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व्‍यंग्‍य: ठंड में रेल यात्री और न्यूज एंकर

चाचा भी कम न थे, ऐसे-ऐसे जवाब दिए कि कपिल शर्मा भी उनके पैर पकड़ लें।

व्‍यंग्‍य: ठंड में रेल यात्री और न्यूज एंकर

जिसे देखो हाय ठंड! हाय ठंड! करता फिरता है। ठंड मे गर्मी का मौसम भला लगता है, तो गर्मियों मे ठंडा मौसम ही प्रियतमा बनता है। न जाने क्यों हमारे ऊपर दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत सदैव चरितार्थ होती है। बात दरअसल यह है कि पिछले दिनों मैं अपने पैतृक शहर जाने हेतु ट्रेन में चढ़ा। ट्रेन को जबरदस्त ठंड लगी हुई थी, सो बेचारी 12 घंटे विलंब से आई। इसी कारणवश हर बार की तरह मुझे ट्रेन पकड़ने की कोई हड़बड़ाहट नहीं हुई।

ट्रेन में चढ़ते ही ऐसा लगा जैसे संसद में पक्ष गायब हो और विपक्ष उपस्थित हो। अधिकतर सीटें खाली थीं और टीटी महोदय उपचुनाव के यथोचित प्रत्याशी से यथासंभव लक्ष्मी वसूलने हेतु बोगी के दरवाजे पर जमे हुए थे। अपने शिकार को करीब आता देख वे चौकन्ने खड़े हो जाते, और अचानक सरकारी नौकर से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की भूमिका में आ जाते। हाथ में हथौड़े के स्थान पे चालान बुक और कानों पे ब्लुटूथ हेडसेट। आंखों में पट्टी तो हर कानूनी आदमी पहनता ही है।

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मैं अपना बिस्तर लगा ही रहा था कि कोच में धड़धड़ाते हुए एक न्यूज एंकर ऐसे घुसे जैसे टीवी पे एक दंतमंजन के विज्ञापन में अदाकारा अपनी खतरनाक एंट्री मारती है। मुझे डर लगा कि कहीं वह एंकर अपनी टोली संग मेरे पास आकर मुझसे मेरे बंदरछाप दंतमंजन में नमक होने के बारे में पूछताछ न करने लगे। किंतु जैसे काला धन आते-आते रुक गया, वैसे ही वो न्यूज एंकर अपने कैमरा पर्सन, सॉरी, विडियो र्जनलिस्ट के साथ दो बर्थ पहले ही रुक गया। उसने पास बैठे बूढ़े व्यक्ति से कहा, चाचा, हम टीवी वाले हैं। आप से कुछ प्रश्न करेंगे, फटाफट बिना बकलौली के उत्तर दीजिएगा। अभी मेरा साथी आपको वे प्रश्न देगा, पांच मिनट मे उत्तर सोच लीजिएगा, फिर हम बाइट लेंगे। उस एंकर के साथी ने चाचा को एक पर्ची थमाई जिसपे कुछ प्रश्न लिखे थे। अपने चाचा भी कम न थे, ऐसे-ऐसे जवाब दिए कि कपिल शर्मा भी उनके पैर पकड़ लें।

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बानगी पेश है-
एंकर: क्या नाम है आपका? कहां जा रहे हैं?
चाचा: जी छोटेलाल। बड़ेगांव जा रहे हैं।
एंकर: अच्छा ये बताइये, ट्रेन लेट है क्या? कितना लेट है?
चाचा: आपने जांचा नहीं क्या? ऐसे ही हवा में चढ़ गए। लेट है तभी तो आप से मिले, वरना घर में आराम से सो रहे होते चारपाई पे।
एंकर: तो क्या परेशानी है आपको?
चाचा: जी गठिया का दर्द अपने चरम पे है।
एंकर: गठिया की नहीं, ट्रेन लेट होने के कारणवश आपको जो परेशानी हुई, वो बताइये।
चाचा: इत्ते कोहरे मे आपलोग मरवाएंगे क्या? अरे ड्राइवर अगर ट्रेन समय पर पहुंचाएंगे तो हम यात्री घर की बजाय हरिद्वार पहुंच जाएंगे। ट्रक के पीछे पढ़ा नहीं क्या आपने-धीरे चलोगे तो घर जाओगे, तेज चलोगे तो हरिद्वार जाओगे। ठीक ही है जो लेट है। आजकल तो विमान गायब हो रहे हैं, फिर ये ट्रेन क्या चीज है भला। कम से कम आई तो है। देर आए पर दुरुस्त आए। अपने मुताबिक उत्तर न मिल पाने के कारण एंकर आगे बढ़ गया। उसने कुछ ऐसे प्रश्न किए कि यात्री उसी विस्मयपूर्ण स्थिति मे आ गए जब वे ये निर्णय नहीं कर पा रहे थे कि लेट होने के कारण यात्रा रद्द करें अथवा जो मिल रही है उसी से निकल लें। प्रश्न कुछ इस प्रकार थे-आप कहां जा रहे हैं? क्या लगता है कि ट्रेन इतनी लेट कैसे हुई? क्या इसका मुख्य कारण मौसम है या कोई सरकारी वजह? जब आपको पता था कि इस समय मौसम खराब रहता है तो इसी ट्रेन से आरक्षण क्यों करवाया? क्या जाना जरूरी था? किससे मिलने जा रहे हैं? क्या पहले कभी सोचा था कि ट्रेन इतनी लेट हो सकती है?
शब्द सीमा के बंधन के चलते मैं प्रश्नों की पूरी फेहरिस्त आपके समक्ष फिर कभी रखूंगा। फिलवक्त, यदि आप कोई रेल यात्रा करने वाले हों तो आपके हित में इतना ही कहूंगा कि उपयरुक्त प्रश्नों के उत्तर अपनी पूर्वनियोजित यात्रा की भांति ही पूर्व-सू-नियोजित कर लें। क्या पता आपकी बोगी में भी कल कोई रिपोर्टर घुस आए और आप पर बंदूक की तरह अपना माइक तान दे। तत्पश्चात आपके जले पे देश का नमक न सिर्फ छिड़के, वरन उड़ेल भी दे।
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