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व्यंग : भला करने वाले

हे भगवान! आखिर मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई, अंजाने में ऐसा कौन-सा अपराध हो गया प्रभु! जो ये लोग मेरा सम्मान करने पर तुले हैं।

व्यंग : भला करने वाले

हे भगवान! आखिर मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई, अंजाने में ऐसा कौन-सा अपराध हो गया प्रभु! जो ये लोग मेरा सम्मान करने पर तुले हैं। पत्र में उल्लेखित किसी भी क्षेत्र से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इन भला करने वालों से मुझे बचा लो प्रभु! अब मै आपकी शरण में हूं ।

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साधो सावधान रहो! जमाना बड़ा खराब है। हर मोड़ पर भला करने वाले खड़े हैं। कौन कब किसका भला कर दे, कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसा ही कुछ सोचता हुआ मैं चाय की चुस्कियों के साथ घर के आंगन पर अखबार पढ़ते हुए बैठा था। तभी डाकिया मेरे हाथों में एक लिफाफा थमाकर चला गया। लिफाफा खोलकर पत्र पढ़ा तो दिमाग घूम गया। पत्र में लिखा था कि आपने शिक्षा, साहित्य, कला, संस्कृति, खेल, वकालत, स्वास्थ्य, बीमा, नशाबंदी, कृषि, वन्यजीव संरक्षण, बाल कल्याण इत्यादि के अतिरिक्त, जो हम कभी नहीं जानते, उन क्षेत्रों में भी प्रभावोत्पादक और उत्कृष्ट कार्य किया है।
इसलिए हम आपको एक सम्मान से सम्मानित करना चाहते हैं। वैसे तो हमारे गोदाम में एक से बढ़कर एक सम्मान रखे हुए हैं, दूसरे अर्थ में कहें तो हमारे सभी सम्मान सर्वोच्च ही हैं। जिसे हम गरिमामय समारोह आयोजित करके देते हैं। यदि आप किसी भी कारण से समारोह में सम्मान ग्रहण करने के लिए नहीं आ पाते हैं तो अपने दूधमुंहें बच्चे से लेकर घरेलू नौकर तक को सम्मान ग्रहण करने के लिए भेज सकते हैं।
हम उन्हें ही आपका प्रतिनिधि समझकर सम्मान पत्र थमाने का पुरुषार्थ करते हैं। यदि आप प्रतिनिधि भी नहीं खोज सकते तो हम डाक से सम्मान पत्र आप के घर तक भी पहुंचा सकते हैं क्योंकि हमारे पास घर पहुंच सम्मान सेवा सुविधा भी उपलब्ध है। साथ-ही-साथ हम आपके सम्मान की खबर को अखबारों में अपने ढंग से छपवाने का पुण्य कार्य भी करते हैं। जिसमें बड़े-बड़े शहरों में आयोजित बड़े साहित्यिक समारोह का उल्लेख हम अपने ढंग से करते हैं। कृपया एक बार सेवा का अवसर प्रदान करें। बस हम तो आपका भला करना चाहते हैं।
मैं आसमान की ओर हाथ जोड़कर बुदबुदाया, ‘हे भगवान! आखिर मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई, अंजाने में ऐसा कौन-सा अपराध हो गया प्रभु जो ये लोग मेरा सम्मान करने पर तुले हैं। पत्र में उल्लेखित किसी भी क्षेत्र से मेरा दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इन भला करने वालों से मुझे बचा लो प्रभु! अब मै आपकी शरण में हूं।’पत्र पढ़कर मैं बहुत टेंशन में आ गया, मैं सोच रहा था, क्या ये लोग त्रिकालदर्शी हैं? अरे, पत्र में उल्लेखित क्षेत्रों में मैंने कब उत्कृष्ट कार्य किया ये तो मुझे भी पता नहीं है, फिर इन्हें कैसे पता चल गया? ये लोग क्या गर्भ से ही उदारता का ठेका लेकर पैदा हुए हैं? जो काम मैंने किया ही नहीं है उसके लिए मुझे सम्मानित करने के लिए ये लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हैं? क्यों ये मुझे सम्मानित करने के लिए मरे जा रहे हैं।

