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समस्या-मुक्त देश! बेतुके मुद्दों पर हर कोई अपने-अपने गाल बजाता है

मुफ्ती मियां भी अजीब हैं, कभी पाकिस्तान की तारीफ तो कभी आतंकवादी को छोड़कर बेतुकी बहस को हवा देते रहते हैं।

समस्या-मुक्त देश! बेतुके मुद्दों पर हर कोई अपने-अपने गाल बजाता है
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लगता है, देश से सारी समस्याएं ‘विलुत्प’ हो ली हैं। न नेता, न सरकार, न बुद्धिजीवी, न लेखक, न साहित्यकार किसी को देश में कहीं कोई समस्या नजर ही नहीं आती! सब के सब अपने-अपने झगड़ों में ऐसे लिपटे हुए हैं कि दुनियादारी भूल ही गए हैं। गजब यह है कि देश की समस्या पर बात नहीं होती और ‘बेतुके मुद्दों’ पर न केवल बात, बल्कि संसद से लेकर सड़क तक पर ‘बखेड़ा’ मच जाता है। बेतुके मुद्दों पर हर कोई अपने-अपने गाल बजाता है।

मीडिया भी बेतुके मुद्दों पर इत्ता ‘मेहरबान’ रहता है कि उसे पीडीपी के नेता ने क्या कहा या क्रिस गेल ने दोहरा शतक कैसे जड़ा यह तो याद रहता, लेकिन हालिया बरसात ने कित्ते किसानों को बरबाद कर दिया, यह भूल जाता है। देखिए न, वायदे तो दिल्ली की सरकार ने भी खूब सारे किए थे कि हम ये कर देंगे, हम वो कर देंगे, लेकिन थोड़ा-बहुत पानी-बिजली सस्ता कर वे भी चैन की बंसी बजा रहे हैं। और अपनी पार्टी के अंदरूनी लड़ाई-झगड़ों में ऐसे ही लगे हुए हैं कि उन्हें दिल्ली की जनता की फिक्र ही नहीं।

फिक्र होगी भी क्यों भला, जनता अपनी हिफाजत के लिए खुद है ही। ‘आप’ के मुख्यमंत्री इलाज में बिजी हैं और पार्टी वाले अपनों की उतारने में। फिर भी कहते नहीं थकते कि हम जैसा जन-हितैषी और ईमानदार कोई नहीं। उधर, केंद्र सरकार पीडीपी गठबंधन में ऐसी उलझी हुई है कि हर रोज संसद में हंगामा होता है। मुफ्ती से दोस्ती कर सरकार ने ‘मुफ्त की मुसीबत’ मोल ले ली है। मुफ्ती मियां भी अजीब हैं, कभी पाकिस्तान की तारीफ तो कभी आतंकवादी को छोड़कर बेतुकी बहस को हवा देते रहते हैं।

मियां, कश्मीर की जनता ने अपनी खुशहाली के तईं आपको वोट दिया था ना कि इन चोचलेंबाजियों के लिए, लेकिन मियां हैं कि मानते ही नहीं। रायता पीडीपी वाले फैला रहे हैं और सिमेटना बीजेपी वालों को पड़ रहा है। न उनके कने जनता के मुद्दें हैं न इनके कने कोई दूसरा काम। ‘इंडियाज डॉटर’ को लेकर इत्ती हू-तू-तू हो रही है, गोया स्त्री से जुड़ी सारी समस्याएं डॉक्यूमेंट्री को देखाने न दिखाने से ही हल हो जाएंगी। डॉक्यूमेंट्री के बहाने सबसे ज्यादा हाथ प्रगतिशील तबका सेंक रहा है।

प्रगतिशील तबका तो वैसे भी बेताब-सा रहता है, ऐसे मुद्दों को झट्ट से लपक लेने में। चूंकि उनके कने खुद की जमीन अब बची नहीं इसीलिए बेचैन रहते हैं दूसरे की जमीन कब्जाने को। देश की समस्याओं से प्रगतिशील तबका भी बेखबर है, क्योंकि उसके लिए ये खबर ही नहीं। खुद प्रगतिशील तबका महिलाओं की बेहतरी के लिए कित्ता सजग है, बतलाने की जरूरत नहीं। उन्हें तो मुफ्त की रोटियां सेंकने से मतलब-चाहे यहां सेंके या वहां।

मेरे तो मन कभी-कभी करता है कि मैं देश की जनता को ‘धन्यवाद’ दूं कि उसके पास अपनी कोई समस्या नहीं। अगर है भी तो खुद ही निपट लेती है। अपनी समस्या का बोझ न नेता पर डालती है न सरकार पर। सरकार के पांच साल तो चुनावी वायदों को बरगलाने में ही निकल जाते हैं। अब बिचारी सरकार भी क्या करे, वो पहले पीडीपी से निपटे या देश की समस्याओं से। रही सही कसर, साधु-संतों के ‘फिल्मी डायलॉग’ पूरी कर देते हैं।

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