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बीच बर्थ में फंसा मध्यवर्ग, वह सारी रात अनुमान लगाता जाता है कि ट्रेन कहां तक आ पहुंची

वह चिहुंकते हुए सिर नीचे लटकाकर, आंखें फाड़ते हुए खिड़की के धुंधले शीशे में से प्लेटफार्म देखने की कोशिश करता है।

बीच बर्थ में फंसा मध्यवर्ग, वह सारी रात अनुमान लगाता जाता है कि ट्रेन कहां तक आ पहुंची
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पिछले दिनों मिडल क्लास (मध्यवर्ग) चर्चाओं में रहा, बहस के बीच में रहा। वैसे बीच बहस सदा ही रहता है। मूंगफली फोड़कर, शब्द तोड़कर उसके होने की अनिवार्यता और बाध्यता पर खूब मंथन हुआ। मिडल क्लास की बात चलते ही मुझे बीच वाली बर्थ का वह यात्री याद आ रहा है, जो सफर पर निकला है। दो बर्थों के बीच उनींदा सा लेटायमान अवस्था में है, अंधियार रात है, ट्रेन गंतव्य की ओर अग्रसर है, उसे नींद नहीं आ रही है।
वह रेलवे की व्यवस्थाओं को कोसता हुआ, उसकी कंबल ओढ़कर सोना चाहता है, ताकि सपनों में उड़ान भर सके। लेकिन ऊपर की बर्थ पर जो कोई लंबी तानकर सोया है, उसके खर्राटे खलल डाल रहे हैं। मन ही मन कुढ़ रहा है। बेचैनी में घुटने मोड़ता है, तो कम स्पेस उसे खलता है। करवट बदलता है, तो नजरें नीचे वाले पर जाती हैं, जो चादर ताने बेसुध सोया पड़ा है। वह चिहुंकते हुए सिर नीचे लटकाकर, आंखें फाड़ते हुए खिड़की के धुंधले शीशे में से प्लेटफार्म देखने की कोशिश करता है।
कुछ दिखाई नहीं देता। सिर्फ चाय गरम की टेर सुनाई दे रही है। ट्रेन चल पड़ती है, जिसका वह यात्री है। एक स्टेशन चला जाता है, दूसरा आ जाता है। वह सारी रात अनुमान लगाता जाता है कि ट्रेन कहां तक आ पहुंची। घड़ी देखकर स्टेशन का अनुमान रेलवे की मेहरबानी से व्यर्थ है, सो बाहर खोमचे वालों की आवाज से एक अंदाजा बैठाता है। वह फिर सोने का यत्न करता है।
नींद मगर आती नहीं। रात बीत रही है, उसे चिंता खाए जा रही है कि अभी उसकी आंख भी नहीं लगी कि ऊपर और नीचे वालों के जागने का समय हो रहा है। पौ फटते ही उसकी बर्थ बलात् फोल्ड करवा दी जाएगी। यह देख उसकी कुंठा और बढ़ जाएगी, जब ऊपर और नीचे वाला आराम से बैठकर चाय के साथ बिस्किट निगल रहे होंगे। वह सुबह ढंग से चाय का आनन्द भी नहीं ले पाएगा, क्योंकि उसके पेट में गैस भरी होगी, गुड़गुड़ मची होगी। चाय की तलब से पहले उसे स्वाद की चिंता है। बड़ी दुविधा है।
आंखों में नींद भरी है। सिर भारी है। बीच में पड़ा कसमसा रहा है। यही है मिडल क्लास। जो कसमसाने को अभिशप्त है। कभी दूसरों को देखकर, कभी खुद के हालात पर। वह हालात को अपनी नियति से जोड़कर ईष्र्या से भर उठता है। कभी उसे लगता है, वह शेषनाग है, जिसके फन पर यह दुनिया टिकी हुई है। कभी वह स्वयं को श्री कृष्ण मान मुरली बजाने लगता है कि उसने दुनिया की सारी जिम्मेदारियों का गोवर्धन पर्वत उठा रखा है। वह डिगा तो दुनिया भार तले दबकर मर जाएगी। कभी वह खुद को शिव मान बैठता है, जिसके गले में गरल का नीला भ्रम अटका है।
दुनिया की हर चर्चा उससे है, हर चर्चा में वह है। वह केन्द्र बिन्दु बने रहना भी चाहता है। वह सपनों में उड़ता है। मुगालतों में जीता है। उसे लगता है, वही सरकार बनाता है, बिगाड़ता है। इनकम टैक्स चुकाता है, जिससे सरकार चलती है। देश चलता है। हर काम के फटे में अपनी टांग फंसाए है। वह मिडल क्लास है, इसलिए चुप बैठना उसका स्वभाव नहीं। अपराधों पर आंदोलित होता है। रेप की घटनाओं पर गुस्सा करता है। कैंडल मार्च निकालता है। भ्रष्टाचार पर सिर धुनता है। टैक्स बचाने की तिकड़में भिड़ाता है। मुट्ठियां भींचता है। हवा में मुक्के लहराता है।
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