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व्‍यंग्‍य: अदा, फोटू खिंचाने की, अदा का लॉजिक क्या है

वित्त मंत्री को कुछ घंटे पहले ही बजट फाइनल करते दिखने के फर्जी फोटू नहीं दिखाने चाहिए।

व्‍यंग्‍य: अदा, फोटू खिंचाने की, अदा का लॉजिक क्या है

हर बजट-प्रस्तुति से ठीक पहले वित्त मंत्री अपने जूनियर मंत्रियों और अफसरों के साथ फोटू खिंचाते हैं, जिसमें वित्त मंत्री टेबल पर बैठकर फाइल पर कुछ लिखता-पढ़ता है, दस्तखत वगैरह करता सा दिखता है। मुझे टेंशन हो जाती है, भाई को कुछ घंटों में पेश करना है, अभी भी बजट को यह बस बना ही रहा है।

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मतलब ये सारा होमवर्क तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था। कोई मंत्री इत्ता गैर-जिम्मेदार कैसे हो सकता है। कुछ परमानेंट टाइप की अदाएं हैं, जिन्हें देखते देखते बोर हो गये हैं। किसी डिपार्टमेंट मंत्रालय की रिपोर्ट पर मंत्रीजी टेबल पर कलमदान सामने रखकर कुछ लिखने-पढ़ने का उपक्रम कर रहे हैं। कागज खाली है। इस अदा का लॉजिक क्या है, मैंने एक फोटू एक्सपर्ट से पूछा। उसने बताया-इसमें मंत्रीजी समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह मत समझना कि मैं पढ़ता-लिखता हूं। पढ़ता, तो क्या यहां तक पहुंच पाता, नहीं ना।

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बहुत पहले चित्रकूट में एक सम्मेलन हुआ। वहां तमाम वक्ताओं ने कहा कि हर घर में ददुआ डकैत पैदा हो, तब बात बने। ददुआ डकैत का वहां की पॉलिटिक्स में बहुत जोरदार योगदान रहा है। ददुआ पढ़ाई करते होते, तो क्या होते। कहीं आर्टिकल लिख रहे होते। आर्टिकल लिखने वाले से ज्यादा महान आर्टिकल का विषय होता है। फंडा यह निकला, पढ़ाई करने वाले सिर्फ इतनी काबिलियत जुटा पाते हैं कि लिख पायें। बिना पढ़े आदमी इतनी काबिलियत अर्जित कर सकता है कि उस पर आर्टिकल लिखे जायें।
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खैर बात फोटू की अदा की हो रही थी। अभी नवजोत सिंह सिद्धू की एक फोटू देखी। स्टिल फोटू थी। फिर भी अगड़म-बगड़म आवाजें आ रही थीं। फोटोग्राफर ने बताया-सिद्धू इफेक्ट कुछ यूं है कि उनकी स्टिल फोटू भी चुप नहीं रह सकती। पहले के लेखक खिंचाया करते थे फोटू कुछ इस अंदाज में एक अंगुली दायें या बायें गाल पर, असीम क्षितिज की ओर ताक रहे हैं, जैसे वहां से लिखने के विषय झरेंगे। मैंने बचपन में एक बार अपने बुजुर्ग से पूछा था कि ये लेखक आसमान की ओर क्यों ताकते रहते हैं।
उन्होंने बहुत समझदारी का जवाब दिया-भूखा है, बेचारा। लेखन से कुछ खाने-पीने को नहीं मिलता। आसमान में ऊपर वाले से प्रार्थना सी कर रहा है कुछ टपका। तुम लेखक कभी मत बनना। इसी में समझदारी है। हर नयी पीढ़ी के लिए असली समझदारी का काम यह है, वह पुरानी पीढ़ी को कतई नासमझ समझे।
सो मैंने अपने बुजुर्ग की बात नहीं मानी पर अपना मामला अलग है, अपना ओरिजनल फोटू कुछ यूं बनेगा-कि भुक्खड़ों वाले अंदाज में दरवाजे की ओर ताक रहे हैं कि कब कोई कुरियर वाला या डाकिया आये और कहीं के भुगतान का चेक लाये। अपना फंडा क्लियर है-लेखन के इतिहास में नाम हो या न हो, कई सारे चेकों पर अपना नाम होना चाहिए। नयी चाल के लेखक असीम क्षितिज की ओर ताकना अफोर्ड नहीं कर सकते।
विषय अब सन्नी लियोनी के फोटू से निकल रहे हैं। विषय अब जोधा-अकबर सीरियल से निकल रहे हैं। विषय अब रजिया सुल्ताना सीरियल से निकल रहे हैं। खैर मसला यह था कि फोटू पुराने टाइप के बोरिंग टाइप के नहीं होने चाहिए। रीयलिस्टिक टाइप के फोटू होने चाहिए।
वित्त मंत्री को कुछ घंटे पहले ही बजट फाइनल करते दिखने के फर्जी फोटू नहीं दिखाने चाहिए। वित्त मंत्री का बजट-फोटू यूं होना चाहिए कि एक आम आदमी खड़ा है और वित्त मंत्री उसकी जेब से रकम निकाल रहे हैं और पीछे केप्शन आना चाहिए-आम आदमी के हित में आम आदमी की जेब से रकम निकालते वित्त मंत्री।
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