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व्‍यंग्‍य: ठेंगा दिखाता आ रहा है चंदा

उसकी रसीद दे या न दे पर उसका हक किसी न किसी रूप में अदा करता है।

व्‍यंग्‍य: ठेंगा दिखाता आ रहा है चंदा

चंदा खुद-ब-खुद आ रहा है। दबे पांव आ रहा है। बिना किसी पूर्व सूचना के आ रहा है। सात समंदर पार से सीधा बैंक खाते में चला आ रहा है। चैक रूपी कागज की नाव में सवार हो कर आ रहा है। नकद नारायण की धज के साथ आ रहा है। हवाला के जरिये बिना कोई हीलाहवाली किये आ रहा है। निष्काम आकांक्षा के साथ आ रहा है।

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निरपेक्ष भाव से आ रहा है। वह लगातार आ रहा है। गुरुत्वाकर्षण को धता बताता उड़ा चला आ रहा है। आता ही चला जा रहा है। इतराता हुआ आ रहा है। इठलाता हुआ आ रहा है। झूमता हुआ बल खाता आ रहा है। अपनी धुन में ऐंठा हुआ आ रहा है। सम्पूर्ण व्यवस्था का मानर्मदन करता हुआ, उसे ठेंगा दिखाता आ रहा है। ऐसा कभी होता नहीं पर इस बार हो रहा है।

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चंदा आने की बात सबको पता है, लेकिन आने के बाद वह जाता कहां है, इसका पता कुछेक लोगों को ही होता है। चंदा इसलिए दिया जाता है ताकि भविष्य के सारे कामकाज ठीक से संपन्न हो सकें। चंदा वो मास्टर-की है जिससे उम्मीदों पर जड़े प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जंग खाए ताले खुल जाते हैं। चंदा घूस नहीं माना जाता, लेकिन उससे अधिक असरदार होता है।
बंदा चंदा देता है और उसका जिक्र तक किसी से नहीं करता। चंदा पाने वाला उसे याद रखता है। वह उसकी रसीद दे या न दे पर उसका हक किसी न किसी रूप में अदा करता है। चंदा अपने मंतव्य में कभी असफल नहीं होता। लोकतंत्र चंदे के कंधे पर टंग कर नयनाभिराम बनता है। वह ईमानदारी के सर माथे पर सौभाग्य चिह्न् बन कर सुरक्षित रहता है। फैशन स्टेटमेंट बनता है।
एक समय वो भी था जब चंदा धर्मस्थलों की गुल्लकों में बनी झर्िी में गिरता था। लोग उसमें चंदा इस आस के साथ गिराते थे कि उनकी यह दान दक्षिणा गुडलक में तब्दील हो जायेगी। गुल्लक भर जाती थीं तो फोड़ दी जाती थीं। सबके मुकद्दर का आना पाई हिसाब हो जाता था। ऐसे मामलों में उधारी का चलन नहीं था। लोग नकद के लेनदेन में यकीन रखते थे। खाता बेबाक रहता था। फिर भी भूलचूक लेनी देनी की गुंजाइश रखी जाती थी।
समय बदल गया है। चंदा अब भी आता है। दान दक्षिणा के रूप में नहीं, कूट संकेतों में आता है। पारदर्शी स्वरूप में आता है। कभी-कभी किसी के हाथ में आने से पहले ही उनके हाथों को मल्टीकलर बना देता है जो इसे पाते हैं। चंदा प्रिज्म जैसा होता है। इसमें से मनभावन आभा प्रस्फुटित होती है। चंदा हाथों-हाथ लिया जाता है। एक तिजोरी से निकल जिन जेबों तक पहुंचना होता है, बड़े आराम से पहुंच जाता है। इसकी राह एकदम चिकनी चुपड़ी होती है। इसमें कोई स्पीड ब्रेकर नहीं होता।
चुनावी राजनीति के हमाम में चंदे की रकम से खरीदे गए मोटे परदे टंग चुके हैं इसलिए अब न कोई इसमें नंगा नहाता शरमाता है और न मुंह चुराता है। चंदा पाकर आदमी बड़ा बिंदास हो जाता है।
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