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पढिए व्‍यंग्‍य: राष्ट्र निर्माण बनाम लड्डू निर्माण

इसलिए कुछ समय के लिए राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण के महान कार्य को मुल्तवी कर लड्डू निर्माण पर फोकस किया जाना चाहिए।

पढिए व्‍यंग्‍य: राष्ट्र निर्माण बनाम लड्डू निर्माण

बमौसम भी सरकार की तरह यू टर्न लेकर और नेताओं के लेवल पर उतरकर बेहद ठंडा व्यवहार करने पर उतारू हो जाए, तो आम लोग और ज्यादा आम हो जाते हैं, खास और ज्यादा खास। इस समय पता नहीं दोष दिसंबर को दें कि मौसम को, लेकिन सच्चाई यही है कि चलते-फिरते शरीर अचानक अपने पास उपलब्ध रजाइयों में समा कर गुम हो गए हैं, जैसे नेताओं में नैतिकता गुम हो जाती है। जिनके पास अपनी जेबें हैं, उन्होंने अपने हाथ उनमें सुरक्षित रख दिए हैं। मंकी टोपियों वाले सिर पहचान में नहीं आ रहे हैं। टोपी के चक्कर में मंकी नाहक बदनाम हो रहे हैं। जिनके पास कुछ नहीं हैं, वे या तो अलाव की शरण में हैं या लाचारी ही उनका आवरण है।

एक गाने की पंक्तियां ऐसे हालात में सरकार से ज्यादा संबल देती हैं, ..रहने को घर नहीं, सोने को बिस्तर नहीं, ..जिनका खुदा है रखवाला..! जब मौसम का सितम ऐसा हो, जिसमें दही न जमे, इंसान आसानी से जमे और इस कदर जमे कि पिघलने वाली चीज/घटना पर भी न पिघले, सारी संवेदना लकुआ जाए, ऐसे वक्त में चरित्र निर्माण से लेकर राष्ट्र निर्माण तक का नारा फीका सा लगने लगता है। जमें हुए बदन, खून, आत्माओं के भरोसे राष्ट्र निर्माण का नारा शब्दों के साथ ज्यादती है। जब मौसम गोंद के लड्डू जमाने का हो, तब चरित्र निर्माण, राष्ट्र निर्माण के नारे लगाकर रिस्क क्यों ली जाए!

नारों से मुंह तो गरमाए जा सकते हैं, लेकिन शब्द व्यर्थ चले जाते हैं। इसलिए कुछ समय के लिए राष्ट्र निर्माण और चरित्र निर्माण के महान कार्य को मुल्तवी कर लड्डू निर्माण पर फोकस किया जाना चाहिए। लड्डू निर्माण में भी एक किस्म के निर्माण की प्रोसेस है और हम जहां निर्माण की गुंजाइश देखते हैं, वहीं अपने किस्म का निर्माण करने लगते हैं। लड्डू निर्माण और उनके उपभोग के बाद संभव है लोग इस स्तर पर आ जाएं कि वे खुद ही राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देने लगेंया उनका ‘काया’ निर्माण ही राष्ट्र निर्माण मान लिया जाए। सरकार चाहे तो लड्डू निर्माण के लिए ट्रेनिंग सेंटर खोल सकती है, लोग वहां से ट्रेनिग लें और लड्डू बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं, दूसरों को भी ट्रेंड करें।

लोग अपने-अपने आकार-प्रकार के लड्डू बनाकर ‘मेरा लड्डू श्रेष्‍ठ’ की दौड़ में शामिल हो सकते हैं। लड्डुओं की महक लोगों के दिमागों पर वैसे ही कब्जा जमा लेती है, जैसे कुछ धर्मांध कट्टरपंथी ताकतें लोगों के दिमागों पर जमा लेती हैं। वृहद स्तर पर राष्ट्रीय लड्डू निर्माण परियोजना शुरू की जा सकती है। अवाम का रुचिकर विषय होने से इसकी सफलता के शत-प्रतिशत चांस हैं। लड्डुओं के नाम से लोग स्वाद की ओर उन्मुख होंगे। करोड़ों मुंह में स्वत: पानी आने लगेगा। इस पानी को सरकार बतौर अपनी उपलब्धि प्रचारित करवा सकती है। यह पानी सुगमता से लड्डू पचाने में भी सहायक होता है।

चाहे तो इस पानी पर अपना हक जता सकती है, फिर पंद्रह अगस्त जैसे अहम मौकों पर एक स्कीम अलग से लॉन्च कर यह पानी उनके मुंह में ही बने रहने देने की घोषणा कर वोट सुनिश्चित कर सकती है। थोड़े समय में किसी भी किस्म के निर्माण में लड्डू निर्माण ही र्शेष्ठ निर्माण साबित होगा। हां, लड्डू घोटाले की आशंका तो जरूर है, बाकी सब ठीक है।

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