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व्‍यंग्‍य: शरीफों के भी दिन फिरे, चुनाव के मैदान में हम जैसे शरीफों का क्या काम

किसी भाई-वाई को टिकट दीजिए और अपनी सरकार पक्की कीजिए। हम ठहरे राशन के डिपू का आटा खाने वाले लोग।

व्‍यंग्‍य: शरीफों के भी दिन फिरे, चुनाव के मैदान में हम जैसे शरीफों का क्या काम
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रिश्तों के कोहरे में एक हाथ दूसरे हाथ को ढूंढ़ने की बेकार सी कोशिश कर रहा था कि तभी पत्नी ने तुनकते हुए कहा, ‘जब देखो कोहरे में कोई हाथ ढूंढ़ते रहते हो? जब कोई हाथ, हाथ के साथ है ही नहीं तो पता नहीं बेकार में टाइम क्यों खराब करते रहते हो? बड़ी गंदी बीमारी पाल ली आपने भी बुढ़ापे में। कोई बाहर आया है। बड़ी देर से दरवाजा बजा रहा है। इससे पहले कि दरवाजा कब्जों समेत उखड़ कर अंदर आ जाए देख लो, कौन है?’ तो मैंने कोहरे में हाथ ढूंढ़ना बंद कर बाहर आए आगंतुक के स्वागत हेतु अपने को अनमने से आधा-पौना तैयार किया।

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दरवाजा खोला तो सामने नेता से कोई, पर मैंने उन्हें सीरियसली इसलिए नहीं लिया कि आजकल अपुन की दिल्ली में नेता अधिक वोटर कम हो गए हैं। जिसे देखो वही कबाड़ी-शबाड़ी से खद्दर ले अपने को नेता घोषित करने में जुटा है। इससे पहले कि वे हाथ जोड़ते मैंने ही दोनों हाथ जोड़ चेहरे पर जबरदस्ती की हंसी लाते कहा, ‘ठीक है साहब! आपको ही वोट देंगे, वोट के सिवाय हम आपको और तो कुछ दे नहीं सकते।’ मैं दरवाजा बंद करने को हुआ तो वे हाथ जोड़ते बोले, वोट से पहले उम्मीदवार चाहिए साहब! यंग्‍य: भगवानजी की मूर्ति के करीब सेंसेक्स की भी तस्वीर रख ली थी

‘क्या मतलब आपका?’ ‘आप जरा भीतर आने दें तो..,’ कह वे मुझसे पहले मेरे घर में यों घुसे जैसे यह घर मेरा न होकर उनका हो। भीतर आ जरा आराम कर उन्होंने बड़े अपनापे से कहा, ‘साहब! बहुत भटका दिया अबके इस दिल्ली के चुनाव ने। सबकुछ मिल रहा है पर.., हम आपको अपनी पार्टी की टिकट दे चुनाव लड़ाना चाहते हैं,’ उनके मुंह से यह सुन मैं चौंका तो पत्नी उछली। ‘लड़ूं और मैं! देखिए साहब! मसखरी मत कीजिए। चुनाव के मैदान में हम जैसे शरीफों का क्या काम? किसी भाई-वाई को टिकट दीजिए और अपनी सरकार पक्की कीजिए। हम ठहरे राशन के डिपू का आटा खाने वाले लोग।

हम सबकुछ कर सकते हैं पर पानी को दूध नहीं कह सकते। दूसरे, रही लड़ने की बात। सो मैं तो अपनी पत्नी से भी आज तक नहीं लड़ा। और जब-जब दुस्साहस कर लड़ा हूं, मुंह की ही खानी पड़ी है! ऐसे में..,’ मैंने न चाहते हुए भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। ‘खैर, पत्नी से तो आज तक कोई नहीं जीत पाया। पत्नी से जीतने से आसान चुनाव में जीतना है भाई साहब! अबके हमारी पार्टी की नैया की पतवार आप जैसों के हाथों में ही है। आप बस हां कर दो तो शाम को जारी हो रही लिस्ट में आपका नाम डाल दें,’ जिस कातर भाव से उन्होंने मेरी ओर देखा, सच कहूं मुझे पहली बार उन पर बड़ी दया आई। ‘मतलब, मैं और नेता?’

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‘असल में दिल्ली के लोग अबके राजनीति में साफ छवि वाले चेहरों को जीताने का मन बना रहे हैं। माफ कीजिएगा, इसीलिए आपको कष्ट देने आए हैं वरना..।’ ‘अरे साहब! अपने पास असल में चेहरा है ही कहां? जब भी शीशे के सामने बनने-ठनने के लिए खड़ा होता हूं तो कमबख्त और तो शीशे में सबकुछ दिखता है पर अपना चेहरा नहीं दिखता।’ ‘बस!
हमें ऐसे ही चेहरों की तो तलाश है। अब आप जल्दी से हां कर दो तो हम दर्जी को फोन लगाएं कि..,’ कह उन्होंने फोन निकालने के लिए मेरी जेब में हाथ डाला तो मैं हैरान, ‘अब दर्जी किसलिए?’ ‘आपके नाप का खद्दर का कुरता पाजामा बनवाने के लिए! अब आप नेता होने जो जा रहे हो!’ कह वे मेरी स्वीकृति का इंतजार करने लगे। आपकी इजाजत हो तो हां कह दूं क्या?
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