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व्‍यंग्‍य: अब बड़े बाबू, आपके बाद हमने करप्शन फैलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी...

गधे के आगे भी एक्सटेंशन के लिए नाक रगड़नी पड़ती तो रगड़ता पर देश का ये हाल न होने देता।

व्‍यंग्‍य: अब बड़े बाबू, आपके बाद  हमने करप्शन फैलाने में कोई कोर कसर  नहीं छोड़ी...

उनके कुर्सी से निवृत्त होने का जनता तो जनता, सच कहूं तो मैं भी पता नहीं कबसे इंतजार कर रहा था। मैं तो चाहता था कि बड़े बाबू ऐसे नहीं तो दफ्तर से वैसे ही चले जाएं। उनकी कुर्सी का काम मुझे मिला तो पता चला वे क्या-क्या करते थे। ऐसे ही तो कोई बंदा रोज नया सूट नहीं पहना सकता। वेतन में तो बस रोटी ही चलती है प्यारे। जो उससे आगे निकलते हैं उनके दूसरे ही खेल होते हैं सारे। आज बड़ी मुश्किल से मौका मिला तो सोचा उनके घर उनके हालात पे रोने जा ही आता हूं। अब तक तो बेचारे रह गए होंगे आधे। ये कुर्सी की मौज आदमी को कुर्सी से हटने के बाद निर्बल, असहाय, निरुपाय और न जाने क्या-क्या पाय बना देती है।

ज्यों ही उनके घर पहुंचा तो वे घर में मुझसे भी अधिक आक्रमकता से मिले जितने आक्रमक वे जनता का काम करने के लिए ऑफिस में हुआ करते थे। अभी मैं उनके लिए लाए केले उनकी ओर बढ़ा भी नहीं पाया था कि वे लाल-पीले होते बोले, ‘शर्म आनी चाहिए यार तुम लोगों को! चुल्लू भर पानी में डूब मरो, जो कहीं मिले तो। हमारा नाम ही डूबो कर रख दिया। क्या यही दिन देखने के लिए रिटायर हुए थे हम? अगर हमें पता होता कि हमारे रिटायर होने के बाद तुम लोग देश की इतनी फजीहत करवाओगे तो खुदा कसम, गधे के आगे भी एक्सटेंशन के लिए नाक रगड़नी पड़ती तो रगड़ता पर देश का ये हाल न होने देता।’ ‘आखिर हुआ क्या बड़े बाबू? हमसे ऐसा क्या हो गया जो आपके रिटायरमेंट के बाद..’ पर वे थे कि पैरों पर पानी ही नहीं ले रहे थे। ‘होना क्या? तभी तो तुम लोगों को कहता रहता था कि रिश्वत लेना सीखो रिश्वत! पर नहीं, तुम्हें तो लगता था जैसे नारंग गधा है। अब देखा न नतीजा। अपनी तो अपनी हम रिटायरियों तक की वह नाक कटवा कर रख दी, जो हमने नौकरी में रहते कटते कटते भी कटने नहीं दी।’
‘पर बड़े बाबू आखिर हो क्या गया?’: ‘होना क्या? जो हो गया सो हो गया। अब क्या पछताए होत..।’ वे आगे मुंह बनाते रहे पर मुहावरे की आगे की लाइनें नहीं उगल पाए तो नहीं उगल पाए, ‘अरे आप लोगों की लापरवाही के चलते देश करप्शन में पिछले साल की अपेक्षा दस पायदान नीचे आ गया। शर्म करो शर्म! महीना पहले मैं क्या करप्शन छोड़ कर आया था और तुम महीने में ही देश को करप्शन में इतने नीचे ले आए कि..’ कह उन्होंने पहली बार शर्म से सिर झुकाया तो उनकी राष्ट्रीय शर्म में न चाहते हुए भी शामिल होने के लिए मेरा सिर स्वत: ही झुक गया। ‘अब बड़े बाबू, आपके बाद अपनी ओर से तो हमने करप्शन फैलाने में कोई कोर कसर छोड़ी नहीं है, आपकी कसम! दिन रात एक कर दांत- नाखून जुटे तो हैं पर उसके बाद भी अगर..,’ कह मैं उनके पांवों पर इसलिए गिर पड़ा कि अगर उनका बीपी और हाई हो गया तो कुछ का कुछ और न हो जाए।
‘तो ये सब क्या है?’ कह उन्होंने गुस्से में अपने सिरहाने के नीचे से ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की ताजी रिपोर्ट निकाली।
‘बड़े बाबू! ये जनता का हमें खिलाने के लिए मनोबल बनाए रखने के लिए भी तो हो सकता है। अगर रिपोर्ट में यह छापा जाता कि हम करप्शन में पिछले साल से आगे हैं तो जनता में क्या मैसेज जाता भला..? तब तो वह हमारे ऑफिस आना ही छोड़ देती,’ मैंने शब्दों में उन्हें लपेटने की कोशिश की तो वे कुछ रिलीफियाते से लगे, ‘खुदा करे ऐसा ही हो गौतम!’
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