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ऐ कुरसी, तू जिंदाबाद! ऐ कुरसी तू जिंदाबाद!

इस कुरसी पर जो भी बैठा, वह अपने सिवा कुछ भी सुनता नहीं। हर पद के लिए, सिवा अपने दूजा चुनता नहीं।

ऐ कुरसी, तू जिंदाबाद! ऐ कुरसी तू जिंदाबाद!

ऐ कुरसी तू जिंदाबाद! कुरसी की खातिर सब कुछ भूलाया, यारों के सीने पे खंजर चलाया! दल से बाहर का मंजर दिखाया! उन्हें दोस्ती का सबक पढ़ाया। फिर कहने को अपना टूटा दिल दिखाया। कल तक जिन्होंने था काबिल बनाया, अपने लहू से दल को सजाया। आज वही बेगाने हुए। बीते दिनों के अफसाने हुए। पुरानी फिल्मों के गाने हुए। अपनों को महफिल में आकर के, चित यारों चारों खाने हुए। अपने लिए क्या दिल्ली यारों, तो क्या इस्लामाबाद।

ऐ कुरसी तू जिंदाबाद! जिंदाबाद! तू मूली भला है किस खेत की, कुरसी की खातिर लड़े देवता भी। कुरसी की खातिर, मरे देवता भी। कुरसी भुलाए, मद्दत की यारी, कुरसी ने हर मत मारी। संत कहे ये, देखी बिचारी। ये कुरसी तो है महामारी। ये घर उजाड़े, ये दुनिया उजाड़े। फिर भी सभी इसकी आरती ही उतारें। ये कुरसी का फंदा, ये कुरसी का धंधा। बिगड़े जो बैठे इस पर मन का चंगा। जो पाए इसे वो हो बावला सा, जो खोए करे पश्चाताप!

ऐ कुरसी तू जिंदाबाद! जिंदाबाद! दल है बीमार चिंता नहीं, जनता बीमार, चिंता नहीं। कुरसी का खुमार हटता नहीं। मौसम ना गवार, चिंता नहीं! नकली है प्यार, चिंता नहीं। चलना दुश्वार, चिंता नहीं। आगे है खाई, पीछे पहाड, चिंता नहीं। इस कुरसी पर जो भी बैठा, वह अपने सिवा कुछ भी सुनता नहीं। हर पद के लिए, सिवा अपने दूजा चुनता नहीं। ताजी रहे बस अपनी काया, हैल्दी रहे बस अपना साया। सबके दिलों की बात करना, फिर अपने अहं के केले पर जा चढ़ना सबकी आखों को सपनों से भरना, ये सारी है, बस झूठी माया। इंद्रप्रस्थ में हो गया फिर से, शुरू ये इंद्रजाल!

ऐ कुरसी तू जिंदाबाद! जिंदाबाद! कुरसी के आगे बेबस सभी सभी थे, कुरसी के आगे बेबस सभी हैं, आगे भी कुरसी के कायल रहेंगे। वे न कहें तो कुछ गम नहीं है, पर कहने वाले कहके रहेंगे। कुरसी का है ये सारा खेला, कुरसी की खातिर चुनाव का मेला, कुरसी की खातिर हर दांव का रेला। यों ही चलता रहेगा ये डेमोक्रेसी का ठेला। यहां मेरे जैसा था, तब भी था अकेला, यहां मेरे जैसा है अब भी अकेला। जनता की आंखों में पाया सूरमा जिसने, सूरमें से जिसने फोड़ी उसकी आंखें। उसकी ही खिलती रही हैं जी बांछें। उनको जुकाम तक छू न पाए, उनका गला दनदनादन दनाए। जनता को होती रहे खुजली दाद! ऐ कुरसी तू जिंदाबाद! जिंदाबाद!
कुरसी की खातिर छुट्टी पे जाना, कुरसी की खातिर उल्लू बनाना, कुरसी की खातिर कुरसी चलाना, कहता रहे जो कहे ये जमाना, हमें तो ऐसे ही संसद चलाना, हमें तो ऐसे ही आना जाना! जिनके कांधों से पाई कुरसी, जिनके वादों से पाई कुरसी। अब न कुछ भी याद! चाहे टूटे जाए ये दल हमारा, चाहे छूट जाए कंबल हमारा, चाहे रूठ जाए संबल हमारा! हम तो हैं बॉस आज!
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