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व्यंग्य : अब वो बात नहीं रही

आजकल मेरी मजबूरी है। मेरा डॉगी बुढ़ा गया है। उसे लंबी दूरी तय करने में कष्ट होता है।

व्यंग्य : अब वो बात नहीं रही
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सुनील सक्सेना-

सुबह की सैर मैं अपने डॉगी के साथ करना पसंद करता हूं। सैर जब लंबी हो तो ऊर्जा का संरक्षण जरूरी हो जाता है। डॉगी के साथ सैर करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि मेरी बोलने में कोई ऊर्जा नष्ट नहीं होती। न वो मुझसे कुछ कह सकता है न मैं उससे कुछ बोल सकता हूं। अगर आप सैर के लिए कोई साथी ढूंढ़ भी लें तो रास्ते भर या तो वो राजनीति पर बात करने लगेगा, या गई रात अगर उसने टीवी पर कोई सीरियल या फिल्म देखी है तो उसका जिक्र ले बैठेगा।

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कुछ नहीं तो नकारात्मक खबरों पर ही विर्मश प्रारंभ कर देगा। आजकल मेरी मजबूरी है। मेरा डॉगी बुढ़ा गया है। उसे लंबी दूरी तय करने में कष्ट होता है। इसलिए मेरे पड़ोसी मित्र रमाकांतजी इन दिनों मेरे मॉर्निंग वॉक के सहचर हैं। हम दोनों के बीच में एक अलिखित अनुबंध है कि सैर के दौरान आपस में कोई बात नहीं करेगा। मजबूरीवश कभी बात करना भी पड़े तो सिर्फ सकारात्मक चर्चा ही होगी। आज सुबह जब हम सैर पर निकले तो मित्र कहने लगे-बांग्लादेश से हम वनडे सीरीज हार गए। ये तो होना ही था। अब धोनी में वो बात नहीं रही।
मैं उस दौरान इस तथाकथित भद्रजनों के खेल क्रिकेट पर बात करने के मूड में बिल्कुल नहीं था। फिर भी साथी का मान रखते हुए मैंने कहा- अब ये तो काई बात नहीं हुई यार। ढेरों मैच जिताए इस धोनी ने। सीरीज पर सीरीज। कभी ये कप तो कभी वो कप। अब ये तो खेल है यार। एक सीरिज क्या हार गए तुमने तो धोनी को नकारा ही घोषित कर दिया।
मित्र के हावभाव से लगा कि वो चाहता है कि बात खिंचे। कहने लगा यही तो मैं तुम्हें बताना चाह रहा हूं कि धोनी में अब पहले जैसी वो बात नहीं रही। यही राइट टाइम है बॉस धोनी को अब अपने करियर के बारे में सीरियसली सोचना चाहिए।मैंने खीझते हुए कहा-धोनी को मारो गोली। तुम तो ये बताओ कि ये जो बात-बात पर तुम कहते हो कि इसमें वो बात बात नहीं नहीं रही, उसमें वो बात नहीं रही, नेताओं में वो बात नहीं रही, खाने-पीने की चीजों में, रिश्तों में, इंसानियत में, आदशरें में, मौसम में..। ये वो बात आखिर है क्या बला?
मित्र ने मेरे प्रश्न का उत्तर उदाहरण सहित दिया। कहने लगा-पहले बासमती या कालीमूंछ चावल जब किसी के घर में अगर पकता था तो कुकर की एक सीटी बजते ही पूरा मोहल्ला चावल की खुशबू से गुलजार हो जाता था।होता था कि नहीं? आप बता दो मुझे आज के चावल में है कहीं वो बात? अब अपनी धक-धक गर्ल माधुरी को ही ले लो। एक टाइम था उसका। आज वो अपने को लाख मेंटेन कर ले पर पहलेवाली वो बात अब कहां दिखती है? नेताओं को देख लो। पहले के नेता मान-सम्मान की बात आ जाए तो सत्ता-वत्ता, पद-वद को तो यूं ही लात मार देते थे।
इधर ट्रेन भिड़ी उधर झट से इस्तीफा हाजिर। वो भी बगैर मांगे। जेब में धरे-धरे फिरते थे इस्तीफा। आज मांग के देख लो किसी नेता से इस्तीफा। तुम ही कहो वो बात कहां रही है आज के नेताओं में?मित्रवर की वो बात का अभिप्राय मैं समझ गया कि बात तो सब में होती है। वक्त जब अच्छा होता है तो ये बात वो बात में तब्दील हो जाती है। जो वक्त के निर्मम थपेड़ों में अडिग रहते हैं, उनमें वो बात अंतिम समय तक जिंदा रहती है। प्रतिकूल परिस्थितियों में यदि तनिक भी विचलित हुऐ तो क्या नेता? क्या अभिनेता? क्या मौसम? क्या रिश्ते? और क्या संवदेनाएं? वो बात खत्म होने में पल भर की देर नहीं लगती है।
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