैं यह सुनकर डर गया, सलमान खान को कायदे से फॉलो करने के लिए जरूरी है कि बंदे खराब ड्राइविंग भी करे और फिर दो-चार को मार-ठोंक कर एकदम मानवतावादी हो जाए। सलमान खान को पूरा का पूरा फॉलो करना बहुतै मुश्किल है। सलमान खान जैसे सौ-दो सौ हो जाएं, तो समाज में महंगे वकीलों को छोड़कर किसी के भी अच्छे दिन ना आएंगे। फिर तू ड्रॉइंग बनाना क्यों सीखता है-मुन्नू आगे पूछ रहा है, क्योंकि नानाजी मकबूल फिदा हुसैन के फैन थे-चुन्नू बता रहा है। बच्चे के दादा उर्दू शायरी में गहरी दिलचस्पी रखते हैं, मुझे खतरा है कि चुन्नूजी नेकर संभालते हुए शेर कहना भी सीखेंगे।
बहुत टेंशनात्मक सीन है। कहीं से हुसैन कम बन पाता है, तो नानाजी ठोंकते हैं। सलमान खानत्व में कहीं कमी हो, तो पापाजी हड़काते हैं। हाय हाय। आज मैंने शहजादा सलीम की कहानी पढ़ी। जिस उम्र में हम इतना काम करते हैं, सलीम मियां अनारकली के साथ कबूतर उड़ाते थे। यार वो टाइम ठीक था। थोड़ा लेट पैदा हुए-चुन्नू-मुन्नू को बता रहा है। मैं भी सहमत हूं, अब के बच्चे थोड़ा लेट पैदा हुए हैं। पहले हुए होते, तो सिर्फ कबूतरबाजी करते हुए ही सल्तनत संभाल लेते। हाय, इतना लेट क्यों पैदा हुए।
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