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व्‍यंग्‍य: फ्री चेकअप कैंप, खुदा तो हम हैं नहीं, हमारे हाथ में तो बस औजार होते हैं

आंखें दो और बीमारियां दो हजार! अब तक कहां थे?

व्‍यंग्‍य:  फ्री चेकअप कैंप, खुदा तो हम हैं नहीं, हमारे हाथ में तो बस औजार होते हैं

मुहल्ले में फ्री दिल चेकअप कैंप के बाद फ्री आंखें चेक करने का कैंप लगा तो अपने मुहल्ले के जिनकी आंखें ठीक भी थीं, वे भी मुफ्त के चक्कर में अपनी अनधुली आंखें लिए आंखें मलते कैंप जा पहुंचे। डॉक्टर थे कि बड़ी लापरवाही से हर एक की आंखों में पूरी शिद्दत के साथ गैर जिम्मेदाराना ताक झांक कर रहे थे। डॉक्टर हैं साहब! जिंदा तो जिंदा, मरे हुए आदमियों के साथ भी कुछ भी करने का मान्यता प्राप्त अधिकार जो रखते हैं। मुफ्त में आंखें चेक करवाने की मेरी बारी आई तो मैं फूला न समाया। वैसे अब तो इस देश में मुफ्त का खाने की आदत सी हो गई है।

सच कहूं, मरने के बाद ऊपर कहीं मेहनत की खानी पड़ी तो अपने तो बुरे हाल हो जाएंगे। डॉक्टर ने मेरी सपनों के भार से सूजी-सूजी आंखों के बीच बड़ी देर तक बुझी हुई टार्च की रोशनी इधर-उधर मारते कुछ ढूंढ़ते हुए पूछा, ‘क्या बीमारी है?’ ‘डॉक्टर साहब! लगता है मेरी आंखों को अब ठीक से कुछ दिखता नहीं। जितनी इन्हें ठीक करने की दवा इनमें डाली, ये कम्बख्त उतनी ही बैठीं। इनमें न अब कोई भूख है न कोई प्यास। इनमें सड़े सपने इतने हैं कि़..,’ मैंने एक आंख बंद किए कहा। ‘बस करो यार, बस! आंखों की बीमारियां गिना रहे हो या दर्द भरी कहानी सुना मुझे रुला रहे हो?

आंखें दो और बीमारियां दो हजार! अब तक कहां थे?’ ‘मुफ्त के चेकअप कैंप के लगने का इंतजार कर रहा था।’ इस देश के आदर्श नागरिक मालूम पड़ते हो। अब समझो तुम्हारा काम तमाम हो गया। पर यार! अब तक कैसे चलाते रहे इन सड़ी आखों को? ये बीमारी दोनों आंखों में है या एक में ही है?’ ‘मुझे तो दोनों में ही लगती है साहब!’ ‘अच्छी बात है। बड़े दिनों बाद ऐसी दोस्ती कहीं देखी। तुम बड़े लक्की हो यार! एक आंख ने भूखे-प्यासे रहना शुरू कर दिया तो दूसरी ने भी हमदर्दी में साथ देना शुरू कर दिया। ‘कहीं भी, कुछ भी अच्छा नहीं दिखता।

मुहल्ले में निकलता हूं तो हर रोज मुहल्ले के कदम-कदम पर गंदगी के वही ढेर दिखते हैं। आगे निकलता हूं तो इंच-इंच जगह के लिए लड़ते पड़ोसी दिखते हैं। मुहल्ले की पानी की पाइपें रोज ही टूटी हुई दिखती हैं। घर में रहता हूं तो अपने पर हर वक्त दांत निपोरती हुई बीवी दिखती है। टीवी पर तो लूटमार, बलात्कार, आगजनी के अतिरिक्त कुछ और दिखता नहीं। सच कहूं तो मैं आंखों की इस खराबी से बहुत तंग आ गया हूं साहब! इनका कुछ करिए प्लीज!’ ‘तब तो इनका ऑपरेशन ही करना होगा।’ डॉक्टर ने हंसते हुए कहा तो मैंने डरते डरते पूछा, साहब ऑपरेशन से आंखों की बची लौ जाती है या गई लौ लौट आती है?’ ‘देखिए, खुदा तो हम हैं नहीं। हमारे हाथ में तो बस औजार होते हैं। आंखें ठीक करना या न करना तो ऊपर वाले के हाथ में होता है डियर! पर तुम आंखों की रोशनी जाने से इतने डर क्यों रहे हो?

जो इस देश में अपनी आंखों में फुल रोशनी का दावा करते हैं, सच तो ये है मेरे यार कि इस देश में किसी की आंखों में रोशनी है ही नहीं। जहां स्वार्थ में हर कानी आंख तक फूटी हो वहां एक जोड़ी ये भी चली जाएं तो कौन सा प्रलय आ जाएगा? अंदर से वे अपनी आंखें फुड़वा कर आ गए हैं। बेड खाली पड़ा है। इससे पहले कि कोई और फ्री आई कैंप में अपनी आंखें फुड़वाने का लाभ बटोर ले जल्दी करो यार..। आंखें फुड़वाने के पैसे खर्चे बगैर ऐसे फ्री के मौके बार-बार नहीं आते मेरे दोस्त!’ उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई और खुले में बने ओटी की ओर भाग लिए।

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