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निर्मल गुप्त का व्यंग्य : रैली, संसद, सेबिटिकल और लंतरानी

किसानों की जमीन से अधिक अपनी खिसकी हुई राजनीतिक जमीन को फिर पा लेने का उतावलापन था।

निर्मल गुप्त का व्यंग्य : रैली, संसद, सेबिटिकल और लंतरानी

रैली हो गई। रैली होनी ही थी। रैलियां होती रहती हैं। रैली में भीड़ थी। गहमागहमी थी। किसानों की जमीन से अधिक अपनी खिसकी हुई राजनीतिक जमीन को फिर पा लेने का उतावलापन था। गुलाबी पगड़ियां थीं। सोमरस की महक के साथ पसीने की गमक थी। मंचासीन लोगों को अपना चेहरा दिखाने की सनातन उत्सुकता थी। मौसम गर्म था। ठंडाए नेताओं में जोश था। उनके भीतर का अवसाद पिघलता हुआ लग रहा था। लोगों को उनकी बॉडी लैंग्वेज में उचाट मन के रूपांतरण की गाथा लिखी दिख रही थी। मीडिया के रणबांकुरे ओवरबिजी दिख रहे थे। वे रैली स्थल के र्जे र्जे से लगातार पूछ रहे थे कि अब वे कैसा महसूस कर रहे हैं।

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रैली के लिए मंच सजा था। उसे खूब ऊंचा बनाया गया था। यह बात कन्फर्म नहीं है, लेकिन भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि मंच के नीचे फोम के मोटे गद्दे बिछाए गए थे ताकि भावातिरेक में कोई नेता कुरते की बांह चढ़ाता वहां से छलांग लगा दे तो चोटिल न हो। पार्टी और नेता की रिलाउंचिंग के समय ऐसी-वैसी हर बात का ख्याल रखना ही पड़ता है। तिस पर इस बार तो विपश्यना से प्राप्त होश और थाईलैंड प्रवास से प्रवास से प्राप्त अतिरिक्त जोश की साख इसी मंच पर दांव पर लगी थी।
रैली खूब कामयाब रही। वहां व्यवस्था एकदम चाकचौबंद रही। मंच वालों को ठंडा मिनरल वाटर और नीचे भीड़ लगाए लोगों को सादा पानी पिलवाने की माकूल व्यवस्था की गई ताकि वे रैली स्थल पर सरकार को पानी पी-पी कर कायदे से कोस सकें। पार्टी ने भीड़ की हर जरूरत का ख्याल रखा। नेताओं ने मंच से खूब भाषण के फुग्गे उड़ाए। बैंकॉक के अरण्यों में की गई घनघोर तपश्चर्या का फलित उनकी ओजस्वी वाणी से प्रकट होता हुआ लगा। यह प्रतीति जनता को जरा कम और नेताओं को कुछ अधिक हुई। जाकी रही भावना जैसी टाइप की रही।
रैली के दौरान सेबिटिकल की भी खूब चर्चा रही। कुछ लोग दबी जुबान में एक दूसरे से कहते सुने गए-कुछ भी कहो भइया, यह सेबिटिकलवा भी है, चीज भोत ही गजब की। अधिकांश लोगों को लगा कि पार्टी कोई सेबेटिकल ब्रांड का उन्नत बीज काश्तकारों को दिलवाने की मांग उठाने वाली है, जिससे उगी फसल ओले और बेमौसम बारिश में बची रहेगी।
अगले दिन संसद में प्रकट हुए तो वहां भी पार्टी नेता ने अपना जौहर दिखाया। मुल्क की जनता को बताया कि वर्तमान सरकार सूट बूट वाली है। उनकी सरकार जब थी वह लंगोटी वाली थी, यह बात उन्होंने कही नहीं, लेकिन उनके कहने का आशय यही था। इससे पता लगा कि निरंतर विदेश भ्रमण से आदमी किस कदर विचारवान, उदारमना और त्यागी हो जाता है। आलाकमान ने उन्हें सौ में सौ नम्बर देकर पास कर दिया है। पार्टी यह सोच कर प्रसन्न है कि उनके नेता का पुनप्र्रक्षेपण कामयाब रहा और अब वह स्थापित होने के करीब हैं।
लब्बोलुआब यह कि रैली और संसद की तमाम लंतरानियों में काफी कुछ अप्रत्याशित घटित हुआ और मुल्क के हर आदमी को कुछ न कुछ मिलता हुआ-सा लगा। सेबिटिकल बीज धरती पर बिखर गए हैं। अब चारों ओर खुशहाली ही खुशहाली होगी।
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