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व्‍यंग्‍य: ये चार लोग कौन हैं...

मामला वो ही है कि जिन लोगों की राय के आधार पर ये सर्वेक्षण किये जाते हैं वे महानुभव लोग कौन हैं?

व्‍यंग्‍य: ये चार लोग कौन हैं...
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आज मन का विचलन चरम पर है और इसके विचलित होने की वजह इतनी गम्भीर है कि इस मुद्दे पर मिनी सा धरना भी दिया जा सकता है। माजरा यह है कि बचपन से घर में किसी भी असंसदीय बात के हो जाने पर बड़े-बुजुर्गों को यह कहते सुना था कि खयाल रखा करो, चार लोग देखते हैं। आज जब समाज में कुछ इसी प्रकार की घटनाएं घटित हो रही हैं कि मेरा ध्यान बरबस उन पुरातन बातों की और जा रहा है। मन कहता है कि इन घटनाओं में कहीं वे चार लोग ही तो शामिल नहीं हैं।

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यहां क्रमवार समाज में व्याप्त इन घटनाओं का उल्लेख है जिनमें शामिल होने वाले भद्रजनों को मैं शरलॉक होम्स से भी ज्यादा शिद्दत से खोज रहा हूं। चुनाव जब भी आते हैं तब सारे खबरिया चैनल सरकार किसकी बनेगी यह दावा प्रस्तुत करते हैं। अपनी बात को अधिक प्रामाणिक दर्शाने के लिए ये चैनल सर्वेक्षण का दावा करते हैं। मामला वो ही है कि जिन लोगों की राय के आधार पर ये सर्वेक्षण किये जाते हैं वे महानुभव लोग कौन हैं?

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मेरे नाना- नानी तथा दादा-दादी के असीम प्रताप से हमारा भी चाचा-मामाओं से भरा पूरा परिवार है, परंतु किसी भी रिश्तेदार को यह सुख आज तक नसीब नहीं हुआ कि वो किसी भी जनमत सर्वेक्षण का हिस्सा बना हो। हिस्सेदारी तो दूर आज तक किसी ने अपने आस-पास में भी ऐसी कोई गतिविधि को प्रत्यक्ष होते हुए नहीं देखा है। अब ऐसी स्थिति में मेरा उन चार लोगों पर शक करना बिलकुल ही लाजमी-सी बात है क्योंकि वो ही हैं जो दिखते नहीं हैं, परंतु जिनकी उपस्थिति मैं अपने बाल्य काल से महसूस करता आया हूं।

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सारे नेता, तेरी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद कैसे, वाले विज्ञापन की तर्ज पर स्वयं को एक-दूसरे से बेहतर बताने पर आमादा रहते हैं। मेरी लघु दृष्टि यहां उन लोगों की तलाश में है जो इन नेताओं द्वारा आयोजित विशालकाय रैलियों, धरना प्रदर्शनों, जेल भरो आंदोलनों तथा रोड शोज का हिस्सा बनते हैं।
आज तक मुझे मेरा कोई परिचित ऐसा नहीं मिला जिसने इस प्रकार के क्रियाकलापों में शिरकत की हो। मैंने स्वयं शालेय शिक्षण के दौरान (मोतीचूर लड्डू की चाहत में) सिर्फ प्रभात फेरियों में ही हिस्सेदारी की है। अब ऐसी स्थितियों में मेरे लिए यह यक्ष प्रश्न बना हुआ है कि वे कौन से परमपूज्य नागरिक हैं जो इस प्रकार के आयोजनों को सफल बनाने में अपना सर्वस्व झोंक देते हैं?
मैं पूरी तन्मयता से रियलिटी शोज में अपने पैसे खर्च कर एसएमएस से वोटिंग करने वाली लुप्तप्राय प्रजाति में भी उन लोगों को खोज रहा हूं। टेलीविजन पर जब भी कोई रियलिटी शो सेमीफाइनल या फाइनल की पूर्ण गर्भावस्था में आने लगता है तो अनायास हजारों-लाखों की संख्या में ये लोग वोटिंग करने लगते हैं।
मेरा कोमल मन भी कभी-कभी वोटिंग वाली यह हरकत करना चाहता है, किंतु वोट करने की एवज में कटने वाली राशि सदा मेरा रास्ता रोक लेती है। कहा जाता है कि उच्च वर्ग समयाभाव के कारण टीवी देखता नहीं, मध्यम वर्ग देखता है पर वोट नहीं करता और निम्न वर्ग को वोट करना आता नहीं होगा फिर ये चार लोग किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं यह अबूझ पहेली आज भी शाश्वत बनी हुई है।
मेरी तलाश जारी है और रहेगी। यदि आपके पास इन लोगों से संबद्ध कोई सूचना हो तो अवश्य साझा कीजिए क्योंकि इन्हें चिह्न्ति किए बिना समाज की संरचना को समझ पाना एक दुरूह काज है।
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