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ऑनलाइन आजादी: अनेक लोग व्यर्थ के झंझटों से मुक्त हुए हैं तो वहीं कुछ लोग बेचैन

लगभग सात दशक पहले जो आजादी आधी रात को इस मुल्क में आई थी उसके मुकाबले इस ऑनलाइन स्वतंत्रता ने अपने शैशव में ही गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं।

ऑनलाइन आजादी: अनेक लोग व्यर्थ के झंझटों से मुक्त हुए हैं तो वहीं कुछ लोग बेचैन
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यह ऑनलाइन का जमाना है। शुभकामनाओं से लेकर गालियां तक बड़ी आसानी से यहां से वहां चली आती हैं, इतनी मात्रा में आती हैं कि लगता है कि इस दुनिया में शुभता और अपशब्दों के सिवा कुछ बचा ही नहीं है। सोशल मीडिया पर किसी के गुजरने की सूचना आती है तो देखते ही देखते हजारों लाइक्स और सैकड़ों नमन आ जाते हैं। झुमरीतलैया में कोई मैना पिंजरे से गायब हो जाती है तो पूरा आभासी संसार उसकी इस हरकत पर दो खेमों में बंट कर गहन विर्मश में तल्लीन हो जाता है। मैना के इस साहस, दुस्साहस और नादानी पर लोग अपने-अपने तरीके से गम, गुस्से और तारीफ का इजहार करने लगते हैं। अभिव्यक्ति की इस ऑनलाइन आजादी ने पूरे मुल्क को निहायत वाकपटु बना दिया है।

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आजकल सब कुछ ऑनलाइन उपलब्ध है। जूते से लेकर बनारसी पान और कानों में झुमके से लेकर कजरारे नैनों के लिए सुरमे की सलाई तक सब मिलता है। घटी दरों पर मिलता है। सरल रिटर्न पॉलिसी के साथ मिलता है। डिलीवरी मिलने के बाद भुगतान करने की सुविधा के साथ बिकता है। घर पर चैन से बैठे बिठाये मिल जाता है। दुकानदार के साथ मोलभाव किये बिना उपलब्ध हो जाता है। इस ऑनलाइन तकनीक के चलते अनेक लोग व्यर्थ के झंझटों से मुक्त हुए हैं तो वहीं कुछ लोग बेचैन।
ऑनलाइन स्वच्छंदता ने नैतिकतावादियों के नाक में दम कर दिया है। अराजकतावादी लेखकों और कवियों ने अनुशासनप्रिय संपादकनुमा लोगों को हाशिए पर धकेल दिया है। सोशल मीडिया पर महादबंग बाहुबली नेता तक की कोई गली मोहल्ले का सींकियाछाप पहलवान टिल्ली लिल्ली करके रख देता है।
लगभग सात दशक पहले जो आजादी आधी रात को इस मुल्क में आई थी उसके मुकाबले इस ऑनलाइन स्वतंत्रता ने अपने शैशव में ही गुल खिलाने शुरू कर दिए हैं। पूत के पांव पालने में अपना कौतुक दिखा रहे हैं। अधिकांश चिंतक इसकी नाक में नकेल डालने के किसी न किसी रूप में हामी रहे हैं। वैसे भी उनको तय मिकदार से अधिक आजादी ठीक वैसे ही हजम नहीं होती जैसे शहरी छैलाओं को शुद्ध देसी घी में बने पकवान।
इसी वजह से सरकार सोशल मीडिया की डाल पर बैठ कर समय-असमय चिचियाने वाले उन्मुक्त परिदों के पर कतरने के लिए कानून भी लायी थी, लेकिन आला अदालत ने उसे रफूचक्कर कर दिया है। अब सब पहले जैसा हो गया है। ऑनलाइन अभिव्यक्ति के लिए सारे दरवाजे दोबारा खुल गए हैं।
अब यदि ऑनलाइन हिमाकत से निबटना है तो खुद को ऑनलाइन करने का हुनर सीखना होगा। इस मामले में पुलिसिया डंडे का खौफ काम नहीं करने वाला। ऑनलाइन रणबांकुरों का सामना करने के लिए सदैव ऑनलाइन होना होगा। वह समय आ गया है कि जब कोई किसी से उसका एड्रेस पूछेगा तो जवाब मिलेगा कि वह किसी गली मोहल्ले या खोली में नहीं ऑनलाइन रहता है। उससे यदि मिलना, बतियाना या झगड़ना तो कृपया व्हाट्स एप, फेसबुक या ट्विटर पर आएं।
पहले सोशल मीडिया के अखाड़े में आकर आमने-सामने दो-दो हाथ करें। किसी पुरानी अदावत का हिसाब किताब करना हो तो पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजें और फिर कमेंट कॉलम में तेजाबी बयान लिख कर अनफ्रेंड (अमित्र ) बनें। अमित्र बनने के लिए पहले मित्रता को अंगीकार करना ही होगा और कोई विकल्प नहीं। सोशल मीडिया पर भिड़ने का भी एक कायदा होता है। सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में कभी रात नहीं होती, यहां सब कुछ उजलेपन में खुलेआम होता है।
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