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वीआईपी का हुलिया! पप्पू जी का हुलिया क्यों पूछा गया?

पप्पू जी का पूरा हुलिया हासिल कर लो, उसके बाद कोई डुप्लीकेट पप्पू बना लो।

वीआईपी का हुलिया! पप्पू जी का हुलिया क्यों पूछा गया?
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यदि कोई गुम हो जाए तो उसके हुलिये के साथ इश्तहार छपवाए जाते हैं, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों पर चिपकाए जाते हैं। आजकल सोशल मीडिया पर भी गुमशुदा को तलाशने का रिवाज चल पड़ा है। ऐसे में अपने पप्पू जी पहले बिना बताये घर से गायब हो गए, फिर न जाने क्या सूझी, वापस भी लौट आये। वे अपनी मर्जी से सही सलामत लौटे थे या मम्मी की डांट खाकर वापस लौटना पड़ा था, इसकी जासूसी होनी चाहिए थी, मगर यहां तो मामला दूसरा ही हो गया। दो जासूस खुले आम उनकी अनुपस्थिति में उनके घर पहुंच गए और पूछने लगे उनका हुलिया-देखने में पप्पू जी कैसे लगते हैं?
उनके बाल कैसे हैं भूरे, काले या अधकचरे? वे जूते कैसे पहिनते हैं कपड़े के, चमड़े के, स्पोर्ट्स शूज या फिर चप्पलें? उनका बातें करने का स्टाइल कैसा है, वे सहानुभूति पूर्वक बातें करते हैं या क्रोध में रहते हैं? क्रोध उन्हें आता है या नहीं, यदि आता है तो वे कैसा व्यवहार करते हैं, अपने हाथ में कागजों का पुलिंदा लेकर फाड़ते हैं या अपनी बांहे चढ़ाकर सामने वाले को डराते हैं कि उन्हें जब क्रोध आता है तो वे अपने कपड़े फाड़ने पर ही अमादा हो जाते हैं?
पप्पू जी के घर वालों का गुस्सा जायज है। आखिर घर के युवराज के बारें में कोई इतनी जानकारियां इकट्ठी क्यों कर रहा है? कहीं किसी की इसके पीछे कोई गलत मंशा तो नहीं, कि पहले पप्पू जी का पूरा हुलिया हासिल कर लो, उसके बाद कोई डुप्लीकेट पप्पू बना लो। फिल्मों में ऐसा अक्सर होता रहता है। पूरा चाल चलन वीडियो पर देखकर विलेन को हीरों की शक्ल देने के अनेक उदहारण फिल्मों में साफ देखे जा सकते हैं, मगर कोई पप्पू जी का डुप्लीकेट बनकर करेगा भी क्या? अब तक तो यही हुआ है कि जहां जहां पप्पू जी के पैर पड़े वहीं वहीं बंटाधार हुआ है।
जासूसों का मुखिया कह रहा है कि यह सब पप्पू जी की सुरक्षा के खास इंतजाम के लिए हुआ है। पप्पू जी की गुमशुदगी होती रहती है। किसी भी खास अवसर पर पप्पू जी अज्ञातवास में चले जाते हैं बाद में जब मम्मी की याद सताती है, तब मम्मी को फोन करके बता देते हैं कि वे अज्ञातवास के टूर पर हैं। अपने आप को रिचार्ज कर रहे हैं। बहुत दिन से चले आ रहे फ्लॉप शो को सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली में बदलने की तैयारी जो करनी है। मम्मी भी बुरा नहीं मानती। कोई उनसे पूछे तो कह देती हैं, अपना पप्पू अभी बच्चा है और बच्चे की सभी गलतियां माफ की जाती हैं।

अब कोई क्या कहे, पप्पू जी के बड़े होने की कामना ही कर सकता है। इस सबके बावजूद सवाल अपनी जगह जिंदा है कि पप्पू जी का हुलिया क्यों पूछा गया? क्या औरों के भी हुलिये पूछे गए कि वह हलकी दाढ़ी कब से रखते हैं? उनकी बातचीत का ढंग कैसा है? भाषण में भाई बहिनों का प्रयोग कब से करते हैं? दिन में कितनी बार खांसी आती है? खांसी उन्हें वास्तव में है या यह उनका ट्रेडमार्क है? खाने में उन्हें कौन सी डिश पसंद है?

वह कहां बैठकर भोजन करना पसंद करते हैं? गरीब की झोपड़ी उन्हें चुनाव की तैयारियों के समय ही अच्छी लगती है या बारहमासी यह उनकी पसंद है? अब से पहले कई बार हुलियों की चर्चा होती थी। इस तरह से किसी के घर जाकर हुलिया मालूम करने से सरासर अपमान महसूस होता है, कि एक मनचाही गुमशुदगी के आधार पर किसी पर इतना शक क्यों किया जा रहा है? आखिर हुलिया पूछना हो तो सही ढंग से पूछो, सभ्यता के दायरे में पूछो, सामने बैठकर पूछो। पीठ पीछे हुलिया पूछोगे तो जासूसी का शक तो पुख्ता होगा ही।

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