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मेरा इस्तीफा तो ले लो प्लीज! पार्टी कार्यालय में कोई है भी कि पंखा बेकार में ही चल रहा है?

अब आप से छुपाना क्या? घरवालों ने उसी दिन नकार दिया था जिस दिन हमने घर का काम काज करना छोड़ ये नेताई पोशाक पहनी थी।

मेरा इस्तीफा तो ले लो प्लीज! पार्टी कार्यालय में कोई है भी कि पंखा बेकार में ही चल रहा है?
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साहब! हम तो चुनाव के नतीजे आने से पहले ही अपनी हार की नैतिक जिम्मेदारी आपके ऊपर डाल अपना इस्तीफा लहराते पार्टी से इस्तीफा देने के लिए इस्तीफा विंडो की लाइन में खड़े हो गए थे पर देखो तो ऑफिस में अभी तक कोई हमें सुनने वाला ही नहीं। क्या पार्टी कार्यालय में कोई है भी कि पंखा बेकार में ही चल रहा है? आखिर कहां गए आप लोग?

हे दफ्तर वालों! देखो तो, कई सुबह से ही मेरे पीछे मेरी तरह पचासियों बिन नाश्ता पानी किए हाथ में इस्तीफा लिए वैसे ही खड़े हैं जैसे बचपन में सुबह-सुबह हाथ में पानी की बोतल लिए हम मुहल्ले वाले पाकिस्तान जाने के लिए अपने अपने पेट को पकड़े कमेटी के दो सार्वजनिक शौचालयों के बाहर खड़े होते थे कि कब कोई व्यक्ति अंदर से बाहर निकले तो उसका नंबर पड़े। पर क्या हो गया हमारे दफ्तर को? यहां तो अंदर से कोई बाहर आ ही नहीं रहा है। यहां इतना सन्नाटा क्यों है भाई। अरे भाई साहब! कोई तो बताए कि मेरी पार्टी का दफ्तर आजकल कितने बजे खुल रहा है? पहले तो ये चौबीसों घंटे ही खुला रहता था।
हे प्रभु! क्या दिन आ गए अपने भी! एक जमाना वह भी था जब आप हमसे इस्तीफा देने के लिए चारों ओर से प्रेशर डालते-डालते मर जाते थे, धरने देते-देते सो जाते थे, मुझ पर आरोप लगाते-लगाते आपके मुंह का थूक तक सूख जाता था, पर एक हम थे कि हमारे कानों पर जूं तक न रेंगती थी। हमें किसी की आवाज तक न सुनाई देती थी। और आज हम ही रेंगने लायक न रहे। तब हम बस यही कहते रहते थे कि जब तक हम पर आरोप सिद्घ नहीं हो जाते, तब तक हम और तो अपना सबकुछ देंगे पर इस्तीफा नहीं देंगे। और आज जब हम अपना इस्तीफा देने के लिए चार सुबह से खड़े हैं तो यहां कोई इस्तीफा लेने वाला है ही नहीं! ऑफिस छोड़ कर कहां चले गए हे मेरी पार्टी वालों?
अब आप से छुपाना क्या? घरवालों ने उसी दिन नकार दिया था जिस दिन हमने घर का काम काज करना छोड़ ये नेताई पोशाक पहनी थी। उनसे बड़ी बड़ी बातें करनी शुरू की थी। उन्हें बाग के बदले सब्जबाग बताने का दुस्साहस किया था। तब घरवालों ने साफ कह दिया था कि इस घर में रहना है तो घर के काम करो या जनता का उल्लू बनाना शुरू करो, जिस थाली में खाते हो उसी थाली को उल्लू बनाते हुए शरम नहीं आती? खैर, शरम नाम की कोई चीज तो हमारे पास पैदा होते ही गायब थी। अगर हममें शरम होती तो हम देश के वोटर होते।
आखिर हमने देश हित में घर का त्याग कर डाला और तय किया कि अपने उल्लू बनाने के बाजार को अपने घर से बाहर ले जाएंगे। मुफ्त में जो किसी को सुगंध दो तो उसे जुखाम ही होता है। और हमने देश सेवा के ध्ांधे में हाथ डाला तो लगा कि बावले हो गया। जनता का उल्लू बनाना तो बड़ा आसान काम है। इतनी जल्दी तो असली के उल्लू को भी उल्लू नहीं बनाया जा सकता। और देखते ही देखते हमने जनता का उल्लू बनाने में महारत हासिल कर ली। पर अब पता नहीं उल्लू को कैसे अक्ल आ गई और हमारी बीसियों बरसों से चली दूकान पर कमबख्त ने ताला लगा दिया। ताला भी ऐसा लगाया कि..।
ओ भाई साहब! मैं कब से पार्टी कार्यालय के सामने गला फाड़े जा रहा हूं? क्या अंदर कोई है? अब मुझसे और नहीं खड़े हुआ जाता! पार्टी का वरिष्ठ होने के नाते अब मेरा इस्तीफा ले लो प्लीज! मुझे पहली बार इस पार्टी का अपने को मेंबर कहते हुए पहली बार शरम आ रही है। अब अपने को और नहीं छला जाता! भ्रम में आपको जीना है तो जीते रहिए। इस्तीफा देने के लिए चीखते-चीखते मेरा गला सूखा जा रहा है। सच कहें तो इस देश के वोटरों से तो मेरा मोह भंग हो ही गया, अब अपने आप से भी हो गया है। कमबख्त खाते किसी और का हैं, और अंडा देते कहीं और हैं।
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