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व्‍यंग्‍य: संती-महंती का ठेला, न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पुल के सपने लेने लगी

अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल चबाने के दिन आ गए। कल से तुम्हें ये देश कामपाल के नाम से जानेगा।

व्‍यंग्‍य: संती-महंती का ठेला, न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पुल के सपने लेने लगी

ठेले के डंडे में बुझी लालटेन की चौंधियाती रोशनी में किलो के बदले साढ़े सात सौ ग्राम सड़ी गोभी सीना फुलाए तोल रहा था कि एकाएक कहीं से प्रगट हुए बाबा ने मुझसे पूछा, ‘सब्जी के ठेले पर किलो के बदले सात सौ ग्राम तोल अपना ये लोक तो ये लोक, परलोक तक क्यों खराब कर रहे हो कामपाल? तो मैंने उनके चरणों में गिर गिड़गिड़ाते कहा, ‘मैं कामपाल? मैं तो़..., प्रभु और क्या करूं? किलो के बदले सात सौ ग्राम न तोलूं तो शाम को कमेटी के जमादार को, इस हल्के के हवलदार को, आयकर विभाग वाले सरदार को चार-चार किलो मुफ्त सब्जी कहां से दूं?

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अगर न दूं तो कल यहां ठेला कौन मुआ लगने दे? अब आप ही बताओ ऐसे में किलो के बदले साढ़े सात सौ ग्राम न तोलूं तो और क्या करूं?’ ‘तो हे मरियल-कम-सड़ियल कामपाल! अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल चबाने के दिन आ गए। कल से तुम्हें ये देश कामपाल के नाम से जानेगा। बाबा का हुक्म है कि कल से सब्जी का पंचर टायरों वाला ठेला लगाना बंद कर संती-महंती का ठेला लगाओ।’

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संती-महंती ठेले पर भी बिकते हैं बाबा क्या? मैंने तो आजतक संती-महंती के मॉल ही देखे। ऐसे में ठेले पर कौन मुझसे संती-महंती खरीदने आएगा? ऐसा न हो दो रोटी से भी जाता रहूं! बाबा, मेरे पास तो सब्जी बेचने का ही पुश्तैनी हुनर है। ऐसे में मैं संती-महंती कैसे बेच पाऊंगा? सड़ी सब्जी की गंध मेरी नस-नस में बस चुकी है। मैंने अपने भीतर की व्यथा कही तो बाबा मेरी पीठ थपथपाते बोले, ‘डॉन्ट वरी! बी बोल्ड! संती-महंती बेचना सब्जी बेचने से कहीं अधिक आसान है। न तराजू, न बट्टे। न लंगोट, न कच्छे! कोशिश करके तो देख।
इस धंधे में न गला फाड़ने की जरूरत न सड़ी बंद गोभी को ताजा बनाए रखने के लिए उसके सड़े पत्ते उखाड़ने की। बाबा की वाणी से अभिभूत हो मैं गश खाकर गिरते-गिरते बचा। मैंने टूटी तराजू और सील निकाले बट्टों को परे फेंकते पूछा, पर बाबा..।’ ‘जानता हूं! पर वत्स! चांदनी चौक की एक दुकान बंद होने का मतलब पूरे चांदनी चौक का बाजार बंद होना तो नहीं? गरीबी की सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं माल के दो-चार दिन। घोर कलियुग है घोर कलियुग। अब संती-महंती की ध्वजा उठाने वालों के साथ यहां ऐसा ही होगा पर तुम डरना मत!’ ‘पर बाबा?’
अब पर क्या! सब्जी का ठेला छोड़ कल से संती-महंती का ठेला लगा और चार दिन में ही इसरो से भी कम लागत में चांद पर पहुंच जा, कह वे अंतध्र्यान हो गए। बाबा की बात जच गई सो शाम को ठेले की बची सब्जी के भर-भर झोले कमेटी के जमादार को, हल्के के वाले हवलदार को, आयकर विभाग वाले सरदार को दे घर आ संती-महंती का ठेला लगाने की बात पत्नी से की तो दस-दस दिन न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पुल के सपने लेने लगी। इधर-उधर से गत्ते की पेटियां चुनकर लाने वाली बीवी की आंखों के आगे माड्यूलर किचन नाचने लगा।
देखते ही देखते मैंने देखा जैसे मैं नामी गिरामी बाबा हो गया हूं। हर कुछ बकने के लिए मेरे लिए मेरे भक्तों ने सोने का सिंहासन बनवा दिया है। भक्त मेरी बकवास सुनने को आतुर हैं। मैं कुछ बकूं तो उन्हें शांति मिले। मेरे पास स्वर्ग तक जाने के लिए लिफ्ट मौजूद है। स्वर्ग के देवता तक मुझसे चिढ़ने लगे हैं। हजारों की संख्या में मेरे दिमाग और बिना दिमाग वाले भक्त हैं! घर के खाली दाल-चावल के डिब्बों में सोने के आभूषण, हीरे जवाहरात भरे पड़े हैं। कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था वे सब मेरे चरणों में डेली चढ़ाने आ रहे हैं।
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