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अशोक गौतम का व्यंग : तुम्हीं हो फादर-मदर

जब से मेरे बचपन के दोस्त आम से खास हुए हैं, अपना सीना बिना फुलाए चालीस से साठ हो गया है।

अशोक गौतम का व्यंग : तुम्हीं हो फादर-मदर
जब से मेरे बचपन के दोस्त आम से खास हुए हैं, अपना सीना बिना फुलाए चालीस से साठ हो गया है। अब तो न चाहते हुए भी उनसे काम पड़ता ही रहता है। कभी पानी नलके में न आने पर उनको फोन करना पड़ता है तो कभी-कभी बिजली न आने पर। फिर नल में दो दिनों से पानी न आने के चलते पानी वालों को फोन करवाने उनके घर गया, पर वे घर में कहीं न दिखे तो मैंने परेशान होते भाभी से पूछा, नेता जी कहां हैं? घूमने गए हैं क्या? या अभी भी चुनाव के दिनों की भाग दौड़ की थकान मिटाने में लेटे हैं। लगता है अब तो कुंभकरण अगले चुनाव तक ही जागेंगे।
जब से वे पार्टी से निकाले गए हैं बेचारों की नींद हराम हो गई है। पूजा कर रहे हैं भीतर। कुछ दिनों से नई बीमारी पाल ली है। जब देखो पूजा, सौ बार कह चुकी, बहुत हो गई ये पूजा, पर उठने का नाम ही नहीं लेते। सच कहूं भाई साहब, इत्ते असहाय मैंने ये कभी नहीं देखे, जितना इन्हें आजकल देख रही हूं। चेहरे पर जीत की रत्ती भर लाली नहीं, जबान पर पहले सी कोई गाली नहीं। चाय पांच पांच बार गरम करनी पड़ती है। पर इनको तो चाय पीने तक की फुर्सत नहीं,कह भाभी सच्ची को परेशान लगीं तो उनकी यह हालत देख रोना आ गया। कैसा नेता है यह? जीत के महीने बाद ही घरवाली को परेशान करने लग गया। सांसें रोके दबे पांव उनके भगवान रूम में गया तो जो मैंने देखा उसे देख मैं हतप्रभ रह गया।
सामने पार्टी प्रधान की बड़ी सी शीशे में मढ़ी हंसती हुई फोटो बराबर खांसती हुई। और वे फोटो के आगे धूप-दीप, फल-फ्रूट थाली में सजा साष्टांग पार्टी प्रधान की फोटो के आगे अधखुली धोती में पड़े हुए, दीन-हीन से। देख मैं चक्कराया। रहा न गया सो पूछा बैठा, भाई साहब? ये क्या?˜पूजा हो रही है, और क्या? कह वे लेटे-लेटे ही पार्टी प्रधान की फोटो के आगे नाक रगड़ने लगे तो मैं डरा! बची खुची नाक भी जाती रही तो? पर तभी कहीं से भविष्यवाणी हुई कि इनके नाक होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। इनके नाक हो तो भी ये वैसे ही, न हो तो भी ये वैसे ही।
पर किसकी? अपने इष्ट की और किसकी? इनके आगे इन दिनों हर अवतार फेल है। जो ठान लेते हैं बस करके ही दम लेते हैं। देखो तो, उन बेचारों को न घर का छोड़ा न घाट का! देश भर की उदासी चेहरे पर मलने के बाद उन्होंने फोटो के आगे रखे प्रसाद में से एक केला मेरी ओर बढ़ाया तो मैंने केला उनसे प्रसाद रूप में ले जेब में डालते पूछा, पर ये सब चुनाव क्षेत्र के लोगों ने देख लिया तो उनमें क्या मैसेज जाएगा भाई साहब? उन्होंने आपको काम करने को वोट दिया है दिनरात इनकी तस्वीर के आगे लेटे रहने को नहीं।
में जाए काम! यहां तो पार्टी में बने रहने के लाले पड़े हैं। जो मैसेज जाना हो जाए। मुझे अपने को देखना है बस। सोच रहा हूं अपनी जुबान सिलवा लूं। इस देश में किसी जुबान सिलने वाले को जानते हो क्या? हे पार्टी प्रधान! मुझपर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखना बस, और हमें आपसे कुछ नहीं चाहिए, कह उन्होंने कोने में रखी घंटी पकड़ी और घंटी की टन टन के साथ गाने लगे मानो पार्टी प्रधान को अपनी निष्ठा सस्वर सुना रहे हों, तुम्हीं हो फादर-मदर तुम्हीं हो, तुम्हीं हो, तुम्हीं हो नियरर-डियरर तुम्हीं हो़, जो खिल सकें न वो फूल हम हैं, तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं, दया की दृष्टि सदा ही रखना, तुम्हीं हो बिस्तर, चादर तुम्हीं हो, तुम्हीं हो लोटा, गागर तुम्हीं हो।
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