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व्‍यंग्‍य: हम तो बकबक करेंगे, बकने के सीजन में नहीं बकेंगे तो कब बकेंगे?

अब देखो, हम जैसे इस उम्र में हाथ पैर तो चलाने से रहे। हमने तो तब भी हाथ पांव नहीं चलाए जब जवान थे तो अब क्या खाक चलाएंगे?

व्‍यंग्‍य: हम तो बकबक करेंगे, बकने के सीजन में नहीं बकेंगे तो कब बकेंगे?
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उनको जिम्मेदारी के पद पर बैठाने के बाद भी उनकी दोनों टांगें टेबुल के ऊपर रखे देख मस्ती में खुले दिल से जो मन में आया बकते देखा तो रहा न गया सो पूछ बैठा, ‘काका जी! आखिर ये सब हो क्या रहा है? लगता है जबसे आप सत्ता में आए हो आपने कुछ और लिया हो या न पर कुछ भी बकने का ठेका ले जरूर ही ले लिया है। हर दूसरे दिन अखबार में कुछ छपा हो या न पर आप का हरकुछ बका जरूर छपा दिख जाता है। आखिर आजकल आप महामनों के मुंहों को हो क्या गया है? पहले तो आप ऐसा नहीं बकते थे?’

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तो वे मेरे मुंह पर मुंह में रखी खैनी की पिचकारी मारते बोले, ‘क्या हो रहा है? जन हित में बकने में जुटे हैं और क्या? देखिए वोटर!
कुर्सी और सत्ता
में जीव आता ही बकने के लिए है। ये दोनों इतने पाजी हैं कि गूंगा जीव भी बकने के लिए मजबूर हो जाता है। अब देखो, हम जैसे इस उम्र में हाथ पैर तो चलाने से रहे। हमने तो तब भी हाथ पांव नहीं चलाए जब जवान थे तो अब क्या खाक चलाएंगे? ऐसे में अब क्या मुंह भी न चलाएं? हमारा कुछ न कुछ तो चलने दीजिए। अगर हम कहीं जाम हो गए तो? हम अपने बकने के सीजन में नहीं बकेंगे तो अच्छा तुम ही कहो, तो कब बकेंगे?’
‘पर काका जी! बुरा मत मानिएगा। आजकल आपके बकने के बारे में अखबारों में पढ़ने सुनने को जो मिल रहा है, वह आपकी ही संस्कृति के विरुद्घ है, खैर देश की संस्कृति की बात तो छोड़िए। और जग जानता है कि आप तो संस्कृति के पहरूए हैं।
सच कहूं तो आप जैसे ही जो ऐसा गैर जिम्मेदाराना बकेंगे तो सौ-पचास में बिकने वाले वोटरों से क्या उम्मीद रखें?’ कह मैं उनका मुंह ताकने लगा तो वे पहले से भी अधिक भड़भड़ाते बोले मानों मुझे नहीं मीडिया को संबोधित कर रहे हों, ‘अरे मियां, आखिर हो क्या गया जो इस तरह से..। मुंह ही तो चला रहे हैं, कोई गोली तो नहीं चला रहे? अब तुम चाहते हो कि हम मुंह भी न हिलाएं?’ कह उन्होंने अपने सिर की टोपी से मेरे मुंह को ढंका और फरमाए, ‘देखो वोटर! पहले अपने सुनने के दिन थे, अब बकने के हैं।
बहुतों साल सुन लिया। बड़े दिन मन मसोस कर रहे। लगता था बिन बोले ही न चले जाएं। भगवान ने ये जुबान हमें बकने के लिए ही बख्शी है। बरसों से मुंह बकने के इंतजार में था पर बक नहीं पा रहे थे। तब हमें तो लगने लगा था की इस देश में आकर भी ऐसा न हो कि हम बकना ही भूल जाएं। मजबूरी में मुंह पर ताला मारे बैठे थे।
कारण, जनता हमें बकने का अवसर ही नहीं दे रही थी। असल में जनता जिसे बकने का अवसर देती है लोकतंत्र में बकने का अधिकार उसी का होता है। अब जो बकने का अवसर मिला है तो हम भी अपनी बरसों की भड़ास निकाल कर ही दम लेंगे। अब हमसे और चुप रहा नहीं जाता। अब तो साधिकार जो भी बकने को मन करेगा, बिन सोचे समझें बकेंगे। बिन तोले बकेंगे। बिन बोले बकेंगे। कोई सुने या न! इससे हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हम तो बस अपना बकने का धर्म निभाते रहेंगे। अब चाहे हमारे बकने से ये मुश्किल में पड़ें चाहे वे, ‘कह वे ऐसे झूमने लगे कि..।’
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