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व्यंग्य : फुटपाथ की जिंदगी

कइयों ने तो तब मुझे लेबर चौक पर खड़े देखकर समझा था कि मैं भी कोई लेबर वाला ही होऊं।

व्यंग्य : फुटपाथ की जिंदगी
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सरकारी ठेकेदार से आधे रेट में चोरी के सीमेंट के दस बैग ले तब चार महीने से गिरी दीवार को चिनवाते हुए मुझे ऐसा लग रहा था मानो मैं गिरी दीवार न चिनवा ताजमहल के बंदरों की उछल कूद से गिरे छज्जे की रिपेयर करवा रहा होऊं। मिस्त्री के चक्कर में चार दिन लेबर चौक पर सारा दिन चटकती धूप में सिर से पांव तक पसीने से नहाने के बाद बड़ी मुश्किल से एक चिनाई करने वाला मिस्त्री मिल पाया तो मानो मैंने संतोष धन पाया।

कइयों ने तो तब मुझे लेबर चौक पर खड़े देखकर समझा था कि मैं भी कोई लेबर वाला ही होऊं। आजकल अपने यहां सबकुछ मिल जाता है पर काम करने वाले नहीं मिलते। न दफ्तरों में, न दफ्तरों के बाहर। मिस्त्री मिला तो अपना सीना फूलकर छप्पन हुआ। उसे घर लाते हुए मैं ऐसा गर्व महसूस कर रहा था कि जैसे मेरे पास उस समय की स्थिति को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। हर चीज के टोटे में तो जी ही रहा हूं, आजकल शब्दों के टोटे में भी जी रहा हूं।
उसने जैसे ही हमारे घर में कदम रखे तो उसका चाय से स्वागत किया गया। चाय पीने के बाद दो चार बीड़ियां हुईं। फिर उसने रेत के ढेर को धूप जला उसका पूजन किया और अपने फटे बोरे में से अपना सामान निकाल उसका पूजन किया तो मैंने पड़ोसियों में लड्डू बांटे। ज्यों ही हिम्मत कर उसने सीमेंट-रेता घोला तो मन गदगद हो गया। पर आज मिस्त्री नहीं आया तो माथा ठनका। यार! क्या बात हो गई होगी? बंदा अभी तक नहीं आया। कल का सीमेंट-रेता मिलाकर रख गया है। सेट हो गया तो? बीसियों बार घड़ी देखी। बीसियों बार उसे फोन किया पर नो रिस्पांस। हुनर वाले लोगों के साथ यही तो बस एक पंगा है।
जब उसकी बाट निहारते-निहारते बारह बज गए तो साहब आए ठुमक-ठुमक। मानो वह मिस्त्री न होकर मेरे ऑफिस के बड़े बाबू हों। वह आया तो मेरी जान में जान आई। मैंने आते ही उसकी सेवा करते चाय बनाई तो वह चाय का घूंट लेते बोला, बाबू! हम अपने गांव जा रहे हैं। चाय पीने के बाद ही। क्यों, क्या हो गया गांव में?कुछ नहीं। इस शहर को ही कुछ हो गया है,कह उसने अपने कान पर रखी आधी पीकर बुझी बीड़ी सुलागाई। तो यार इस गिरी दीवार का क्या होगा?हम नहीं जानते। हम इस शहर में अब और नहीं रह सकते, बस। पर क्यों? शहर तो यार है ही तुम लोगों का।
हमें फुटपाथ पर सोते हुए अब डर लगता है। साहब! आदमी और कुत्ते में कोई फर्क होता है कि नहीं? वे गवैये कह रहे हैं कि कुत्ता सड़क पर सोएगा तो मरेगा ही। सड़क हम जैसों के बाप की नहीं। हम कहते भी कब हैं कि सड़क हमारे बाप की है। हमने इत्ते बड़े-बड़े शहर सड़क पर सो कर बना दिए तो बाबू क्या हम मूर्ख हैं? न हमें यहां सड़क बनानी है न आपके ऊंचे-ऊंचे महल। यह सड़क तो बिन लाइसेंस गाड़ी चलाने वालों की है, शराब पीकर गाड़ी चलाने वालों की है।
अपना गांव छोड़ फुटपाथ पर सपने लेते आपके महल बनाने वालों पर गाड़ी चढ़ाने वालों की है पर बाबू हम सीना ठोक कर कहे देते हैं कि हम सबकुछ हैं पर कम से कम कुत्ते नहीं हैं। इस जेल-बेल के खेल में हमें आगे नहीं मरना। हम अभी रेल से अपने गांव जा रहे हैं। पर यार, गलती तो खुदा से भी हो जाती है और वह तो..। उसने मेरी एक न सुनी और अपना सामान बोरे में डाल बीड़ी पीता आगे हो लिया।
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