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दूसरे दिन मैं पत्र पर लिखे पते पर पहुंच गया। वह एक छोटा-सा कमरा था, जिसके बाहर एक साइनबोर्ड लगा था। जिसमें लिखा था, ‘कार्यालय अनंत आकाश, संचयी साहित्य अकादमी, अध्यक्ष-भलाईदास।’ वहां एक आदमी कंप्यूटर पर सम्मान पत्र टाइप करते हुए मुझे मिला। मैंने उनका अभिवादन करते हुए उससे पूछा, ‘मैं श्री भलाईदास जी से मिलना चाहता हूं।’ उसने मुस्कराते हुए कहा, ‘जीं, मैं ही भलाईदास हूं। कहिए, आपकी क्या भलाई करूं।’ मैंने उन्हें उनका भेजा हुआ पत्र दिखलाया। इस बार उसने गर्मजोशी से हाथ मिलाते हुए बैठने का निवेदन किया। मैं चुपचाप बैठ गया। फिर उसने कहा, ‘लाइए, जल्दी कीजिए।’ मुझे कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने पूछा, ‘मैं आपका मतलब नहीं समझ पाया श्रीमान जी?’ उसने दांत निपोरते हुए कहा-‘कोई बात नहीं, कुछ देर बाद समझ जाएंगे और सुनाइए कैसे हैं आप?’

मैंने सकुचाते हुए कहा, ‘आप अपनी अकादमी की गतिविधियों के बारे में कुछ बताइए। जैसे पुस्तक लेखन, समीक्षा, प्रकाशन या किसी गंभीर विषयों पर कोई संगोष्ठी या कार्यशाला का आयोजन वगैरह होता है कि नहीं?’ उसने निर्लज्जता पूर्वक कहा, ‘महाशय! हम इन झंझटों में नहीं पड़ते। हम तो विशुद्ध रूप से केवल साहित्य सेवा ही करते हैं। जैसे शासन की मंशा है कि विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति को मिले वैसे ही हमारी भी मंशा है कि सम्मान का लाभ अंतिम व्यक्ति को मिले। जिनका कोई सम्मान नहीं करता उनका सम्मान हम करते हैं। चाहे सम्मान पाने वाला इसके योग्य हो, चाहे न हो। अब आप ही बताइए इससे बड़ी साहित्य सेवा और क्या हो सकती है? हम तो एक हाथ ले और एक हाथ दे के सिद्धांत पर साहित्य सेवा का धंधा करते हैं। अब और ज्यादा मेरा दिमाग मत खाइए, जल्दी लाइए।’ यह कहते हुए उसने किसी प्रशिक्षित भिखारी की तरह अपना हाथ मेरे सामने फैला दिया।
इसके बाद भी मैंने मासूमियत से पूछा, ‘श्रीमान! मैं अब भी कुछ नहीं समझ पा रहा हूं आखिर आप मुझसे क्या मांग रहे हैं?’ वह तुरंत गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए कहा, ‘अरे हम तो आपको पढ़ा-लिखा आदमी समझते थे। पत्र में साफ-साफ लिखा है, सम्मान पाने के लिए हजार रुपए जमा करना पड़ेगा। हजार नहीं तो पांच सौ ही दे दीजिए। इतना भी नहीं है तो कम-से-कम तीन सौ रुपए तो दे रे बाबा! सम्मानित होने के लिए। हमारे पास राशि के हिसाब से अलग-अलग सम्मान पत्र टाइप किए हुए पड़े हैं।
जो जैसा देगा उसे वैसा मिलेगा, अब समझा कुछ?’ मैंने बचकानी अंदाज में पूछा, ‘फोकट में देने के लिए कोई सम्मान पत्र नहीं है क्या आपके पास?’ वह बौखला गया, दांत किटकिटाते हुए बोला, ‘निकल जा यहां से, दूर हो जा मेरी नजरों से। जब जेब में फूटी कौड़ी नहीं है तो क्या करेगा सम्मानित होकर? मैंने तुझे क्या समझा था और तू क्या निकला?’ उसकी हालत देख मैं डर के मारे वहां से चुपचाप खिसक गया।
मैं वहां से घर वापस आ गया। दिमाग एकदम बोझिल हो गया था। मैंने रिलेक्स होने के लिए टीवी ऑन किया। उसमें भी भला करने वाले कई विज्ञापन दिखाए जा रहे थे। मैंने चैनल बदल कर समाचार सुनना शुरू किया। पता चला कि चुनावी बिगुल बज चुका है। सभी राजनैतिक दल आपका भला करने के लिए कमर कस चुके हैं। अब आप भी अपना भला कराने के लिए तैयार हो जाइए। मैं माथे पर छलक आए पसीने को पोंछते हुए सोचने लगा-‘बाप-रे-बाप! अब तो खैर नहीं। ये लोग हमारा भला करके ही दम लेंगे।’
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