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व्‍यंग्‍य: फास्ट दिन और धीमे दिन, दुख के दिन बीतत नाहीं

मैंने निवेदन किया-सर महात्मा गांधी को स्वर्गवासी हुए ही पैंसठ साल से ऊपर का वक्त हो लिया है।

व्‍यंग्‍य: फास्ट दिन और धीमे दिन, दुख के दिन बीतत नाहीं
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थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी जानने-समझने के लिए आइंस्टीन होना जरूरी नहीं है। अनपढ़ नेता तक सापेक्षता या रिलेटिविटी का सिद्धांत समझता है। मई, 2014 में गयी सरकार में शामिल एक मंत्री के चमचे से बात हो रही थी। उसकी बात का आशय था-दुख के दिन बीतत नाहीं। पिछले आठ महीने यूं बीते, जैसे आठ सदियां बीत गयीं। मैंने निवेदन किया-जी अभी तो करीब चार साल चार महीने तक आपकी सरकार का कोई सीन नहीं है।

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उसके आगे की बात आगे के हालात पर निर्भर होगी। आप आठ महीने में ही इतना निराश, दुखी टाइप हो गये। वह गीत सा गाने लगे-तुम बिन जीवन कैसा जीवन। तुम से आशय इस गीत में कुरसी से था। कुरसी के बगैर आठ महीने आठ सदियां मालूम देते हैं। इसे थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी यानी सापेक्षता का सिद्धांत कहते हैं। कुरसी पर बैठे बंदे को आठ सदियां भी यूं मालूम दें कि हाय अभी तो बैठे थे, कित्ती जल्दी दिन बीत गये। पर कुरसीविहीन जीवन आठ महीने का भी आठ सदियों का दिखता है, दुख के दिन बीतत नाहीं।

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समय का मामला पेचीदा है। सॉफ्टवेयरवाले नौजवान तीन मिनट को बहुत लंबा टाइम मानते हैं। कोई फाइल इंटरनेट से डाऊनलोड होने में अगर तीन मिनट लगाये, तो कंप्यूटर-पोषित-चरित्रवाले नौजवान उसे अति ही दीर्घकालीन अवधि घोषित कर देते हैं। पांच मिनट का वक्त तो उनके लिए अगला युग हो जाता है। एक टेलीकाम कंपनी ने अपने एक इंटरनेट प्लान को प्लान फॉर इंपेशेंट यानी बेसब्रों के लिए प्लान घोषित किया।

सॉफ्टवेयर वाले सेकंड्स में सोचते हैं। घंटे की बात उनके सामने यूं लगती हैं, गोया अगले युग की बात की जा रही है। इतिहास के एक प्रोफेसर से बात हो रही थी। महात्मा गांधी के संदर्भ की किसी घटना की कुछ चर्चा हो रही थी, इतिहास के प्रोफेसर बोले- अरे ये तो अभी की ही बात है। बिलकुल अभी की। मैंने निवेदन किया-सर महात्मा गांधी को स्वर्गवासी हुए ही पैंसठ साल से ऊपर का वक्त हो लिया है। आप कह रहे हैं कि गांधीजी से जुड़ी यह बात अभी की है। इतिहास के प्रोफेसर ने मुझे उस निगाह से देखा, जैसे क्लासिकल सिंगर यो यो हन्नी सिंह को देखते हैं-क्या बेवकूफी है। दरअसल, इतिहास के प्रोफेसर का टाइम-सेंस बहुत अलग होता है, वहां सौ-पचास साल पहले की बात अभी की बात है।
कंप्यूटर-इंटरनेट का कोई नया प्रोफेसर तीन मिनट पहले की बात को अभी की बात नहीं मानता। सदियां बीतीं, युग बीते टाइप की फीलिंग से वह उस फाइल की बात करता है, जो अभी तक इंटरनेट से तीन मिनट में डाऊनलोड ना हो पायी। सरकारी सेवा के निर्माण कामों में लगे इंजीनियरों के लिए दस-बीस साल अभी हाल की बात होते हैं। अरे अभी तो शुरू हुई थी, यह स्कीम, अभी निपट गयी। टाइम-सेंस हरेक का अलग है। जांच-परख कर समझना चाहिए।
क्रिकेट टीम घटिया खेले, तो पांच दिन का टेस्ट मैच बहुत लंबा लगता है। तीन दिनों में तोड़-फैसला हो लेता है, हारने के बाद बाकी के दो दिन टीम के गालियां खाने में कटते हैं। इतनी गालियां पड़ती हैं कि दो दिन दो सदियां लगने लग जाती हैं। गालियां पड़ें, तो दिन बहुत धीमे जाते दिखते हैं, मालाएं पड़ें, बंदे को दो सदियां भी दो दिनों में जाती दिखती हैं। थ्योरी आफ रिलेटिविटी क्रिकेट की हार-जीत में भी समझ में आती है।
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