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व्‍यंग्‍य: प्रति व्यक्ति गप, आदम-हव्वा गप के लिए गार्डन में नहीं आते, तो क्या होता

गप का हमारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक जीवन में काफी महत्व है

व्‍यंग्‍य: प्रति व्यक्ति गप, आदम-हव्वा गप के लिए गार्डन में नहीं आते, तो क्या होता
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माहौल कतई गपमयी हो रखा है, हर टीवी चैनलों पर कित्ती-कित्ती सरकारें बन ली हैं दिल्ली की। जब कुछ दिन में फैसला आ ही जाना है, तो कायकू इत्ती माथाफोड़ी मचाओ। ना जी, लंतरानी, गपबाजी को तो भी कुछ चाहिए ना। सो ओपिनियन पोल, एग्जिट पोल और ना जाने क्या-क्या दिखाये जा रहे हैं। यूं देखें तो गप राष्ट्रीय कर्म हो गया है।

खैर, निम्नलिखित निबंध एमए हिंदी के उस छात्र की कॉपी से लिया गया है, जिसने हिंदी निबंध के परचे में टॉप किया है। छात्र ने गप विषय पर यूं लिखा है-गप जैसा कि सब जानते हैं कि गप होती है। गप घर से लेकर टीवी तक होती है। गप का हमारे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक जीवन में काफी महत्व है, बल्कि जानकार तो मानव जीवन की उत्पत्ति के मूल में गप का योगदान मानते हैं।

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गप स्कूल ऑफ मानव ओरिजिन स्कूल के विशेषज्ञों का विचार है कि जब कुछ नहीं था, तब परमेश्वर थे और हव्वा और आदम थे। परमेश्वर रोज अपना प्रवचन दोनों को सुनाया करते थे। उनके प्रवचनों से बोर होकर एक दिन आदम ने हव्वा से कहा या हव्वा ने आदम से कहा-चल छोड़, ऐसे बोरिंग प्रवचनों को, गार्डन में चलकर गप करते हैं। दोनों ने खूब गप की। तत्पश्चात भूख लगी तो सेब खाया। सेब खाने के बाद जो हुआ, वह सब जानते हैं।
मानव जाति यूं अस्तित्व में आयी। जरा कल्पना कीजिये कि अगर आदम-हव्वा गप के लिए गार्डन में नहीं आते, तो क्या होता। तो बस यह होता जी कि परमेश्वर अब भी प्रवचन सुना रहे होते और आदम और हव्वा अब भी प्रवचन सुन रहे होते। और कोई ना होता। इस तरह से गप ने मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। गप का भारी राजनीतिक महत्व भी है।
ऐसा कई विद्वानों का मानना है कि संसद में जो भी कुछ नेतागण करते हैं, वह दरअसल परिष्कृत किस्म की गप की श्रेणी में ही आता है। कह सकते हैं कि गप का हमारे समाचार जगत और बौद्धिक जगत में भारी योगदान है, गप और गपोड़ी न हों, तो सारे समाचार चैनल सूने हो जायें। गप का प्रेम संबंधों में भी योगदान है। जैसे- प्रेमी प्रेमिका से कहता है-आई लव यू। वही प्रेमिका पत्नी बनने के पांचेक साल बाद सोचती है कि हाय आई लव यू बयान सिर्फ गप ही था पर अगर तब ही इसे गप मान लिया गया होता, तो प्रेम संबंधों का विकास कैसे होता। अर्थात सफल प्रेम संबंधों की नींव सफल गप पर ही टिकी होती है, विफल प्रेम संबंधों के मूल में प्राय वे प्रेमी होते हैं, जिनके पास गप-कौशल नहीं होता। कई आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि जिन्हें हम पंचवर्षीय योजनाओं के नाम से पुकारते रहे हैं, वे भी दरअसल गप ही हैं।
थोड़ी जटिल किस्म की गप, जिनका आनंद तमाम फाइव स्टार सेमिनारों में अर्थशास्त्री आदि ही ले पाते हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि किसी राष्ट्र की प्रगति का सही पैमाना प्रति व्यक्ति आय नहीं है, बल्कि यह तो पतन का पैमाना है। जहां आय बढ़ती है, वहां गप कम हो जाती है। अरे आदमी कमाता क्यों है, ताकि चैन से आराम से बैठकर गप-शप कर सके। विकास का एकैदम सटीक पैमाना है-प्रति व्यक्ति गप। अर्थात किस राष्ट्र में बंदे कितनी गप करते हैं। कहना अनावश्यक है कि गपों का आधिक्य उस राष्ट्र की मौज का इंडेक्स माना जा सकता है।
अत: यह भी कहना अनावश्यक है कि इस पैमाने पर भारत विश्व का सर्वाधिक विकसित राष्ट्र है। औसतन एक भारतीय रोज कम से कम पांच घंटे की गपबाजी अपने अंदर करता है, बाबाओं और नेताओं के भाषणों समेत। इस तरह से हम कह सकते हैं कि गपों का राष्ट्र के सामाजिक राजनीतिक आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन में महती योगदान है।
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