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निर्मल गुप्त का व्यंग : छुक-छुक रेलगाड़ी की धुक-धुक

तमाम अत्याधुनिक तकनीक के होने के बावजूद कोई नहीं जानता कि ट्रेन वास्तव में कब आएगी। कौन से नम्बर प्लेटफार्म पर पहुंचेगी।

निर्मल गुप्त का व्यंग : छुक-छुक रेलगाड़ी की धुक-धुक
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रेलगाड़ी का अविष्कार हुए मुद्दत हुई पर यह आज तक हमारे भीतर एक अजब कौतुहल जगाती है। प्लेटफार्म पर पहुंचते ही वहां पसरी नाइट्रोजन गैस, भीड़ और ट्रेन के विलम्ब से आने का खेदज्ञापन हमारा स्वागत करके मन में अजब हलचल पैदा कर देता है। तमाम अत्याधुनिक तकनीक के होने के बावजूद कोई नहीं जानता कि ट्रेन वास्तव में कब आएगी। कौन से नम्बर प्लेटफार्म पर पहुंचेगी।

वह जब आएगी तब उसमें वह डिब्बा होगा या नहीं जिसमें रिजर्वेशन हुआ बताया गया है। वह आ गई तो आगे जाएगी या नहीं? इससे भी बड़ी बात यह कि यदि वह डिब्बा हुआ और उसमें रिजर्वेशन वाली सीट भी हुई पर उस पर कोई दबंग आराम फरमाता मिला गया तो? ट्रेन में अपने सामान की खुद रखवाली करनी होती है। रेल विभाग किसी बात की कोई गारंटी नहीं देता। ट्रेन के इर्द गिर्द अनेक परजीवी तत्व और सवालिया निशान सदैव मौजूद रहते हैं। यह सारे प्रश्न सिर्फ आम आदमी के लिए होते हैं। यहां यह बात साफ कर देनी जरूरी है कि यहां आम आदमी से आशय वाकई आम आदमी से है पार्टीबंद आम से नहीं।

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वे तो ब्रांडेड बोतलबंद पानी की तरह पानी होने के बावजूद खांटी पानी नहीं होते। कुछ अलग होते हैं। कुछ बढ़ कर होते हैं। बढ़ चढ़ कर अपने आम होने का रुआब छांटते हैं, लेकिन ट्रेन में जब आम आदमी जैसा दिखने के लिए बड़े नेता विराजते हैं तो रोजर्मरा की कवायद में घिसटने वाली ट्रेन की चाल दुलकी हो जाती है। खास लोगों को अपने करीब पाकर ट्रेन के तेवर भी बदले-बदले से दिखने लगते हैं।

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एक कद्दावर नेता मेट्रो में सवार हुए तो दूसरे जींस और टी-शर्ट वाले नेता ने भी साधारण यात्री की तरह उसमें यात्रा कर मुल्क को मैसेज दिया कि अजी हम भी आम आदमी हैं। हमें भी खिड़की के पास बैठ कर ट्रेन के जरिए यहां से वहां जाना और खेत खलिहानों, बाजार, हाट आदि को टुकुर टुकुर निहारना आता है।

हमें बच्चों के हथेली पर ऑटोग्राफ देकर उनको खुश करना आता है। हमें काटरून फिल्म देखने के अलावा भी काफी कुछ करना आता है। अब ट्रेन में सफर करने वाली जनता सोच रही है कि उनका आमत्व खतरे में है, इसे बचाने के लिए कुछ किया जाए। आज आम आदमी के सामने अनेक खतरे खड़े हो गए हैं। उसके पास ले-दे कर अपने आम होने का मुगालता ही तो था, वह भी जाता हुआ-सा लग रहा है। दिल्ली वाले आम तो सत्ता पाते ही बेलगाम हो गए हैं।

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उनके काम की वजह से तो नहीं अवांतर प्रसंगों के चलते तमाम उम्मीदें धड़ाम हो गई हैं। कामधाम कम होता है, लेकिन ढिंढोरा पूरे जोर से पिटता है। सत्तासीन गवैये गा कम रहे हैं, नपीरी बजा अधिक रहे हैं। सत्ताच्युत पार्टी भेष बदल बदल कर हर दांवपेच आजमा रही है। जब से ट्रेन में आम आदमी की जगह पर खास और खासमखास लोगों ने अतिक्रमण शुरू किया है तबसे ट्रेन की छुक छुक एक अजीब-सी धुक धुक में बदल गई है।

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