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वक्त-वक्त की बात, कभी कभी मनोकामना पूरी नहीं होती

सबकुछ तो है मेरे पास। मेरे नाम का सहारा जिस जिस ने लिया सभी तर गए।

वक्त-वक्त की बात, कभी कभी मनोकामना पूरी नहीं होती
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बहुत दिन बाद आवाज निकली, कैसे निकली, पता नहीं। जब हाथी ने पहली बार अंडा दिया था तो आवाज हलक में ही अटक कर रह गयी थी। बोलती ऐसी बंद हुई कि किसी को शैतान की औलाद भी कहना भूल गयी। सब वक्त वक्त की बात थी। एक समय तूती बोलती थी। हाथी के अंडा देने से पहले बहुत सम्भावना थी कि सर पर हीरेजड़ित ताज पहनकर सवारी करूंगी। मेरे होते हुए भला किसकी हिम्मत थी कि ताज पहन सकता, मगर क्या करूं कभी कभी मनोकामना पूरी नहीं होती। पूरी होती भी कैसे, जो चढ़ावा ईष्ट देवों को चढ़ाया जाना था, वह तो मैंने अपने ही दरबार में चढ़वा लिया था, फिर भी भूख शांत नहीं हो पाई थी।

उसके बाद मैंने सबको वाक ओवर दिया। अपने बंधुवा वोटरों को दीक्षा भी किस मुंह से दी जाती। मिसरवा ने मरवा दिया। कह रहा था। बिरादरी बिरादरी खेलो। बिरादरियों को बंधुवा बनाओ। एक एक खास आदमी को उसकी खास बिरादरी का ठेका दो। बदले में टेंडर छोड़ो। जो ज्यादा बोली लगाये, उसी के नाम से टेंडर खोलो। चांदी ही चांदी। जब भी मौका मिले चूकना नहीं चाहिए, यदि हाथ आया अवसर गंवा दिया, तो समझो गयी भैंस पानी में। दूध से भी गए और मलाई से भी।

पता नहीं क्या क्या लिख कर मेरे हाथ में दे दिया और कह दिया पन्ने पलटती रहना, जैसे सबसे बड़ी पलटीमार मैं ही हूं। पलटी कभी मार दिया करती थी, वह भी मतलब से। अब पलटी मारने की जरूरत क्या है। सबकुछ तो है मेरे पास। मेरे नाम का सहारा जिस जिस ने लिया सभी तर गए। खैर अभी मेरे भीतर सम्मान की भूख बाकी है। जिसे देखो वही मेरा नामकरण करता रहता है। न जाने किस किस की बेटी कहकर प्रचारित करता है।

अब मुझे फिर पुरानी रंगत में लौटना है। सम्मान जो भी सबसे बड़ा है, वह मुझे चाहिए, वह भी बिना पैसे के। मैं वैसे ही बदनाम हूं कि पैसे लेकर टिकट बेचती हूं। अच्छा बताओ कि कोई ऐसा टिकट है जो बिना पैसे के मिलता हो। सिनेमा का टिकट हो, बस का, ट्रेन का, हवाई जहाज का या पानी के जहाज का, अग्रिम पैसे जमा कराओगे, तभी तो टिकट पाओगे। मैं तो कमाई करने के लिए टिकट देती हूं। भला कोई ऐसा है कि पैसों से टिकट खरीदकर समाजसेवा करेगा।

मैंने बहुत समाजसेवा कर ली। अब मुझे अपनी सेवा करनी है। मेरा कहना क्या गलत है कि खास सम्मान खास बिरादरियों के लिए आरक्षित हो गए हैं। आरक्षण की असली हकदार मैं हूं तो खास सम्मान के लिए मेरा आरक्षण क्यों नहीं? अब मुझे संभल संभल का बोलना है। संभल संभल कर चलना है, एक बार मुंबई से चप्पलें क्या मंगवा ली। लोगों ने आसमान सर पर उठा लिया। मुझे हर हाल में सम्मान चाहिए। सो मैं भूमिका बना रही हूं।
आजकल मैं कितनी आहत हूं, मैं ही जानती हूं, भले ही मेरा हाथी अंडे देता रहे, मगर मैं हार नहीं मानूंगी। मीडिया अधिक प्रभावशाली हो गया है न, इसलिए अब थोड़ा अपने आपको सम्भालना जरूरी है। वैसे भी मेरे शत्रुओं की तादाद मुझे कुछ बढ़ी हुई लग रही है। यदि ऐसा न होता तो हाथी अंडा देने के लिए विवश न होता।
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