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व्‍यंग्‍य: और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा

न भूलें, क्रिकेट को धर्म और बाजार में तब्दील मीडिया ने ही किया है।

व्‍यंग्‍य: और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा

आखिरकार, ऑस्ट्रेलिया ने इंडिया को सातवीं दफा टंगड़ी मार ही दी। चारों खाने चित्त कर, सामान बांधकर घर वापस भेज दिया। इतने दिनों से जिस बड़ी जीत की उम्मीद लगाए क्रिकेट-प्रेमी बैठे थे, खाक में मिल गई। बड़े-बड़े खेल में बड़ी-बड़ी बातें होती रहती हैं। खेल में कब किसका पलड़ा भारी पड़ जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। खेल तो खेल है। हर कोई अपने-अपने हिसाब और तरीके से इंडियन टीम की हार व खिलाड़ियों के प्रदर्शन को डिफाइन कर रहा है, लेकिन भक्त टाइप लोग हार को भी डिफेंड कर जस्टीफाई कर रहे हैं।

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कह रहें- एक हार से कुछ न होता जी, पिछले छह मैच तो जीते ही थे। कृपया, आलोचना न करें। वाह जी वाह यह खूब रही। कल तक जब जीत रहे थे तो हम सब तारीफ कर रहे थे, आज जब अपनी गलतियों से हारे हैं तो आलोचना भी न करें। हम भी अजीब हैं, पता नहीं क्यों इंडियन टीम से इतनी भारी-भरकम उम्मीदें पाल लेते हैं कि जिन्हें बेचारे पूरा भी नहीं कर पाते। इतने दिनों से इन उम्मीदों का पार चढ़ाने में खबरिया चैनलों ने जो भूमिका निभाई है, उस पर गुस्सा कम हंसी अधिक आती है।
क्रिकेट को खेल नहीं रहने दिया, युद्ध का मैदान बना दिया। तरह-तरह के देश-भक्ति युक्त नारे, किस्म-किस्म के गाने, अजीब-अजीब सी बातें-हरकतें। एक दफा को तो लग रहा था कि पूरा माहौल ही जोक और जोकर-मंडली में तब्दील हो चुका है। हैरान हो रही थी, पुराने इज्जतदार क्रिकेटरों को भी ऐसी बेहूदगियों का हिस्सा बनता देखकर। जब हार गए तो सबके चेहरे यों लटक गए थे मानो सब के सब गणित के पर्चे में फेल हो गए हों।
अमां, जब जीत पर खिलखिला सकते हो तो हार को बर्दाशत करना भी सीखो। क्योंकि हर दिन होत न एक समान। न भूलें, क्रिकेट को धर्म और बाजार में तब्दील मीडिया ने ही किया है। क्रिकेट पहले भी हुआ करता था, पहले भी खिलाड़ी खेला करते थे, लेकिन इतना उन्माद और बुखार नहीं होता था।
उन्मादी उत्साह के बीच शायद हम यह भूल जाते हैं कि क्रिकेट महज एक खेल है, कॉमोडिटी नहीं। जब खेल या चीज कॉमोडिटी में बदल जाती है फिर वो बाजार का हिस्सा हो जाती है। फिर उसकी सारी चीजें बाजार से ही तय होती हैं। यकीनन, क्रिकेट अब बाजार है। धर्म, भगवान, पैसा, प्यार, शोहरत, आस्था, उत्साह, उन्माद सब कुछ है इसमें। सौ बात की एक बात, हार को सहन न कर पाना सबसे बड़ी हार कहलाती है।
हम क्रिकेट में ही हारे हैं, देश नहीं। देश से बढ़कर खेल नहीं हो सकता। एक तरफ जहां किसान लगातार आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं, दूसरी तरफ हमारा मीडिया हमें क्रिकेट की चाशनी परोस रहा है। कितना दुखद है यह सब देखना। किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, बात उस पर नहीं, बहस यह हो रही है कि इंडियन टीम क्यों और कैसे हार गई। पता नहीं हमारे खबरिया चैनल कब अपने बचपने से बाहर आकर जिम्मेदार बनने का प्रयास करेंगे?
किसान की आत्महत्या से कहीं ज्यादा जरूर उनके लिए क्रिकेट की हार है। कमाल है। हार गए तो हार गए इसमें अफसोस या मातम कैसा? हां जिन वजहों से हारे हैं, उन पर आत्ममंथन तो बनता है। थोड़ा मीडिया को भी सोचना चाहिए कि क्रिकेट ही सबकुछ नहीं, और भी गम हैं दुनिया में क्रिकेट के सिवा।
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