Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

व्‍यंग्‍य: ठंड के होने और लगने में एक बुनियादी फर्क होता है

यदि वह ठंड जैसी किसी वजह से छुट्टी करता है तो उसकी भूख को नया आयाम मिलने का माकूल इंतजाम हो जाता है।

व्‍यंग्‍य: ठंड के होने और लगने में एक बुनियादी फर्क होता है
X

ठंड बहुत है। यह बात कह कर उसने अपने को डराया और रजाई के भीतर दुबक गया। रजाई उसके लिए युद्ध के मैदान में पहने जाने वाला बख्तरबंद है। मफलर उसका शिरस्त्राण है। जिंदगी उसके लिए कुरूक्षेत्र का मैदान है। युद्धरत न होने के लिए उसके पास अनेक वजह हैं। वह आशंकाओं के पारदर्शी रथ पर सवार है। किंकर्त्तव्यविमूढ़ है। पेट की भूख उसकी सारथी है। सारथी की सूक्तियां ‘इको’ कर रही हैं। यह बिलकुल वैसी ही है जैसे बारात में ठेले पर सवार चलायमान गायक की आवाज चल चल रे नौजवान चल ‘इको’ करती है। भूख के रूप अनेक होते हैं।

व्‍यंग्‍य: टैक्स फ्री अभिव्यक्ति, पीर फकीरों की मजार पर चादर चढ़ाने वाले क्यों नहीं डरते?

वह अमाशय की भी हो सकती है और अन्यत्र स्नायुतंत्र की भी। वह पेट भर जाने के बाद कुछ और पाने की लालसा हो सकती है और तमाम कारक मौजूद होने के बावजूद निठल्ले बने रहने की जिद भी। ठंड के दिनों में युद्ध के मैदान से बाहर बैठे संजय टाइप कमेंटेटरों की मौज रहती है। वे धृतराष्ट्रों के लिए कथा बांच-बांच कर उन्हें खिझाते हैं। दुनियावी ऊंच नीच का सबक देते हैं। रजाई जैसे कवच को हरदम धारण किए रहने का जिन्हें विशेषाधिकार है, वे अपनी लड़ाई खुद नहीं लड़ते। वे दूसरों को लड़ाते हैं। उन्हें लड़ते हुए देखते हैं। उनकी जिंदादिली और बहादुरी का आनंद लेते हैं।

व्‍यंग्‍य: हिन्‍दी का लेखक, आइफोन-6 और पत्नी की जिद

वे कायरता से ठंडाये कानों को सदैव ढंके रहते हैं। जब दूसरे लोग भीषण ठंड और कोहरे के बीच जिंदा रहने के लिए जूझ रहे होते हैं तब वे तू चीज बड़ी है मस्त मस्त जैसे किसी कालजयी गीत का पुनर्पाठ करते हैं। वे अपनी जेब से निकाल निकाल कर काजू, बादाम, पिस्ता और चिलगोजे खाते हैं। वे जाड़े के खिलाफ हर बरस ऐसे ही लड़ाई लड़ते हैं। नहीं.., नहीं.. लड़ते नहीं लोगों को लड़ते हुए देखते हैं। और ताज्जुब की बात यह है कि वे बिना लड़ाई में शामिल हुए ही मैदान मार लेते हैं। विजयी भव: कहते हुए खुद जीत जाते हैं। युद्ध वही लोग करते हैं जिनके पास उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।

यंग्‍य: भगवानजी की मूर्ति के करीब सेंसेक्स की भी तस्वीर रख ली थी

जब तक पलायन की गुंजाइश बनी रहती है, तब तक वे प्रवचन सुनते हैं। वे प्रवचनों के सार से न सहमत होते हैं, न असहमत, बस उनका श्रवण कर अपने इहलोक और परलोक को धन्य बनाने की कोशिश करते हैं। भूखे आदमी के पास रजाई या कम्बल तो हो भी सकता है और नहीं भी, लेकिन उसमें निरंतर दुबके रहने का अधिकार नहीं होता। उनको इच्छानुसार अवकाश कभी नहीं मिलता। यदि वह ठंड जैसी किसी वजह से छुट्टी करता है तो उसकी भूख को नया आयाम मिलने का माकूल इंतजाम हो जाता है।

ठंड के दिनों में पूरा उत्तर भारत दो भागों में बंट जाता है। एक वे हैं, जिन्हें लगता है कि बड़ी ठंड है, लेकिन वे श्योर नहीं है कि यह ठंडक किस कदर है। वे हाथों को कांख में दबा कर काम पर जाते हैं। हर दिन वे ठंड से पूरे मनोयोग से मुकाबला करते हैं। दूसरा तबका ठंडक का पूरा लुत्फ उठाता है। ठंड के होने और लगने में एक बुनियादी फर्क होता है।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि, हमें फॉलो करें ट्विटर और पिंटरेस्‍ट पर-

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top